पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६२

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बौद्धधर्म तृतीय संगीतिके समय जन्मग्रहण किया। ये ही माध्य- महायानका आश्रय ले तो अनायास, और बहुत जल्द मिक सम्प्रदायके प्रवर्तक थे और इन्हों के द्वारा पूर्वा- बोधिसत्त्व हो संसारसागर पार कर निर्वाणपथके पथिक प्रवर्तित महायान संप्रदायकी यथेष्ट उन्नति हुई। ये हो सकते हैं। इस विशाल और उदार नोतिसे ही यह संप्र- राहुलभद्र नामक एक ब्राह्मणके शिष्य थे जो महायान दाय 'महायान' नामसे प्रसिद्ध हुआ था। फिर सङ्कीर्ण- संप्रदाय भुक्त थे। इम ब्राह्मणने श्रीकृष्ण और गणेशमे बुद्धि तथा बहुत थोड़े मनुष्योंके मतानुवत्ती होनेके अनेक विषयों । शिक्षा पाई थी। इससे जान पड़ता है, कारण आदिबौद्धधर्मानुगामियोंको महायानगण ही कि महायान सम्प्रदायका धर्ममत बहत केछ भगवद्गीतासे अवनाके साथ हीनयान' कहते थे। यथार्शमें वे ही लिया गया था। बहुतोंका विश्वास है, कि शैवधर्म के प्रत्येकबुद्धयान या श्रावकयान कहलाते थे। निकट भी महायान अनेक विषयों में ऋणी हैं। महायानोंके मतसे कर्म शून्य अहं तोंकी अपेक्षा दया किसोका कहना है, कि नागार्जुन ६० वर्ष तक तथा सहानुभूतिपूर्ण बोधिसत्त्वगण श्रेष्ठ है, इसीलिए जीवित थे और इसके बाद सुखावती स्वर्गको गए । कोई होनयानगण उनको निन्दा करते हैं । महायानगण कोई कहते हैं, कि वे एक सौ वर्ष तक जीवित थे, फिर कोई शून्यवादके पक्षपाती हैं। इन्हीं महायानोंसे भारतवर्णमें उन्हें पांच सौ वर्षसे अधिककी परमायु प्रदान करनेमें भी शून्यबाद अर्थात् 'सर्ग शून्य' यह मत विशेष भावसे कुण्ठित नहीं होते। राजतरङ्गिणो नामक ऐतिहासिक प्रचलित हुआ था। प्रन्थमें लिखा है, कि नागार्जुन तुरुक राजाओंके बाद ___महायानधर्मके प्रचारका प्रधान कारण यह था कि आविर्भूत हुए थे। इस विवरणके ऊपर निर्भर कर यह इन्होंने भक्तिको श्रेष्ठ आसन दिया है और ध्यानधारणा सिद्धान्त करना भ्रमात्मक नहीं होगा, कि नागार्जुन तथा साधना आदिको धर्मका अङ्ग बतलाया है। इसके शरी शताब्दीके मध्यभाग या शेषभागमें जीवित थे। साथ साथ जोवों के प्रति दया और सहानुभूति प्रकाश देव नामक एक सिंहलवासी स्थविरके साथ नागार्जुनका ! करना इनका प्रधान कर्त्तव्य होनेके कारण भारतवर्ष में लाखों नरनारियोंने इस धर्मका आश्रय लिया था। घोरतर याक्युद्ध हुआ था, ऐसा वर्णन मिलता है । ये देव प्राधान्य लाभके लिए महायानोंको हीनयान-सम्प्र- अल्पवयस्क थे और तीसरी शताब्दीमें भी जीवित थे। दायके साथ बहुत दिन लड़ना पड़ा था। इससे भी समझा जाता है, कि नागार्जुन श्री शताब्दी- ___ यह पहले ही कहा गया है, कि सिंहलवासी बौद्धोने के शेष भागमें विद्यमान थे। जलन्धरकी सङ्गीतिमें योगदान नहीं किया था, यहां तक यह नवीन धर्मसम्प्रदाय बहुतसे धर्म प्रन्थोंको लिपि । कि उनके ग्रन्थमें कनिष्कको नाम तक भी नहीं पाया बद्ध कर अपनी कार्यतत्परताका परिचय दे गया है। जाता। इससे प्रतीत होता है, कि रली शताब्दीमें इन अनेक स्थल पर त्रिपिटकसे मूलसत्य ले कर आवश्यकता- दोनों सम्प्रदायमें सम्पूर्ण पार्शषध था। नुसार परिवर्तित तथा परिवर्द्धित हुआ है। हीनयान- ! २०६ या २१७ ई०में सिंहलपति तिष्यके समय महायानोंको बौद्धधर्म का शत्र बतलाते थे सही, पर बेतल्योंकाका एक घोरतर विवाद उपस्थित हुआ जिसका वैसा नहीं देखा जाता है। किन्तु यह अस्वीकार भी नहीं प्रधान उद्देश्य यह था --बुद्ध मनुष्य नहीं हैं, वे तुषित कर सकते, कि मूलधम का सत्य हो महायानोंने ग्रहण स्वर्ग में रहते हैं, उनके द्वारा धर्मोपदेश नहीं हुआ है। किया है और टीकाटिप्पनी द्वारा उसका दूसरा अर्थ उनके प्रेरित तथा आदिष्ट आनन्दसे ही धर्मोपदेश किया लगाया है। गया है। यही मत ले कर संघर्ण उपस्थित हुआ। यह मूल बौद्धधर्म कठोर नियमाधीन कुछ भिक्षु सडके मत वेतुल्लवाद या वितण्डावाद नामसे प्रसिद्ध है । सीमावद्ध था अर्थात् आदि बौद्धधर्म मतसे केवल भिक्ष - परंतु तिष्यराजके यलसे यह गोलमाल रुक गया। इस गण ही मोक्षलाभमें समर्थ थे। किन्तु महायानसम्म समय धेरदेव नामक एक प्रसिद्ध बौद्धाचार्गका आधि- दायने निखिल जगन्में मुक्तिविधान किया था। यवि सभी र्भाव हुभा था।