पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६३

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. . बौद्धधर्म ५५७ शरी शताब्दीके मध्यभागमें अभयमेघवर्णके राजत्व- सौत्रान्तिक । कालमें महाविहार तथा अभयगिरिके भिक्ष ओंके साथ मौत्रान्तिकोंका कहना है, कि बाहरी सभी पदार्थ मतविरोध उपस्थित हुआ और उसी समय सागलिक प्रकृत नहीं, छायामात्र है, सुतरां उनका ज्ञान प्रत्यक्ष सम्प्रदायकी उत्पत्ति हुई। महासेनक राजत्वकालमें नहीं हो कर परोक्ष है। ये केवल सूत्रका हो विनाम महाविहारके बौद्धों के प्रति बड़ा हो अत्याचार हुआ। करते हैं। इनके मतमें बुद्ध दशवल, चार वैशारद्य, कहते हैं, कि शुत्रओंकी प्ररोचनासे महाविहार विध्वस्त तीन स्मृत्युपस्थानसमन्वित तथा मब भूतोंके प्रति दया- हो गया और अभयगिरिके बौद्धोंकी ग्वव उन्नति हुई। वान् थे। . इनके दो काय हैं, ला धर्मकाय और रा पीछे यह महाविहार फिरसे निर्मित हुआ। भोगकाय । कुमारलब्ध इस मतके प्रवर्तक थे। प्रवाद है, कि महासेनके पुत्र मेघवर्णके राजत्वकाल- योगाचार। में ( ३०६ ई०में ) प्रसिद्ध बुद्धदन्त सिंहल लाया गया . योगाचार श्रेणीके बौद्धदार्शनिकगण विज्ञानके था। महासेनके समय फाहियान मिहल आये थे। : अलावा और किसोका अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है, कि उस समय महाविहारमे ३००० और इसीलिए इनका अन्य नाम विज्ञानवादी है। अभयगिरिमें ५००० श्रमण रहते थे तथा अभयगिरि महा- . माध्यमिक । विहारको अपेक्षा समधिक समृद्धिशालो था। महा-: माध्यमिकोंका कहना है, विश्वसंसार इन्द्रजालके सदृश नामने ४१०-४३२ ई. तक राज्य किया। उस समय है। सत्य दो प्रकारका है, परामर्श और संवृत्ति (वेदान्त भारतवर्षसे बुद्धघोष सिहल भ्रमणके लिये गये और . का पारमार्थिक और व्यवहारिक) । इनके मतानुसार सभी बिशुद्धिमार्ग नामक प्रकाण्ड ग्रन्थकी रचना की। सिहल- स्वप्नवत् हैं, न सत्ता है, न विनाश है, जन्म, मृत्यु या पासी उन्हें स्वयं मैत्रीय कह कर सम्मान करते थे। निर्वाण कुछ भी नहीं हैं। वास्तव में ये लोग मायावादी और भी अनेक राजाओंने मिहलमें बौद्धधर्मको । होने पर भो 'माया'का व्यवहार नहीं करते : वरन् मांख्य उन्नतिके लिए भिन्न भिन्न रूपमें महायता पहुंचाई थी। मतके 'प्रधान' और प्रकृति के बदले में प्रज्ञा' और 'उपाय' चार दार्शनिक शाखा शब्दका यवहार करते हैं। चीनपरिब्राजक यूएनचुअङ्ग जिस समय भारतवर्ष में सर्वदर्शनसंग्रहकारोंन माध्यमिक, योगाचार, सौत्रा- रहते थे, उस सम । बौद्धसमाजमें चार प्रधान दार्श: न्तिक तथा वैभाषिक इन चार मतोंका मंक्षिप्त परिचय निक संप्रदाय थे :-वैभाषिक, २ सौत्रान्तिक, ३ यागा- तथा समाचलोना इस प्रकार की है : . चार और ४ माध्यमिक । प्रथम दी होनयान तथा शेषाक्त । 'उक्त चारों मतमें माध्यमिक मतानुसार--- "कुछ भी दो महायान सम्प्रदायभुक्त थ । यूएनचुअङ्गका कहना है, . नहीं है सभी शून्य है” ऐमा दृष्टान्त दिखलाया गया है। कि सिंहलके महाविहारबासो हीनयान और अभयगिरिक : किन्तु जा सेब वस्तु स्वप्नावस्थामें दिखाई पड़ती हैं, भिक्ष गण महायान संप्रदायी थे।

जाग्दवस्थामें वह फिर देखने में नहीं आता और जो

बैभाषिक । वस्तु जाग्रदवस्थामें दिखलाई पड़ती है, स्वप्नावस्थामें बैभाषिकगण पृथ्वीका अस्तित्व स्वीकार करते हैं। फिर वह कुछ भी देवो नहीं जाती और सुषुप्ति वे कहते हैं, कि बाह्य जगन्के सभी द्रव्योंका ज्ञान उप- दशामें कोई भी वस्तु नहीं दीग्वनो है। सुतरां इससे लब्ध करनेको क्षमता मनुष्यमात्रको है । ये सूत्रका यह साबित होता , कि वस्तुतः कोई भी वस्तु सत्य प्राधान्य अस्वीकार कर "अभिधर्मको" ही प्रामाण्य प्रन्थ नहीं हैं ; सत्य होनेसे अवश्य ही वह सभी समय देखी मानते हैं। इनके मतानुसार शाक्यमुनि एक साधारण जाती। मनुष्य थे। तब बिना दूसरे की सहातयाके वे जो ज्ञान योगाचारके सतसे वाह्यवस्तु मात्र हो मिथ्या है, प्राप्त कर सके थे, वही उनका देवत्व था। ! केवल क्षणिक विज्ञान रूप आत्मा ही सत्य है। यह Vol. xv. 140