पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६४

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५५८ बादधय विज्ञान दो प्रकारका है, प्रवृत्ति विज्ञान और आलय चीर, पूर्वाह्न भोजन, समूहावस्थान और रक्ताम्बर ये सब विज्ञान । जाग्रत् तथा सुप्त अवस्थामे जा ज्ञान होता यति धर्मके अङ्ग । हैं, उसे प्रवृत्ति विज्ञान और सुषुप्तिदशाम जा ज्ञान हाता उक्त वौद्धसंम्प्रदायक मतसे सभी वस्तु क्षणिक है, उसे आलय-विज्ञान कहते है । यह ज्ञान कंवल आत्मा अर्थात् प्रथम क्षणमें उत्पन्न और द्वितीयमें विनष्ट होती. का हा अवलभ्यन किये रहता है। हैं। आत्मा भी क्षणिक और ज्ञानस्वरुप है ; क्षणिक ___ सौत्रान्तिकगण वाह्यवस्तुका सत्य तथा अनुमान- ज्ञानातिरिक्त स्थिरतर आत्मा नहीं हैं। ( सर्वदर्शनस०) सिद्ध मानते हैं। वैभाषिकांक मतसं वाहा वस्तु प्रत्यक्ष नागाजुन माध्यमिक मतके प्रवर्तक थे। इसी सिद्ध हैं। एकमात भगवान बद्धके बौद्धधर्म उपदेश प्रकार उनके समसामयिक कुमारलब्ध सौत्रान्तिक मत- होने पर भी शिष्यों में मतभेद होना असम्भव नहीं । इस प्रवर्तक समझे जाते हैं। इस समय आर्यदेव तथा का दुशान्त उन्होंने इस प्रकार दिया है। यदि कोई व्यक्ति। अश्वघाप नामक और भी दा प्रसिद्ध स्थविरके नाम कहे, कि 'सूर्य डूब गये' तो यह वाक्य सुन कर लम्पट मिलते हैं। महायान-सम्प्रदाय अश्वघोषको स्व सम्प्र- व्यक्ति परदारहरण तथा तस्कर परधनापहरणका समय दाय-भुक्त मानते हैं। नागार्जुन और आयंदेवके सम उपस्थित हुआ, ऐसा समझेगा । किन्तु साधु सन्ध्या- सायिक अथच वयाकनिष्ठ नागाह्वय उपाधि तथागत- वन्दनादि भगवत उपासनाका समय आ गया, ऐमा भद्र नामक एक प्रसिद्ध आचार्यका उल्लख है । ये समझेगे। अतएव एक ब्यक्तिके वक्ता होने पर भी श्रोता. नालन्दाविहारक प्रधान आचार्य थे। बहुतेरे नागाह्वय गण अपने अभिप्रायानुसार एक वाक्यका पृथक पृथक और नागाजु नका एक हा व्यक्ति मानते हैं। तात्पर्य ग्रहण करते हैं। प्रधान प्रधान बौद्धाचार्य। उनके मतानुसार वाक , पाणि, पाद, गुह्य और लिङ्ग वैभाषिकोंक मध्य धर्म वात, घोषक, बुद्धदेव, वसु. ये पांच कर्मेन्द्रिय तथा नासिका, जिह्वा, चश, त्वक और मित्र आदि भदन्तगण प्रसिद्ध थे। धर्मत्रात आर्यदेवके श्रोत्र ये पांच ज्ञानेन्द्रिय हैं; तथा मन और बुद्धि उभये शिष्य तथा महाविभाषा और उदानंवर्गके प्रणेता थे। न्द्रिय हैं। इन्हीं बारह इन्द्रियोंका आयतन (आवासस्थान) वसुमित्र कानाक राजपुत्रके राजत्वकालमें विद्यमान थे। होनेके कारण शरीर द्वादशायतन कहलाता है। सभो ६ठी शताव्दीमे दा प्रसिद्ध दाश निक पण्डितोका आवि- बौद्धमतानुमार धनोपार्जन द्वारा इस द्वादशायतन शरीर- भाव हुआ था जिनमेंसे एकका नाम आर्य असङ्ग और की सम्यक शुश्रषारूप पूजा करना प्रधान कर्म है। इनके . दुसरेका वसुवन्धु था। ये दोनों ही गान्धारवासी थे। मतसे देवता सुगत और जगत् क्षणभंगुर हे प्रत्यक्ष तथा अमङ्ग योगाचारमतावलम्बी थे। ये पहले महोशासक अनुमान ये दो प्रमाण हैं। दुःख, आयतन, समुदय और और पीछे महायानसम्प्रदायभुक्त हुए। बहुत दिनों तक मार्ग ये चार तत्त्व : विज्ञानस्कन्ध, संज्ञाम्कन्ध, वेदना, इन्हों ने अयोध्याके निकट एक सङ्घाराममें वास किया । स्कन्ध, संस्कारस्कन्ध तथा रूपस्कन्ध ये पांच स्कन्ध दुःम्ब- पाछे ये राजगृहमें रहने लगे और वहीं उनकी समाधि तस्व , पांच इन्द्रिय तथा रूप, रम, गन्ध, स्पर्श और हुई। इन्होंने यागसम्वन्धमें एक प्रसिद्ध पुस्तक रची है। शब्द ये पांच विषय एवं मन और धर्मायतन अर्थात् बुद्धि वसुबन्धु असङ्गके छोटे भाई और नालन्दाविहारके थे बारह आयतन तत्त्व हैं। मनुष्योंके अंतःकरणमें स्वभा- अध्यापक थे। नेपालमें इनकी मृत्यु हुई। इनका षतः जो रागद्वेषादि उत्पन्न होता है, उसे समुदय तत्त्व प्रधान ग्रंथ अविधर्मकोष है । इसके अलावा इन्होंने महा- कहते हैं। यान ग्रन्थको टीका भी लिखी है। इस मतसे सभी संस्कार क्षणमात्र स्थायी हैं, ऐसी उक्त दोनों व्यक्तिके अलावा और भी कितने प्रसिद्ध जो स्थिर वासना है उसका नाम मार्गतत्व है। मार्गतत्त्व तथा अमाधारण पण्डितों का विवरण मिलता है जिनमेंसे ही मोक्ष कहलाता है। चर्मासन, कमण्डलु, मुण्डन, . कोई महायान और कोई होनयान सम्प्रदायभुक्त थे। इनके