पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६५

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बौद्धधर्म नाम ये हैं: --दिङ नाथ, 'गुणप्रभ, स्थिरमति, मन्दास, उस समय हीनयान और महायान इन दो सम्प्रदायी बुद्धदास, धम पाल, शीलभद्र, जयसेन, चन्द्रगोमिन्, बौद्धोंके मध्य ही दलबंदी थी। कर्णसुवर्णराज शशाङ्क चन्द्रकीर्ति, गुणमति, वसुमित्र ( श्य), यशोमित्र, भव्य, बौद्धदलनमें विशेष तत्पर थे, किंतु ऐसा दृष्टान्त बहुत बुद्धपालित और रविगुप्त । किसी किसोका मत है, कि इनमेसे धमकीर्ति सबसे उम समय काश्मीरमें भी बौद्धधर्म का प्रभाव ज्योंका अन्तमें विद्यमान थे। फिर कोई कहते है, कि धर्म कीर्ति त्यों बना था। किंतु यहां कायस्थवशीय राजा दुर्लभ- कुमारिल भट्टके समसामयिक थे, किन्तु यूएनचुअङ्गने बर्धनके राज्यकालमें शैव प्रभाव धीरे धीरे वर्धित इनका नाम नहीं बतलाया है। होनेका प्रमाण मिलता है। वे स्वयं शैव हो कर भी ___ महायानोंके प्राधान्यके साथ इस सम्प्रदायके मध्य बौद्धधर्म के प्रति विराग नहीं दिखलाते थे। किसो किसीने तान्त्रिक गुह्यधर्म का अवलम्बन और पहले ही कहा जा चुका है, कि ७२० ईसे वौद्धधर्मकी प्रकाश किया। भोटदेशीय लामागण नागार्जुनको हो अवनति आरम्भ हुई, किंतु पश्चिम भारतवर्ष में इसके गुह्यमतका प्रवर्तक मानते हैं। ६ठो शताब्दीमें ये गुह्य . पहले हो मुसलमान कत्तुक मिन्धुविजय द्वारा (७१२ मतावलम्बीगण 'मन्त्रयान' नामसे प्रसिद्ध हुए। उस ईमें ) अवनतिका सूत्रपात हुआ था। समय चीन और जापान तक बौद्धतान्त्रिकका अभ्युदय . सिंहलमें भिक्ष ओंके मध्य जो साम्प्रदायिक विरोध हुआ था। ७वीं शताब्दीमें भोटदेश । तिब्बत ) में . चलता था, वह अग्रबोधिके राजत्वकालमें बहुत कुछ शांत 'मत्रयान' मत प्रचलित हुआ। १०वीं शताब्दीमें यही .

हो गया था। क्योंकि, उस समय तामिलगण बौद्धों के प्रति

मयान नाना विभत्समूत्तिमें 'कालचक्र' नामसं सारे अत्याचार करते थे, जिससे इनके मध्य एकताका बन्धन भोटमें फैल गया जो नेपाल में 'वज्रयान' नामसे आज भी दृढ़तर हो गया । राजा मयाधि पराक्रम वाहु (१म) के प्रचलित है। ( ११५३ - १९८४ ई में ) राजत्वकालमें सभी सम्प्रदायके उत्तर भारतमें बौद्धधर्म। मध्य एकताब धनके लिए विशेष चेष्टा होतो था और प्रवाद है, कि शङ्कराचार्य और कुमारिलभट्ट दोनोंने ११६५ ई में अनुराधपुरकी सङ्गीनिमें वह कायमें परिणत मिल कर वौद्धधर्म को भारतवर्ष से निर्वासित किया। किंतु यह कहां तक सत्य है, मालूम नहीं । शङ्कराचार्या- . १३वीं शताब्दीक आरम्भमें कलिङ्गसे माघ नामक एक के बाद भी बौद्ध भारतवर्ष में प्रचलित था, इसका राजाने पुनः बौद्धदेवके प्रति अत्याचार करना शुरू कर यथेष्ट प्रमाण मिलता है। शङ्करके समय हिदुधम का दिया। लगभग १२५० ईमें विजयवाहुने राजा हो कर अभ्युदय होने पर भी पराकान्त गजत्ववर्ग बौद्ध और इस अत्याचारको रोका और बौद्धधर्मको सजीव बनाया। हिंदूधर्म को कुछ समय तक एक सा देखते थे। ...७वीं शताब्दीमें राजा हर्ष वद्धनने बौद्धधर्म की उनके पुत्र पराक्रमवाहु ( ३५ ) अत्यन्त धर्मानुरागो तथा . शिक्षाप्रेमी थे। संस्कृत भाषाके वे अगाध पण्डित थे खूब उन्नति की। उनका दूसरा नाम शिलादित्य था। वे यद्यपि महायान सम्प्रदायभुक्त थे, तथापि सभी बौदध : तथा बहुतसे पण्डित उनकी सभामें स्थान पाते थे। सम्प्रदायको समभावमें देखते थे। वे बौद्धाचार्य सिंहलमें बौद्धधर्म आज तक भी वैसा ही बना है। मैत्रायणोय दिवाकर मित्रकी विशेष भक्ति करते थे; अगरेज, मुसलमान तथा हिन्दू धर्मका आक्रमण सह्य उनको वहन राज्यश्री बौद्ध भिक्षु णी हुई थी। उन्हीं के करकं भी वह एकबारगो तिरोहित नहीं हुआ। सिहलमें समय चीनपरिव्राजक यएनचुअङ्ग भारतवर्ष में आये थे। उच्चश्रेणीके सभी मनुष्य बौद्धधर्मविश्वासी थे। किन्तु वे लिख गए हैं, कि सम्राट हर्षवर्धनके गजछत्रमें नाना : वर्तमान सिंहली बौद्धधर्म हिन्दूधर्मकी छाया तथा उसके सम्प्रदायके हिंदू और बौद्धगण सुखशांतिसे रहते थे। प्रभावसे जड़ित है।