पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६९

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बौद्धधर्म ५६३ वेदपाठ करते थे। उस समय ब्राह्मण ज्यष्ट और बावरी अटन्ति, ब्राह्मण सङ्गे घेद पड़ थांति। ब्राह्मण ज्येष्ठ कनिष्ठ कहलाते थे। वायोकाण्डि, परमानन्द भाई और वावरो कनिष्ठ। ए पडू थिले राजा प्रतापरुद्रटार राधो शासमल ये तोनों पद्मालयके वंशधर थे। ये ही गाप्य करि रखि अच्छति।" तीन दुली बावरी थे। विश्वामित्रको दूसरो स्त्रोका उद्धत प्रमाणसे साफ साफ मालम होता है, कि बावरी नाम था चित्रोवंशो। इनके गर्भ से कुशसर्वा, विधु- जातिने राजा प्रताप रुद्रके समय तक बौद्धाचारका कुश और उवैकुश उत्पन्न हुए। विश्वामित्रको तीसरी पालन किया था और वह ब्राह्मणों के समान गिनी जातो स्त्री गन्धकेशीसे प्रयशा, उद्यम और साधुधर्म नामक , थो । राजा प्रताप रुद्रके समयसे इस जातिका अधःपतन निन पुत्र हुए जो बाघुति ( बागदो ) नामसे परिचित हुआ। राजा प्रतापरुद्र महाप्रभु चैतन्यदेवके समसाम- थे । उनको चौथो भार्या वायुरेखासे जयसा, यिक थे। उस समय उड़ीसा तथा दाक्षिणात्यके अनेक विजयसर्वा और वीर्यकेतु नामक तोन पुत्र जन्मे जो स्थानों में जो बौद्धसमाज विद्यमान था, वह महाप्रभु शवर कहलाये । उक्त दुलि बावरो, वाघुनी और शवरसे चैतन्यदेवके भ्रमणवृत्तान्तके लेखक गोविन्ददासके विवरण पुनः १२ जाति या शाखा हुई यथा -दुलिबावरी, और उनके चरिताण्यायक चूड़ामणिदासके चैतन्यमङ्गल. काहाल, अजय काहाल, गुरु काहारि, ऐरी, बावरी, शवर, से ही जाना जाता है। चैतन्यप्रवर्तित वैष्णव धर्ममें श्रेष्ठ जुअङ्ग, यादु, भादु, बौद्धधर्म । सार और निम्न श्रेणीके वैष्णव या सहजिया- सिद्धान्त उडुम्वरका विवरण दूसरे किसी प्रन्थमें . के मध्य हीन बौद्ध धर्म जो एक साथ मिला हुआ है, नहीं मिलता। किंतु विश्वामित्रसे शवर जातिको उत्पत्ति उसका भी यथेष्ट प्रमाण पाया गया है। युगल-भजन प्रभृति हुई है, यह बात ऋगवेदके ऐतरेय ब्राह्मणमें भी मिलती सहजियाका प्रधान अङ्ग जो विलुप्त बौद्ध धर्म के जालसे है। यथा-"त एतेऽन्धाः पुण्ड्राः शवराः पुलिन्दा मूतिया लिया गया है, वह नेपालसे आविष्कृत कानुभट्टका 'चर्या- इत्युदन्त्या वहवो भवन्ति । विश्वामित्राः दस्युनां भूयिष्ठाः।” चये विनिश्चर्य नामक बौद्धग्रन्थ पढ़नेसे मालूम होता (७६) है। पूलि साहब उत्कलाधिपति प्रतापरुद्रको सभामें सिद्धांत उड़ म्बकारने उक्त परिचयके मध्य एक पहले बौद्धोंका समादर और अन्तमें बुद्धनिग्रहके इति. विशेष बात लिखी है। हामका वर्णन कर गए हैं । पद्मालयाके तीन पुत्रोंमसे ज्येष्ठ पुत्रके साथ विष्णुः सिद्धान्त-उडुम्बर और उक्त उत्कलके इतिहासको की बातचीत हुई थी। विष्णु ने शङ्कासुरको मार कर एक साथ आलोचना करने से समझा जाता है, कि बावरी उन्हें सड़ दिया था। इस प्रकार पद्मालयाके चं धरने जातीय बौद्धाचार्यगण हो राजनिग्रहसे छिपे रूपमें रहने पांच सोंसे सम्भाषण किया था। । लगे; साथ साथ उन्होंने बुद्ध तथा बौद्धशक्तियोंका यहां पर सङ्ग शब्दका अर्थ है बौद्धसङ्कः। शून्य पुराणमें नाम भी छिपा रखा ! विष्णुने ही बुद्धका भवतार लिया भी इसी प्रकार 'सङ्घ'-की जगह 'सङ्क' शब्द व्यवहृत था. ऐसा विश्वास कर वे बुद्धको जगह विष्णुका पूजन हुआ है। बौद्धधर्मानभिज्ञ जनसाधारणके निकट : करने लगे। हिन्: देवदेवियोंको उपास्य मान कर भी वे 'स' सङ्कमें परिणत हुआ है। सड़के शत्र ओंको मार अपने प्रधान लक्षासे विचालत नहीं हुए उन्होंने शून्यवाद- कर बुद्धदेवके लिए ही ज्येष्ठ दुलिबावरी सङ्घाधिप हुए के मूलधर्मको ही सर्वप्रधान समझ रखा । ब्रह्मा, विष्णु थे। इसी प्रकार उनके तथा छोटे दो भाइयोंके वंशधरने तथा महेश्वर भी उनके सामने तुच्छ गिने जाने लगे। बौद्धसंडमें प्रवेश किया था। किंतु बाकी ६ शाखाने बौद्ध- पा महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्रोने इस ग्रन्थका आविष्कार धर्म ग्रहण नहीं किया, इसीलिए वे अस्पृश्य समझते ! किया है जो हजारों वर्ष पहलेका बंगलाभाषामें लिखा है। ग्रन्थ जाने लगे। नितान्त अश्लील है। सिद्धान्त उडम्बरकारने स्पष्ट लिखा है, "दुलि बावरी । * Sterling's (Orissa, ( Ed of 1904), p. 80-81