पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७०

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५६४ बौदधम धर्मभक्त धर्मपण्डित तथा डोमपण्डितगण जिस प्रकार : थी। हरिपुरमें एक समय जो वौद्धसंस्रव था, यहाँके हिन्दूसमाजमें अस्पृश्य हैं, राजनिग्रहसे हिन्दूसमाजके ध्वंसावशेषसे आविष्कृत जांगुलीतारासे उसका माभास द्वारा वावरी जाति भी उसी प्रकार अस्पृश्य हुई। मिलता है। बुद्धगुप्तने इस अशलमें हरिभज चैत्यका सिद्धान्त-उडम्बरकारका कहना है . “कलियुगे न छूइव। दर्शन किया था। यहां उन्होंने हितगर्भकन्या नामक एक बावरी छूले सकल पातक क्षय हव बोलि विष्णुमाया यौद्ध-उपासिकासे तथा एक प्रधान धर्मपण्डितकी करि गोप्य करि रखि अच्छति ।" जीवनीसे अनेक गुह्यतत्वका पता लगाया था। सिद्धांत-उडुम्बरसे जाना जाता है, कि बावरी जाति- .. फुकाढ़का संस्थान । में प्राचीन महायान सम्प्रदायकी तरह महाशून्यता या : फुक राढ़ या फुग राढ़-तिब्बतीय भाषामें 'फुग'का शून्यब्रह्मको हो जगत्का मूल वतला कर घोषणा को गई अर्थ है सिद्धगुहा। सिद्धगुहावेष्टित राढ़ प्रदेश ही फुग- है, अर्थात् उनके प्रच्छन्न बौद्धमतके मध्य महायोनका राढ़ है। वर्तमान बंगाल प्रदेशका पश्चिमदक्षिांश विशुद्ध शन्यवादका आभास मिलता है। जिस प्रकार "राद" कहलाता है उसी प्रकार मयूर- राजा प्रतापरुद्रके समय १६वीं शताब्दीमें बौद्धधर्म : भञ्जका पात्य प्रदेश भी अधिवासियोंके निकट राढ़' उत्कल में प्रवल हो गया था। कितु राजनिग्र से बौद्ध- नामसे परिचित है। केवल स्थानीय अधिवासिगण प्रभावका अवसान होने पर भी बौद्धसम्प्रदाय एकबारगी ही नहीं, वरन् उत्कलवासी भी मयूरभजको राढ़ कहते विलुप्त हो गया। सम्भवतः राजनिग्रहके उरसे बौद्धोंने ' हैं। इसी प्रकार हरिभक्षके निकटवर्ती सिद्धगुहावेधित उड़ीसाके गढ़जात-दुर्गम पार्वत्य प्रदेशमें आश्रय फुक) राढको मयूरभञ्जका पार्वत्य-प्रदेश कह सकते हैं। लिया था। पालगढ़का संस्थान । उत्कल के स्वाधीन राजा मुकुन्द देव थे । एक समय उड़ीसाके गढ़जातसमूहके अन्यतम वर्तमान पाल- उत्तरमें त्रिवेणी और दक्षिणमें गजाम तक इनके अधिकारमे लहरा राज्य हो भोट भमणकारीका पालगढ़ है। सुमते था। वे भी कुछ कुछ बौद्धानुरागी थे और उनके अधिकार हैं, कि इस समय यहां बौद्धपालराजाओंके वंशधरगण में बहुतसे बौद्धगण रहते थे, तिब्बतभापामे सुम्पो थाम्पो- राज्य करते थे और बौद्धकोत्तिका भी मभाष रचित पगसम जोनजम' ग्रन्थसे उसका पता चलता है : नहीं था। १७वीं शताब्दोमें जो बौद्धधर्मका क्षोणालोक अनेक १७वी शताब्दी में जहां बौद्ध-उपासिका हितगर्भकन्या स्थानों में प्रज्वलित था उसका कुछ कुछ प्रमाण मिलता रहती थी, धर्मपण्डितकी जीवनी और उनके प्रवर्तित है। तिब्बतीय वौद्धधम के इतिहासलेखक ):. \\ ulticl: गुह्यतत्त्वका जहां सभी आदरपूर्णक अध्ययन करते थे, ने भोटभाषामें रचित बुद्धगुप्त तथागतनाथका भ्रमणवृत्तांत जहां अनेक यति तथा अनेकानेक बौद्धग्रन्थका अभाव प्रकाशित किया है। उक्त महात्मा १६०८ ई० में भारत.. नहीं था, वह हरिभाचैत्य कहां है ? वर्षे आये थे। उनके भ्रमण-वृत्तांतसे जाना जाता है। मयूरभञ्जकी राजधानी वारिपदासे आठ कोसकी कि १७ वों शताब्दी में भी त्रिपुराके देवीकोट, हरिभञ्ज, दूरी पर अवस्थित वर्तमान बड़साई प्रामके बोधिपोलारके फुकराढ़ और पालगढ़में बहुत से बौद्धयति तथा बौद्ध- समीप क्षद्र चैत्यमूर्ति निकली है । उसके निकट पंथ विद्यमान थे। प्राचीन हरिभा चैत्यका जो अवस्थान था, वही उक्त __हरिभक्षका अवस्थान-निर्गाय । स्थानके जैसा प्रतीत होता है। बुद्धगुप्त तथागतनाथ पाळत्यत्रिपुराराज्यको देख कर नेपालके नाना स्थानोंके चैत्यकी अवस्था देख कर हरिभा नामक स्थानमें पधारे । इस स्थानको मयूरभा जान पड़ता है, कि जहां कोई एक वृहत् चैत्य है वहीं उस- भी कहते हैं। १७यों शताब्दी में अर्थात् बुद्धगुप्तके समय का आदर्शस्वरूप एक या एकसे अधिक छोटा चैत्य देला हरिहरभन्न प्रतिष्ठित हरिहरपुरमें मयूरभञ्जकी राजधानी जाता है । नेपालमें मध्ययुगके या वर्तमान चैत्यमें मादि-