पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७६

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५७० ब्रह्म ब्राह्म ( स० क्ली० ) गृहति पद्धते निरतिशयमहत्त्वलक्षण अवयघोका भेद स्वगतभर है, अर्थात् पल, पुष्प और वृद्धिमान् भवतीति वृहि वृद्धी ( बृहेनोच्च । उण ४११४५ ) फलादिके साथ वृक्षका जो भेद है, उसे स्वगत भेद मनिन् नकारस्याकारः रत्वञ्च । १ वेद । "तस्मादतद् ब्रह्म-: कहते हैं। एक वृक्षसे दूसरे पक्षमें भेद अवश्य ही है , नामरूपमन्नन जायते ।" ( श्रुति )२ तपस्या, तप । ३ सत्य। इसी भेदका नाम सजातीयभेद है। कारण, इस भेदके ४ तस्व, यथार्थ । ( अमर )५ सर्वगुणातीत विशुद्ध तुरोय प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों ही वृक्षजातीय हैं। शिला चित्स्वरूप, बैतन्यस्वरूप ब्रह्म, ज्ञानमय परमात्मा। माविको अपेक्षा नृक्षमें जो भेद है, वह विजातीय भेद है। वेदाम्तमें लिखा है- अनात्मवस्तुको तरह आत्मवस्तुमें अर्थात् ब्रह्ममें भेद. "अबानादिसकलजड़समूहोऽवस्तु, ब्रह्म व नित्यं । त्रयको आशङ्का हो सकती है । इस आशङ्काको निवृत्तिके वस्तु, तदन्यदखिलमनित्यं” अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र नित्य लिए एक मेवाद्वितीयम्' यह रूप निरूपित हुआ है। वस्तु है। ब्रह्मके अतिरिक्त अज्ञानादि समस्त जड़ : 'एक' पदके द्वारा स्वगत भेद, एवं' से सजातोय भेद और समूह अवस्तु और अनित्य हैं। श्रतिमें पाया जाता 'अद्वितीय' पद द्वारा विजातीय भेद निवारित होता है। है, कि "यतो वा इमानि भूतानि जातानि येन , जो एक अर्थात् निरंश वा निरवयव है, उसमें स्वगत भेद जातानि जोवन्ति यत् प्रयन्ति अभिसम्बिशन्ति । (श्रुति) हो नहीं सकता। क्योंकि, अंश वा अवयव द्वारा हो जिससे इस भूत समूहको उत्पत्ति हो कर स्थिति स्वगतभेद हुआ करता है। सद्वस्तुके अवयव नहीं हैं। हहै और जिसमें यह लीन होता है. वही ब्रह्म है । वेदान्त कारण, जो सावयव है, अवश्य उसकी उत्पत्ति होगी। दर्शनमें ब्रह्म-जिज्ञासाके स्थलमें 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' अवयवोंके परस्पर स'योग वा सन्निवेशके पूर्वमें साव- इस सूलके बाद 'जन्मायस्य यतः' इस सूत्रमें ब्रह्मका यव वस्तुका अस्तित्व नहीं रह सकता । अवयव संयोग- लक्षण वर्णित हुआ है। यहां अति संक्षेपसे वेदान्त के बाद सावयव वस्तुको उत्पत्ति होती है, यह कहना प्रतिपादित ब्रह्मका विषय लिखा जाता है। ही पड़ेगा। सुतरां सावयव वस्तुको उत्पत्ति है। "सदेव सोम्येदमप्र आसीदेकमेवद्वितीयम् ।" (श्रुति) जिसकी उत्पत्ति है, वह जगत्का आदि कारण नहीं हो इस जगत् सृष्टिके पहले केवल 'सन्' मात्र था, नाम और सकता। क्योंकि उसको उत्पत्ति भी कारणान्तरको रूप कुछ भी न था। समस्त एकमात्र और अद्वितीय : अपेक्षा रखती है। इस अवस्थामें सिद्ध होता है, कि था। आदि कारण वा सद्वस्तुके अवयव नहीं हैं। जिसके ___ "एतदात्म्यमिदं सर्प तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वममि अवयव नहीं हैं, उसके स्वगतभेद नहीं हो सकते । नाम श्वेतकेतो। (श्रुति) यह समस्त जगत् एतदात्मक और रूप सवस्तुके अवयव-रूपमें कल्पित नहीं हो अर्थात् सवस्तु हो इन सबको आत्मा है। वह सद्वस्तु सकते हैं। नामके अर्थमें घटादिका संज्ञा और रूपके एकमात्र सत्य है और वही आत्मा वा ब्रह्म है । हे श्वेत अर्थ में उनका आकार समझा जा सकता है। नाम और केतो! तुम्हीं वह ब्रह्म हो। वह सवस्तु ही सत्य है ।। रूपके उद्भवका नाम सृष्टि है सृष्टिके पूर्व नाम और रूपका इससे प्रमाणित होता है कि कार्य अर्थात् जगत् सत्य उद्भव नहीं होता । अतएव नाम और रूपको अंश रूपमें नहीं है, असत्य मर्थात् मिथ्या है। तुम वही हो, ऐसा कल्पना कर उनके द्वारा भी सवस्तुके स्वगत भेदका सम कहनेसे, जीवात्मा और परमात्मा एक , भिम्न नहीं।। थन किया जा सकता है। अब सिद्धान्त हुमा, कि ब्रह्ममें वही एक ब्रह्म है। 'एकमेवाद्वितीयम्'- 'एक' एव' स्वगत भेद नहीं हैं. और न रह सकता है। सबस्तु 'अद्वितीय' इन तीन पदोंके द्वारा सबस्तुम अर्थात् ब्रह्ममें अर्थात् ब्रह्मका स्वजातीय भेद भी असम्भव है। क्योंकि भेदनय निवारित हुए हैं। अनात्मा अर्थात् जगत्में तोन सवस्तुकी सजातीय षस्तु सत् स्वरूप होगी; और 'सत् तीन प्रकारका भेद देखा जाता है। जैसे---स्वगतभेद, | पदार्थ एकमात्र है। कारण 'सत्' सत्' इस प्रकारकी सजातीयमेद, भौर विजातीयभेद । अवयवके साथ एक आकारसे प्रतीयमान वस्तु एक ही होगो, नाना नहीं हो