पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


प्रम सकतो। दो सत्पदा मानने पर उममें परस्पर वैल- | दूसरेकी अपेक्षा रखता है। पूर्व-सिद्ध एकत्व उत्तरकाल- क्षण्य भी मामना पड़ेगा। सत् पदार्था में स्वाभाविक में व्यवह्नियमान नानात्व द्वारा वाधित नहीं हो सकता। वेलक्षण्य रहना असम्भव है । अतएव अन्य सत् कल्पनाका वरन् पूर्वसिद्ध एकत्व द्वारा पर-भावी नानात्व ही बाधित कोई प्रमाण नहीं । सत् पदार्थ एकमात्र होनेग्मे, सुतरां हो सकता है। निरपेक्ष होनेसे एकत्व प्रबल है, और अन्य पदार्थ न होनेसे, सत् पदार्थमें सजातीय भेदका सापेक्ष होनेसे नानात्व दुर्बल है। विरोधके स्थल पर होमा नितान्त असम्भव है । घट-सत्ता, पट सत्ता इत्यादि प्रबल दुर्बलको वाधित करता है, एकत्व प्रभेद नानात्व रूपसे सवस्तुमें सजातीय भेदकी प्रतीति होती है सही, अर्थात भेदका उपजीव्य है। प्रतियोगिहानके बिना किन्तु घराकाश, मठाकाश इत्यादिकी तरह वह भेद भी भेदका ज्ञान नहीं हो सकता। आश्रयके बिना कोई ठहर औपाधिक है, स्वाभाविक नहीं। नाम और रूप स्वरूप नहीं सकता। इसलिए भी भेद अभेदकी अपेक्षा दुर्वल है। उपाधिभेदसे सत् पदार्थके भेद भो सृष्टिके उत्तरकालमें | अतएव अभेद सत्य है और भेद मिथ्या। ब्रह्म एक और हो सकते हैं पूर्वकालमें नहीं। क्योंकि सृष्टिके पूर्व अद्वितीय है। उपनिषदमें यह विषय विस्तृतरूपसे उप- कालमें नाम और रूपका उद्भव ही नहीं हुआ। अत दिष्ट हुआ है। द्वैत उपदिष्ट न होने पर भी उपनिषद्में एव ब्रह्ममें सजातीयभेद नहीं है। स्वगत भेद और स- किसी किसी जगह छैतका आभास पाया जाता है । द्वैत जातीय भेदकी तरह सत्पदार्थमें विजातीय भेद भी नहीं और अद्वैत, इन दोनों में एक ही सत्य है, दूसरा काल्प- बतलाया जा सकता। कारण, जो सतका विजातीय निक है, यह अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि है वह सत् नहीं है, असत् है। जो असत् है वस्तु एकरूप होगी, दो रूप नहीं हो सकती। छैत- उसका अस्तित्व नहीं है और जिसका अस्तित्व को पारमार्मिक और अद्वैतको काल्पनिक कहनेसे एक ही नहीं है, यह भेदका प्रतियोगी नहीं हो सकता। विज्ञानसे सर्वविज्ञान-प्रतिक्षा भङ्ग होती है : उपादान जो विद्यमान है, वह अपर वस्तुसे भिन्न है , और अपर मानके लिए ही सत्यताका अवधारण असङ्गत होता है, वस्तु भी उससे भिन्न हो सकती है। जिसका अस्तित्व और ब्रह्मात्मका सिद्धिवत् निर्देश अनुपपन्न होता है। नहीं है, वह कुछ भी नहीं हो सकता। अतएव सत् सुतरां अद्वैत वा अभेद काल्पनिक है, पारमार्थिक, छैत पदार्थमें विजातीय भेद भी अजातपुत्रके नामकरणके समान वा भेद मिथ्या वा व्यवहारिक है, यही सिद्धान्त श्रुति- भलीक है। एक, एव, अद्वितीय, इन तीन पदोंके ब्राह्ममें | सङ्गत है। स्वगतभेद, सजातीय भेद और विजातीय भेद नहीं है, "यत्र हि तमिव भवति तदितर इतरं पश्यति" यही कहा गया है। (श्रुति ) जिस समय त सद्श होता है, उस समय सृष्टिके पहले अव तत्व अर्थात् 'एक ब्रह्म' इसे कोई भी एक दमरेको देख सकते हैं। श्रुतिमें "तमिव' है इस भस्वीकार नहीं कर सकता। जो वस्तुतः अद्वैत । "इव" शब्दके प्रयोगसे दैत्यका मिथ्यास्त्र प्रहापित है, वह कभी भी हैत नहीं हो सकता । वस्तुका होता है। अन्यथाभाव असम्भव है । आलोक कभी अन्धकार नहीं । “मन्दान्धकारे रज्जुः सर्प इव भवति ।” ( श्रुति ) हो सकता और न अन्धकार ही कभी भालोक होता है। वास्तबमें भेस और भोट मोनो मन्द अन्धकारमें रज्जु सर्पकी भांति दीखती है। ऐसे होनेसे दोनों सत्य नहीं हो सकते । सूक्ष्म ! स्थलमें 'सर्प-इव' कहनेसे सर्पका मिथ्यात्व जैसे बतलाया इघिसे विचार करनेसे माना गया है, उसी तरह समझना चाहिये। भेद मिथ्या है। अभेद शब्दका अथ एकत्व है और भेद- "मृत्योः स मृत्युमारप्नोति य इह नाने पश्यति ।" (श्रुति ) का भयं नानात्व। जो इस ब्रह्मको नाना रूपमें दर्शन करता है, एकत्वम्यवहार निरपेक्ष है, भौर नानात्व व्यवहार : वही मृत्यु द्वारा विनाशको प्राप्त होता है। इस जगह