पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७८

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भी 'नानेव' इई शब्दके प्रयोग द्वारा नानात्व वास्तविक ! बहुस्यामहमेवातः प्रजाथेयेति कामतः । नहीं हैं. नानात्व मिथ्या है, यही कहा गया है। "एक तपस्तप्त्वाऽसृजत् सर्व जगदित्याह तैत्तिरिः॥ सत्यं बहुधा कल्पयन्ति ।” (श्रुति ) एक ब्रह्मकी अनेक इदमग्रं सदेवासीत् बहुत्वाय तदैक्षत । रूपमें कल्पना होती है। लेख बढ़ जानेके भयसे प्रमाण तेजोऽवन्नापडजादीनि ससजति च सामगाः॥". . नहीं दिये गये। छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद् (पंचदशी दूत वि. ३६) तथा घेदान्तदर्शन देखनेसे इसके बहुत प्रमाण मिल इस अनन्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि के पहले केवल एकमात्र सकते हैं। ब्रह्मा ही विद्यमान थे, उस समय और कुछ भी विद्यमान अहतमतानुसार सृष्टि वस्तुतः सत्य नहीं है, काल्प: । न था। उस अद्वितीय ब्रह्मके मनमें सङ्कल्प हुआ, कि निक मात्र है। कल्पना द्वारा पारमार्थिक अद्वैतकी कोई : "मैं जगत्को सृष्टि करूंगा"। उनके इस सङ्कल्प मालसे भी क्षति नहीं हो सकती। जिसकी आंखें तिलमिला . ही चराचर जगत्की सृष्टि हो गई। तैत्तिरीय श्रुतिके गई हैं वा रोगयुक्त हैं, वह यदि एक चन्द्रमाको कई : देखनेसे मालूम होता है कि, ब्रह्मके सङ्कल्प मालसे ही चन्द्रमाकी भांति देखे, तो उसके देखनेसे चन्द्रमा अनेक आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी और औषधि आदि नहीं हो सकते। कारण, चन्द्रका अनेकत्व वास्तविक ' सभी वस्तु यथाक्रम उत्पन्न हुई। उसी ब्रह्मने-"मैं बहु नहीं हैं, वह उसकी आंखों में विकार होनेसे, निजी हो कर जगत्में परिष्याप्त होऊगा” ऐसा सङ्कल्प किया, कल्पना है। कल्पित रूप वस्तुका स्पर्श नहीं करता, और इसी सङ्कल्परूप तपोबलसे उन्होंने अनन्त ब्रह्माकी वस्तुके साथ कल्पितरूपका कोई सम्बन्ध नहीं। इसी : सृष्टि की है। तरह अविद्याके दोषसे हमारे विचित्र वस्तुओंका दर्शन छान्दोग्य उपनिषदमें भी कहा गया है कि, इस भपरि- करने पर भी उसके द्वारा प्रकृत रूपमें ब्रह्म जगदाकार सोम ब्रह्माण्ड सृष्टिके पहले और कुछ भी नहीं था। नहीं हो सकते। - केवल एकमात्र सत्स्वरूप ब्रह्म ही विद्यमान था। उन्होंने किसी किसी श्रुतिमें ब्रह्मके परिणामवादका आभास : " सङ्कल्प किया कि, नानाकारसे जगत् उत्पन्न होघे, उसी देखनेमें आता है। परन्तु अविद्या-कल्पित नाम रूपा- - समय ब्रह्मके उस सङ्कल्पके बलसे यह जगत् उत्पन्न हो त्मक रूपभेदसे ब्रह्म परिणाम व्यवहारके गोचर होने पर। गया। भी, द्वैत मिथ्यात्व और अद्वैत सत्यत्व बोधक श्रुतियोंके " " इन श्रुति प्रमाणोंके द्वारा सिद्ध होता है कि, ब्रह्म हो मतानुसार विवर्त्तवादको पारमार्थिकता सिद्ध होती है। एकमात्र जगत्कारण हैं। उन्हींसे सष्टि स्थिति और किन्तु परिणाम प्रतिपादनके विषयों श्रुतिका तात्पर्य : 4लय होता है। अखण्डचेतन, अरूप, अस्पर्श, अशब्द नहीं है। कारण, उस प्रकारका ब्रह्मात्मभाव ज्ञानमोक्षः । और अन्य ब्रह्मकी पाय घर शक्ति अमान है। अज्ञान- का साधन है। सहजबोध्य परिणाम प्रक्रियाके अनुसार। के प्रादुर्मापसे अन्तःकरणादिको उत्पत्ति होती है, अनन्तर सृष्टि है इसलिए श्रुतिमें 'नेति' 'नेति' अर्थात् यह ब्रह्म वे परिच्छिन्न जीव हैं, फिर उसीके तिरोभावमें अपरि. नहीं है, यह ब्रह्म नहीं है, इस प्रकारसे प्रपञ्चका निषेध ! स्छिन्न और निरञ्जन हैं। यह महान ऐशीशक्ति, जगद्- का निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्म भावको ही उपदेश दिया गया है। एक ब्रह्म बहुरूपमें कल्पित होते हैं। यह पहले ही योनि, अशानशकि, माया, सृष्टिशक्ति, मूलप्रकृति आदि- कहा जा चुका है, 'जन्माद्यस्य' यतो वा इमानि भूतानि । के मामसे परिभासित हुआ है। क्या अन्तः प्रपश्च और जातानि' कि ब्रह्मसे ही इस जगनको सृष्टि हुई है। क्या वाह्यप्रपञ्च, सभी अज्ञानका विलास है। इसीलिए "आत्मा वा इदमग्रेऽभूत् स ऐक्षत प्रजा इति । वह भ्रान्तिका विजृम्भण कहलाता है। सङ्कल्पेनासुजल्लाकान् स एतानिति बचाः ।। - "अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यर्थपञ्चकम् । खवाय्वग्निजलोर्योषध्यन्नदेहाः क्रमादमी । आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्र पं ततो इयम् ॥” (वेदान्तदशाङ्कर) सम्भूता ब्रह्मवस्तस्मादेतस्मादात्मनोऽग्विताः ॥ शक्तिरूपी ब्रह्माश्रित अमानने ब्रह्ममें वा ब्रह्माको