पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


५७२ जगत् दिखाया है। इसलिए जगत् और ब्रह्म अव विमिः : उत्कृष्ट सत्यके प्रावल्यसे माया है और मलिन सस्वके श्रित या एकावभासमें मासित है। यही कारण है कि प्रावल्यसे अविद्या, मायाके उपहिन ब्रह्म और अविद्याके अब प्रत्येक दृश्य ही पञ्चरूपी हो रहा है। (१) उहित जीव है । जोत्र केवल उपहित नहों, किन्तु अविद्या-. 'अस्ति' है, ( 'भाति' भासता है, ( ३ ) 'प्रिय' के वश्य भी है। माया ए 5 है, इसलिए ब्रह्म भी एक है। प्यारा लगता है, (४) 'रूप यह एक प्रकारका है, (५) मालिन्यके अल्पाधिवयके अनुसार अविद्या बहुत है। 'नाम' यह अमुक वस्तु है । इन पंचरूपोंमें प्रथमोक्त भिन्न तदनुसार जीव भी नाना है, जैसे सुर, असुर, पशु, पक्षी रूप तीन बह्म है, अवशिष्ट दो रूप जग ३ अर्थात् अज्ञान मनुष्य आदि । मायाको मायामें ज्ञानशक्तिका चरमोत्कर्ष बिकार हैं। अज्ञान विकार वा जगन् परमार्थतः सत्य है, इसलिए उसके उपहित ब्रह्म भो सधैश हैं म्वतन्त्र और नहीं है, इसीलिए कहा गया है कि, जगत् मिथ्या है, मत्र-नियन्ता हैं। जोव ज्ञानशक्तिकी अल्पताके कारण एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है। श्रवण, मनन और निदि- वैसा नहीं है। जैसे, एक ही आकाश, घट-रूप उपाधिमें ध्यासनादि द्वारा अज्ञान तिरोहित होता है। घटाकाश, उसके त्यागने पर महाकाश है, वैसे ही ब्रह्म स्वरूप और तटस्थ, इन दो लक्षणों द्वारा श्रुतिने . भी मनुज आदि उपाधि जीव और उसके त्याग करने ब्राह्म-निरूपण किया है। ब्रह्म जगत्कारण है, यह तटस्थ पर ब्रह्म हैं। लक्षण हैं, ब्रह्म सच्चिदानन्द, अखगड, एकरस और शास्त्र, युनि और अनुभव, इन तीनों प्रकारके अनु. अवय है, स्वरूप ही इसका लक्षण है। ब्रह्म जगत् कारण सन्धानस मालूम होता है कि, अस्तित्व और प्रकाश होने पर भी सांख्यकी प्रकृति और वैशेषिकके परमाणुकी. जिसके अधीन है, वह अपने में हो कल्पित है । जैसे, तरङ्ग तरह परिणामी और आरम्भिक नहीं हैं। वे स्वयं ही अपनी बुदबुद आदि जलके अधीन होनेसे जल में ही कल्पित हैं मायासे आकाशादिके रूपमें विनित हुए हैं। सुतरां अथात् उनको सत्ता जलमत्ताके अतिरिक्त नहीं है, उसी अभिन्न निमित्तोपादान विवत्तिका कारण है। अभिन्न तरह इस दृश्य ब्रह्माण्डका अस्तित्त्व और प्रकाश सच्चि- निमित्तोपपदका द्वष्टान्त मकड़ी है। मकड़ी मृज्यमान दानन्द ब्रह्मसत्ताक अधीन है। इससे स्थिर किया जाता सूत्रके प्रति स्वचैतन्य प्राधान्यसे निमित्तकारण है, और है, कि सच्चिदानन्द ब्रह्म हैं, चैतन्यमें कल्पित जीव इम स्वशरीर-प्राधान्यसे उपादान कारण है। मकड़ो जो सूत ब्रह्म कल्पित भावका साक्षात्कार करनेमें अमर्श बनाती है उसका उपादान वह कहीं अन्यसे नहीं लाती, : है। जैले, दर्पण को कालिमा दर्पणके स्वच्छ वह उसके शरीरमें ही है। म्वभावको प्रच्छन्न कर देती है, उसी तरह जगत् ब्रह्मका विकार नहीं है, विवर्त्त है । सचमुच अपने अनिर्वाचनीय अनादि अज्ञानने भी स्व-स्वरूपको ही जो वस्तु एक प्रकारसे अन्य प्रकार में रूपान्तरित हा : प्रच्छन्न कर दिया है। इमो ने अक्ष जाव हैन प्रपञ्चके जाती है वह विकार और मिथ्या है अन्यथा : मिथ्यात्वसे ज्ञात नहीं है । श्रयणादि द्वारा अज्ञान मालिन्य प्रतीत होनेसे उसे विवर्त्त समझना चाहिए । दुग्ध दधि परिमार्जिन होने पर फिर वे समझ मक्त है, कि मैं पूर्ण हो जाता है, यह विकार है। रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होनी ह, अनवच्छिन्न और मत्य ह । अन्य समम्त मेग्में और है। वह भी विवर्त्त है। जगत् ब्रह्मका विकार नहीं है। मेरे कल्पित हैं। मैं हो ब्रह्म हूं। किंतु विवर्त्त है । सुतरां यह दृश्य-जगत् इन्द्रजाल सदृश्य सृष्टिके पहले यह समस्त मत् अर्थात् ब्रह्म था, और तारिखकसत्ताशम्य है, अर्थात् मिथ्या है। कुछ भी न था, यह सब हो ब्रह्म है। अद्वय ब्रह्म ही ब्रह्म बिना व्यापारके स्वेच्छासे जगत्की सृष्टि करते आदितत्त्व है। इन सब श्रुतियोंके द्वारा सुव्यक्तरूपसे हैं। उनको इस प्रकारको इच्छा शक्तिका ही नाम माया अवय ब्रह्मतत्वका उपदेश किये जानेसे और उनके प्रति- है। गुणवती माया एक होने पर भी गुणके प्रभेदसे ही पादनार्थ तत्त्वमसि आदि महावाक्यका उपदेश करनेसे जीव और ब्रह्ममें इस प्रकारका विभाग प्रचलित है । : स्पष्टतया समझमें आता है कि 'त्वं ब्रह्म' तुम ही ब्रह्म हो। Vol. XV. 144