पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५८१

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चित् और अधित् अर्थात् जोव और जड़-रूप प्रपश्च- प्रमाण-द्वारा जिन बस्तुओका बोध होता है, ब्रह्म उन विशिष्ट आत्मा शिव अद्वितीय है, ये हो ब्रह्म है। यह सभीसे विजातीय हैं। ये केपलमान शाम्पगम्य है शिवरूप ब्रह्म ही कारण और कार्य है। इनका नाम विशिष्ट शास्त्रमें वे जिस प्रकारसे उपनिष्ट हुए हैं, वे उसीरूप है। शिवाईत है। चिदचित् सभी प्रपञ्च शिय नामक ग्रह्म- इस विषयमें सन्देह नहीं हो सकता। लौकिक दृष्टाल का शरीर है। वे जीवको तरह शरीरी होने पर भी के अनुसार उनके विषय विराध-भाशङ्का करना उचित उसको तरह दुःखके भोक्ता नहीं हैं। अनिष्ट भोगके नहीं है। कारण, घे लोकातीत वा अलौकिक हैं। प्रति शरीर-सम्बन्ध कारण नहीं है अर्थात् शरीरी होने ब्रह्ममें मायाशक्ति अचिन्त्य, अनन्त और विधिन पर भी अपने अज्ञान अनुवर्तना-जनित अनिष्टका भोग शक्ति-युक्त है। तादश शक्ति युक्त मायाशनि-विशिष्ट नहीं करते। जोव ईश्वर परवश है। ईश्वरको आशा- परमेश्वर अपनो शक्तिके अंश द्वारा प्रपञ्चाकारमें परि का अनुवर्तन न करनेसे उन्हें अनिष्ट भोगना पडता है। णत हैं, और स्वतः वा स्वयं प्रपश्चातीत हैं। ईश्वर स्वाधीन हैं, इसलिए उनके अनिष्ट-भोग नहीं है। ब्रह्म प्रपञ्चाकारमें परिणत होते है, इस विषय में शरीर और शरोरोको भांति--गुण और गुणोको तर जिज्ञास्य हो सकता है कि कृत्स्न अर्थात् समस्त ब्रह्म विशिष्टाद्वैतवाद शैवाचार्योका अनुमत है। मृत्तिका हो प्रपश्चारूपमें परिणत होता है, या बालका एक देश या और घटकी भांति कार्यकारणरूपमें तथा गुण और एकांश । इसके उत्तरमे यदि कहा जाय कि, कृत्स्न ब्रह्म गुणीको तरह विशेषण-विशेष्य र पमें बिना भावरहित्य जगदाकारमे अर्थात् कार्याकारमें परिणत होते है, तो हो प्रपञ्च और ब्रह्मके अनन्यत्य है। जैसे उपादान- मलोच्छेद हुआ जाता है । ब्रह्मके द्रष्टव्यत्व उपदेश तथा कारणके बिना कमका भाघ अर्थात् सत्ता नहीं रहतो, ' उसके उपायरूपमें श्रवणमननादि वा शमदमादि भी मृतिकाके बिना घट नहीं होता, सुवर्णके बिना कुण्डल अनावश्यक हैं। ब्रह्म यदि मृदादिकी भांति साषयव नहीं रहता, गुणके बिना गुण नहीं रहता, उसी तरह होते, तो उनका एकदंश कार्याकारमें परिणत वा एकदेश ब्रह्मके बिना प्रपञ्च-शनि नहीं रह सकती। उष्णताके यथावत् अवस्थित है, ऐसी कल्पनाकी जा सकती थी बिना जैसे अग्निके जामनेका कोई उपाय नही, उसी तरह। और द्रष्टव्यत्वादिका उपदेश भी मार्थक होता। क्योंकि शक्तिके बिमा ब्रह्मको भी नहीं जाना जा सकता। कार्याकारमें परिणत ब्रह्मांश अयत्नदष्ट होने पर भी जिसके बिना जिसका नाम नहीं होता, वही उसका | अपरिणत ब्रह्मांश भयन-दृष्ट नहीं है। परन्तु बह्मके अव. विशिष्ट है । गुणके बिना गुणीको नहीं जाना जा सकता यव नहीं माने जा सकते, कारण ब्रह्म निरवय है यह बात इसलिए गुणी गुणविशिष्ट है। प्रपश्चशक्तिके बिना ब्रह्मको अतिसिद्ध है। ब्रह्मके अवयव स्वाकार करनेसे श्रुतिका नहीं जाना जा सकता, इसीलिए ब्रह्म प्रपञ्चशक्तिविशिष्ट विरोध होता है। इसके उत्तरमें शैवाचार्योका कहना हैं। यही उनका स्वभाव। देवता और योगिगण कि ब्रह्म शास्त्र कसमधिगम्य है, प्रमाणान्तरगम्य नहीं। जिस भांति कारणास्तरकी अपेक्षा न रखते हुए ही शास्त्रमें ब्रह्मका कार्याकार परिणाम, निरवयवत्व और अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे नानासप सृष्टि कर डालते हैं, कार्य के बिना ब्रह्मका अवस्थान ये सभी विषय श्रुत ब्रह्मभी उसी तरह अचिन्त्यशक्तिके प्रभाषसे मानारूपमें हुए हैं। सुतरा उक्त आपत्ति की हो नहीं जा सकतो। परिणत होते हैं। नानारूपमें परिणत होने पर भी उनका भगवान् शङ्कराचार्य ने इन सब मतोंमें दोष दिखा कर एकत्व नष्ट नहीं होता। कहा है, कि ब्रह्मका परिणामवाय किमी प्रकार भी सङ्गत अचिन्त्य, अनन्त भौर विचित शक्ति ब्रह्ममें हो विद्यमान नही हो सकता। कारण कार्याकारमें परिणाम और हैं। ब्रह्मके असाध्य कुछ भी नहीं है, और म कुछ असम्भव अपरिणत ब्रह्मका अवस्थान ये दोनों बाते परस्पर है। अतएव यह सम्भव है, यह असम्भव है, इस प्रकारको विरुद्ध है। एक समयमें एक बस्तुके परिणाम और कल्पना ब्रह्मके लिए हो ही नहीं सकतो। लौकिक | मपरिणाम दोनों नहीं हो सकते। इसी प्रकार सावपत्य