पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५८२

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५७६ और निरवयवत्वं परस्पर विरुद्ध है। एक वस्तु एक करेंगे, यह हो ही नहीं सकता। पक्षान्तरमें मी जीव है, समयमें सावयष और निरषय हो यह कभी भी सम्भव अमृत बहम है, यह भी नहीं हो सकता। किसी प्रकार नहीं हो सकता। श्रुति भो असम्भव और विरुद्ध : भी स्वभावले अन्यथा नहीं हो सकता। जो लोग कहते अर्थ प्रतिपादन करने में असमर्थ हैं । योग्यता शाब्द. हैं कि शास्त्रानुसार कर्म और ज्ञान इन दोनों के द्वारा बोधका अन्यतम कारण है। अतएव शब्द अयोग्य अर्थ मर्त्य जीघको अमृतस्व प्राप्त होगा उनका यह मत भी प्रतिपादन करने में अक्षम है। असङ्गत है। क्योंकि, स्वभावतः अमृत बहमके भी यदि ___ "प्रावाणः प्लबम्ने बनस्पतयः सत्रमासत" अर्थात् मर्त्यता हो, तो मयं जीवका कर्मज्ञानसमुपयसाध्य पत्थर पानी में बहता है । वृक्षोंने यश किया था, इत्यादि अमृतभाव अर्थात् मोक्षावस्था स्थायी होगी, यह दुराशा असम्भावित अर्थ-बोधक अर्थवादयाक्यक यथात मात्र है। भगवान् शङ्कराचार्य ने यह सब देख कर बहम- अर्थ में जैसे तात्पर्य महीं है, अर्थान्तरमें तात्पर्य है, उसी विवर्तवाद पक्ष ही स्थिर किया। उनके मतसे यह म प्रकार परिणाम घोषक वाक्यके भी अर्थ-विशेषमें तात्पर्य : सुद्ध वा निर्विशेष हैं। प्रपञ्च सत्य नहीं, रज्जु-सादि करना पड़ेगा। ब्रह्य एकांशमें परिणत और अशान्तरमें की तरह मिथ्या है। इसलिए बह ममें कोई विशेष वा धर्म परिणत हैं, यह कल्पना भी युक्ति-सिद्ध नहीं है । इसमें नहीं है, वे निर्विशेष यह म अद्वितीय हैं। प्रपञ्च जब प्रश्न हो सकता है कि, कार्यकारमें परिणत ब्रहमांश ब्रह्मसे। मिथ्या है, वह मके अतिरिक्त वस्तु जब सत्य नहीं हैं, भिन्न है या अभिन्न । यदि भिन्न है, तो ब हमके कार्या- : तब यह म अद्वितीय हैं, यह अनायास ही बोध गम्य है। कारमें परिणत महीं हुभा। क्योंकि कार्याकारमें परि-: जीव बह मसे भिन्न नहीं है, यह बात एक सामान्य गत ब्रह्मांश ब्रहम नहीं है, वह मसे भिन्न है । एकके श्लोकमें कही गई है:--. परिणाममें दूसरेका परिणाम नहीं कहा जा सकता। "शोकार्द्धन प्रवक्ष्यामि यदुक्त ग्रन्थ कोटिभिः । मृसिका परिणाममें सुवर्णका परिणाम नहीं होता। ब्रह्म सत्यं जगन्मिया जीवो ब्रह्म व केवलम् ॥" पक्षान्तरमै कार्याकारमें परिणत ब्रहमांश यदि बहमसे काटि कोटि ग्रन्थों में जो कहा गया है, मैं श्लोकार्ड भिन्न न हो, अर्थात् अभिन्न-हो तो मूलोच्छेदकी द्वारा वही कहगा । वह यही है, वह म सत्य है, जगत् मापत्ति उपस्थित हातो है। परिणत अंशका बह म एक मिथ्या है, जोव ही बह म है । शङ्कराचार्यका यही अभि- बहमसे अमिन होने पर परिणत भौर बल्ल एक वस्तु कह- मत है। सभी अद्वैतवादियोंने एक वाक्यसे श्रुतिको लाती है। मुत सम्पूर्ण बहमके परिणामको अस्वीकार हो अद्व तवादका मूल प्रमाण माना है। श्रुतिके तात्पर नहीं किया जा सकता। यदि कहा जाय कि परिणत को पर्यालाचमासे जो निश्चित होगा, वह अवनतमस्तक- बह मांश बहमसे भिन्नामिन अर्थात् भिन्न और अभिन्न से स्वीकार करनेके लिए सभी वाध्य हैं। दोनों है। परिणत बह मका कारणरूपमें वह मसे अभिन्न श्वेतकेतुको बह मोपदेशकके स्थानमें दी हुई छान्दोग्य हैं और कार्य अपमें बह मसे भिन्न है। दृष्टान्तमें कहा उपनिषद्की एक आख्यायिकाका सशिम तात्पर्य यहां जा सकता है कि कुण्डलमुकुटादि सुवणरूपमें : प्रदर्शित किया जाता है। आरुणिने श्वेतकेतु नामक भिन्न हैं और कुण्डलमुकुटादिरूपमें भिन्न भेद और अपने पुत्रको कहा, 'हे श्वेतकेतो, गुरुकुलमें जा कर अभेद परस्पर विरुद्ध पदार्थ है, ये दोनों एक ब्रह्मचर्मका आचरण करो। क्योंकि, हमारे कुलमें कोई व्यक्ति समयमें एक पस्में रह ही नहीं सकते। कार्याकारमें बिमा अध्ययन किये बहमबन्धु महीं होता।' बादशवर्षीय परिणत अंश या तो बह मसे मिन्न हागा या अभिन्न बालक श्वेतकेतु पिताके उपदेशानुसार गुरुकुल में जा होगा। भिन्न भो हो भौर अभिन्न भो, यह हो नहीं। अध्ययन समाप्त कर चौबीस वर्षकी अवस्थामें अपने घर सकता। और भी विवेच्य विषय यह है कि बहम लौटे और वे अपनेको एक असामान्य विद्वान् समझाने स्वभावतः ममृत परिणाम-क्रमसे मयता प्राप्त लगे । यही कारण था कि, वे किसोसे बातचीत भी नहीं