पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५८३

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ब्रम ५७७ करते थे। पुत्रकी ऐसी अवस्था और अभिमानके प्रति असत्य है, वह मिथ्या है, यह कहना बाहुल्यमात्र है। लक्ष्य करके अरुणिने कहा, 'श्वेतकेतो! तुम अनुचान उपदेश देते समय आरुणिने पुनः पुनः कहा था। गामी हो अर्थात् अपनेको बड़े विद्वान् समझते हो “एतदात्म्यमिदं सर्व तत् सत्यं स आत्मां तत्त्वमसि - नेतकेतो !" और किसीके साथ बातचीत भी नहीं करते। अच्छा सदेव सम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।।" बतलाओ तो सही, तुमने गुरुके समक्ष ऐसा कोई वही सत् वस्तु एकमात्र सत्य है, वे ही वह म हैं प्रश्न किया था कि जिसका उत्तर यथावत् मिलने पर और वे तुम ही हो। तुम ही समस्त, एकमात्र और भश्रुत विषय श्रुत, अमत विषय मन और अज्ञात विषय अद्वितीय हो। इम श्रुतिले तात्पर्यका वर्णन पहले हो विज्ञात हो सकता हो ?' श्वेतकेतुने यह असम्भव . किया जा चुका है। समझ कर कहा- 'हे भगवन् ! यह किस प्रकार जीवात्मा और परमात्मा या वह्मका ऐक्य ही वेदान्त- सम्भव हो सकता है?' आरुणि बोले- हे प्रियदर्शन ! शस्त्रमें प्रतिपादित हुआ है। साधारणतः जीवात्मा जैसे एक मृत्पिण्ड विज्ञात हाने पर भी समस्त मृण्मय' ब्रह्मसे भिन्न रूपमें प्रतोयमान होने पर भी वेदान्तशास्त्र अर्थात् मृविकार विज्ञात होता है, एक नखनिकृन्तन समझा देते हैं कि जीवात्मा वास्तविक ब्रह्मके अतिरिक्त (नहरनी ) विक्षात होने पर कार्णायस अर्थात् कृष्ण-, नहीं है, ब्रह्मस्वरूप है । वेदान्तादि दर्शनशास्त्रका प्रयो. लौहका विकार विज्ञात होता है, क्योंकि मृत्तिका, लोह जन मुक्ति है। अज्ञान वा अविद्याकी निवृत्ति और और कृष्णायस यहो सत्य है, विकार केवल वाक्य द्वारा स्वस्वरूपमें आनन्द-प्राप्तिको मुक्ति कहते हैं। यह मुक्ति हो आरद्ध होता है, अर्थात् मृत्तिकादि संस्थानविशेषके जोव और ब्रह्मके ऐक्य साक्षात्कार माध्य है। अर्थात् अनुसार घटपटादि नाम होते हैं, परन्तु वास्तवमं जीव और ब्रह्मका ऐक्य साक्षात्कार होनेसे हो मुक्ति है। मृत्तिकादिके अतिरिक्त विकार नहीं है, उसी प्रकार एक आपत्ति हो सकती है, कि संसारदमाग भो स्व-स्वरूप विज्ञानमें सर्वविज्ञान सम्भवपर हो सकते हैं। उपा- आनन्दका अन्यथाभाव नहीं है। क्योंकि वस्तुस्वरूपमें दान मात्र ही सत्य है, विकार मिथ्या है। इस कारण अन्यथाभाव असम्भव है। अतएव स्व स्वरूप आनन्द जगत्का उपादान जान लेनेसे सब कुछ जाना जा सकता. नित्यप्राप्त होनेसे उनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अMIR है।' इस पर श्वेतकेतुने कहा-“हे भगवन् ! आप वस्तुकी प्राप्ति हो सकती है, जानित्यप्राप्त है, उसकी म उपदेश दीजियोना करने पर फिर प्राप्ति क्या हागा। स्व स्वरूप आनन्दकी प्राप्ति न आरुणिने उन्हें जगत्कारणका उपदेश दिया। इम' कर सकने पर जीव ब्रह्मका ऐक्य साक्षात्कार और उसका जगह एक विज्ञान में सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा ; साधन भी नहीं हो सकता। इसके उत्तर में वक्तव्य यह कर उसके उपादानके लिए जगत्कारणका उपदेश है, कि नित्यप्राप्त वस्तु भी मिथ्याज्ञान वा भ्रमवशतः दिया गया। विकार वस्तुगत्यो सत्य होने पर अप्राप्त मालूम होती हैं। यह भ्रम दूर होने पर वह प्राप्त कभी भी एक विज्ञानमें सर्व विज्ञान नहीं हो सकता कि रूपमें प्रतीयमान होती है। कण्ठगत स्वर्णहार नित्य- उपादान विज्ञान होने पर भी उपादेय अर्थात् उसका प्राप्त होने पर भी विस्मरणके कारण अप्राप्त और तदगत- विकार अविज्ञान रह सकता है। अतएव प्रतिपन्न होता है, में वही फिर प्राप्त प्रतीत होता है। उसी प्रकार उपादानके सिवा विकारका वास्तविक अस्तित्व नहीं आनन्द ब्रह्मका स्वरूप होने पर भो संसारदशामें है। उदाहरणार्थ -..."मृत्तिकेत्येव सत्यं, लोहमित्येव अविद्या दोषसे वह सम्यक् प्रतिभात नहीं होता, इसलिए सत्यं, कृष्णायसमित्येव सत्यं" ( श्रुति ) अर्थात् मृत्तिका' अप्राप्ति मालूम होता है। विद्याके द्वारा अविद्यासे निवृत्त हो सत्य है, लौह ही सत्य है, कृष्णलौह ही सत्य है। होनेसे वहो सम्यकपमें प्रतिभात होता है, इसलिए इस प्रकारसे उपादानकी सत्यता अवधारण करनेसे वह प्राप्त हुआ, ऐसा विवेचित होता है। विकारकी असत्यता स्पष्ट ही प्रतीत होती है। जो संसारावस्थामै अविद्या-दोषसे ब्रह्मका आनन्दरूपत्व Vol. xv. 145