पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५८४

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५७८ ब्रह्म विशेषरूपसे प्रतीयमान नहीं होता; किन्तु सामान्यरूपसे . असंसारी ब्रह्मको वस्तुगत्यो आवृत नहीं कर सकता। प्रतीयमान होता है। जैसे, किसी घरमें कुछ बालकोंके वेदा- परन्तु वह अवलोकयिता या बोद्धाकी बुद्धिको आवृत्त ध्ययन करते रहनेमे बगलके घरमें बैठे हुए उसके पिताको अवश्य करता है। इसीसे ब्रह्म आवरण-युक्त मालूम सामान्यरूपसे मालूम होता है, कि उनका पुत्र भी वेदा- पड़ते हैं। ब्रह्मका स्वरूप आवृत होनेसे प्रकृत ब्रह्मबोध ध्ययन कर रहा है, परन्तु उस पुत्रके वेदाध्ययनकी ध्वनि नहीं हो सकता। ऐसी दशामें अवलोकयिता वा बोद्धा विशेषरूपसे नहीं मालूम पड़ती, उसी प्रकार ब्रह्मका दिक्शून्य हो कर अब्रह्ममें ब्रह्म और अब्रह्मके धर्मको धर्म आनन्दरूपत्व संसारदशामें सामान्यरूपसे प्रतिभात ममझता है। इस प्रकारका बोध अध्यास कहलाता है। होने पर भी विशेषरूपसे प्रतिभात नहीं होता। मैं मनुष्य हो कर अब्रह्ममें ब्रह्माध्यासका उदारहण हूं। विशेषरूपसे प्रतिभात न होने पर भी किसी अवस्थामें क्योंकि स्थलत्वादि देहका धर्म में अध्यस्त हुआ है। भी ब्रह्मके आनन्दरूपत्वमें अन्यथा नहीं होता, : यह मेरा है, इत्यादि ममकारका नाम संसर्गाध्यास है। ब्रह्म चैतन्य स्वरूप है। ब्रह्मचैतन्यके प्रभावसे जड़ : यह अभ्यास परम्परा अनादि है। उसमें भी पूर्व पूर्वका समूह प्रकाशित होता है। जड़समूह स्वप्रकाश नहीं अध्यास वा तजनित संस्कार बादके अध्यासमें कारण है। इसलिए जड़वगै ब्रह्म नहीं है। ब्रह्म चेतन और है। ब्रह्म स्वभावतः अच्छेद्य, अभेद्य और अदाह्य है। नित्य हैं। ब्रह्मके शरीरादिकी ओर उनके सम्बन्धकी कोई भी ब्रह्मका इष्ट वा अनिष्ट नहीं कर सकता । उत्पत्ति और विनाश होने पर भी ब्रह्मकी उत्पत्ति और कारण, वास्तवमें ब्रह्मका इष्ट वा अनिष्ट कुछ है ही नहीं। विनाश नहीं है। इसलिए ब्रह्म नित्य है, जो नित्य है इसलिए जो ब्रह्मतत्त्वज्ञ हैं उनके रागद्वेष होना असम्भव वह असत्य नहीं हो सकता । अतएव ब्रह्म सत्य स्वरूप है। देह और इन्द्रियों आदिका इष्ट और अनिष्ट हो सकता है, अध्यासवशतः देहादिका इष्ट अनिष्ट ही "विज्ञानमानन्दं ब्रह्मा, सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह म ।" (श्रुति ) आत्मका इष्ट अनिष्ट समझा जाता हैं। सुतरां उस इष्ट जीव और ब्रह्म एक होने पर भी अनादि अविद्या वा और अनिष्पक विषयमें रागद्वेष-वशतः प्रवृत्तिका आवि- अज्ञानवश जीवात्माका संसार वा बन्धन होता है। र्भाव है, और प्रवृत्ति होनेसे आचरित कर्मका फल भोगना अक्षानकी आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियां हैं। पड़ता है। कम-फलका भोग सुखदुःखको उपलब्धि- कभी कभी रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है, रज्जुका के सिवा और कुछ भी नहीं है। इसलिए सुखदुःखको झान होने पर सर्पका भ्रम नहीं होता। रज्जुका अज्ञान . उपलब्धिके लिये अर्थात् कर्मफल भोगनके लिए जन्म- सर्प-भ्रमका कारण है। रज्जुका अज्ञान आवरण-शक्तिके परिग्रह करना पड़ता है । मोहान्ध मनुष्य भोगके लिए कर्म द्वारा रज्जु-स्वरूप पर आवरण डालता है, पीछे विक्षेप करता है और कर्म करनेके लिए भोग करता है। जिस शक्तिके द्वारा रज्जुमें सपका उद्भावन कराता है। ब्रह्म, । जातीय द्रष्यके उपयोगसे सुखानुभव होता है, उस जातीय और ब्रह्म विषयक अज्ञान भी आवरणशक्ति द्वारा ब्रह्म द्रव्यके सम्पादनको प्रवृत्ति स्वाभाविक और प्रत्यक्ष वा ब्रह्मस्वरूप पर आवरण डाल कर विक्षेपशक्तिसे ब्रह्ममें सिद्ध है। अध्यास इस अनर्थ परम्पराका निदान है । कर्तृत्व भोक्तृत्वादि धर्मका तथा आकाशादि प्रपञ्चका अध्यास भो अविद्याका कार्य होनेसे अविद्यामें शामिल उद्भावन करता है। आकाशमें बादल होने पर सूर्य- है। जब विद्याके द्वारा अविद्याका नाश हो जाता है, तब मण्डल दष्टिगोचर नहीं होता, परन्तु यह सत्य नहीं है। ब्रह्मका स्वरूप अवगत होता है। इससे फिर “सोऽह कारण थोड़ा-सा बादल बहुयोजन विस्तृत सूर्यमण्डलको ब्रह्म” यह ज्ञान बढ़भूत होता है। ढक नहीं सकता । मेघने देखनेवालेकी आखों पर पर्दा डाल अब समझा जा सकता है, कि ब्रह्म वास्तवमें असङ्ग दिया है, इसीसे उसमें आदित्यमण्डलके आवरणका हैं, जल में पद्मपत्रकी तरह निर्लिप्त हैं और सुखदुःखसे भ्रम होता है। इसी प्रकार परिच्छन्न अज्ञान अपरिच्छन्न रहित होने पर भी अविद्यावशतः ब्रह्मके संसार, पुण्य