पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५९७

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ब्रह्मचारो-ब्रह्मा ब्रह्मचारीको इन सब नियमोंका पालन कर जीवनका २ गन्धर्व विशेष, एक गन्धर्व । चतुर्थ भाग गुरु-गृहमें बिताना चाहिए। ब्रह्मचर्याश्रम- ब्रह्मचारिणी ( स० स्त्री. ) ब्रह्मणि वेदे चरतीति ब्रह्म-चर के बाद उन्हें गुरु-गृहसे लौट कर दार-परिग्रह यानी णिनि, स्त्रियां डीप । १ दुर्गा, पार्वतो। २ ब्रह्मचर्य विवाह करके गृहो बनना चाहिए । ( मनु० २ अ०) धारिणी स्त्री। ३ वारुणा वृक्ष। ४ ब्राह्मोशाक । ५ ___सामान्य ब्रह्मचर्य द्विज मात्रको ही धारण करना सरस्वती। ६ ब्रह्मवष्टिका, वरङ्गो । चाहिए, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों | ब्रह्मचोदन । स० वि० ) यक्षके प्रति ब्राह्मणों का प्रेरक । जातियोंको ही ब्रह्मचर्य अवलम्बन करना चाहिए। ब्रह्म- ब्रह्मज ( स० पुं० ) ब्रह्मणो जायते जन-ड । १ हिरण्यगर्भ । चारी अवस्थामें विशेष पीड़ादिके सिवा एक स्थानाहत | हिरण्यगर्भ सृष्टिके पहले ब्रह्मसे सृष्ट हुए । ब्रह्मने अन्न भोजन नहीं करना चाहिए। क्षत्रिय और वैश्य अपने शरीरसे विविध प्रजा-सृष्टिको इच्छा करके पहले ब्रह्मचारीको श्राद्ध-भोजनमें अधिकार नहीं है। ब्रह्मचारी- जलकी सृष्टि की। पीछे उसमें बीज डाला गया जिससे को ही मधु, मांस, अञ्जन, गुरुके सिवा अन्य व्यक्तिका | एक अएड निकला। उस अण्डसे सर्व लोकपितामह उच्छिष्ट भोजन, निष्ठुर वाक्य प्रयोग, स्त्री-संभोग, जीव ब्रह्माको उत्पत्ति हुई। अतएव ब्रह्मा ब्रह्मज हैं। २ ब्रह्मजात. हिंसा, उदयास्त समयमें सूर्यदर्शन, अश्लील अर्थात् मात्र, पञ्चभूतादि, जड़ जगत् प्रभृति । मिथ्यावाक्य वा जुगुप्सित वाक्य तथा परिवाद अर्थात् “यना वा इमानि भूतानि जायन्ते" ( श्रुति ) सत्य हो वा असत्य इसरेका दोषोल्लोखन आदि त्याग जिससे इन भूनोंको सृष्टि हुई, वही ब्रह्मज है। ब्रह्म देना चाहिए। ब्रह्मचारोको एक एक वेदके अध्ययनमें बारह ही इस जगतके मूल हैं, उन्हीं से इस जगत्की सृष्टि, वर्ष ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए ; इसमें असमर्थ होनेसे स्थित और लय हुआ करता है। पांच पांच वर्ष तो ब्रह्मचर्य धारण करना ही चाहिए। ब्रह्मजटा ( स० स्ना० ) ब्रह्मणो जटेव संहता । दमनक नैष्ठिक ब्रह्मचारीको आचार्य के समक्ष, आचायके वृक्ष, दौनेका पौधा। अभावमें उनके पुत्रके समीप, उनके अभावमें आचाय- ब्रह्मजन्म (सं० क्लो०) ब्रह्माणार्थ जन्म । उपनयन संस्कार, पत्लोके समक्ष और उनकी अनुपस्थिति में अग्निहोत्रीय उपनयन देनेसे ही ब्रह्मजन्म होता है। अग्निके समक्ष यावज्जोवन वास करना चाहिए । जिने "उत्पादकब्रह मदात्रार्गरीयान् ब्रह्मदः पिता । न्द्रिय ब्रह्मचारी उक्त विधिके अवलम्बन पूर्वक क्रमसे ब्रहमजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥" देहत्याग करें, तो उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है । इस संमार (मनु २२१४६) में फिर उन्हें जठर-यन्त्रणा नहीं भोगनी पड़ती। ब्रह्मजाया (सं० स्त्री०) १ ब्राह्मणपत्नी । २ जुहु । ये ऋग्वेद- (याज्ञवल्क्यस० १ अ.) के १०।१०६ सूक्तके ऋषि थे। ब्रह्मचः दो प्रकारका है-एक उपकुर्वाण और दूसरा ब्रह्मजार ( सं० पु० ) १ ब्राह्मणीका उपपति ।२ इन्द्र। नैष्ठिक। जो विधि-पूर्वक वेद अध्ययन करनेके बाद ब्रह्मजिज्ञासा (सं० स्त्री०) ब्रह्मणः जिज्ञासा । १ ब्रह्मावगति गृहस्थाश्रम अवलम्बन करते हैं. उन्हें उपकुर्वाण और फलक विचार । २ शारीरक सूत्र । वेदान्त देखा । जो मरणान्त पन्त ब्रह्मचर्य से रहते हैं, उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मजीवी ( सं० पु. ) श्रीत आदि कम करा कर जीविका ब्रह्मचारी काहते हैं। ( कूर्मपु० २ अ०) चलानेवाला। विष्ण पुराण में लिखा है, उपनयनके बाद ब्रह्मचर्य ब्रह्मजुष्ट (सं० स्त्री०) ब्रह्मणः जुष्टः । स्तव वा मन्बसे प्रीत । अवल वन पूर्वक गुरुगृहमें वेदाध्यन करना चाहिए। ब्रह्मजूत ( सं० त्रि.) स्तोत्र द्वारा आकृष्ट । "बालः कृतोपनयनो वेदाहरणतत्परः। ब्रह्मा (सं० पु०) ब्रह्म जानातीति ब्रह्म-झाक । १ श्रीगोपाल । गुरुगेहे बसेद्भप ! ब्रह्मचारी समाहितः॥" २ विष्णु। कार्तिकेय । (त्रि०) ४ ब्रह्मवेता, ब्रह्मको (विष्णुपु• ६१) जाननेवाला।