पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६०४

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ब्रह्मदेश सिवा और किसी विषयको सूचना नहीं मिलती। कर अपने राज्यका उद्धार किया और पगान तथा पेगु आराकानके प्रचलित प्रवादके ऊपर निर्भर करनेसे पता राज्य जीत कर उसको सीमा बढ़ा दी। बाद उनके लगता है कि किमी एक समयमें भारतीय हिंद और वंशधरोंने लगभग १४०४ ई० तक राज्य किया। उसो बौद्धगण इस देशमें आये थे। फिर पूर्वाञ्चलसे भी वर्ष राजा मिनमव मनके अत्याचारसे तंग आकर सब ब्रह्मोंने यहां आ कर उपनिवेश स्थापित किया था। उक्त प्रजा विगड़ गई जिससे वे राज्य छोड़ कर भाग गये। औपनिवेशिक दलके कोई भी आदिम अधिवासियोंके और बङ्गालके मुसलमान राजाओंको शरणमें पहुंचे। विरुद्धाचारी न हुए। इसके बाद बौद्धधर्म के प्रचारार्थ कुछ दिन बाद वे मुसलमानोंकी सहायतासे पुनः अपने शाक्यवंशीय एक राजा यहां आ कर राज्य करते थे। राज्य पर प्रतिष्ठित हुए। उसो सपयसे आराकानो इन्हीं के वंशधर २६ राजाके समयमें (१४६ ई०में ) मुद्रा पर विकृत पारमो और नागरी अक्षरमें नामादि यहां बौद्धधर्म का पूर्णरूपसे प्रचार हुआ था। लिखे रहते थे। उस समय और उसके परबत्ती कालमें ब्रह्मके विभिन्न विद्रोही प्रजादलने आवाराजकी शरण ली। आवा- प्रदेश कम्बोजके राजाओंके अधिकारमें थे, उनमेंसे कोई राजने वहां १४३० ई० तक राज्यशासन किया। उसके सेव, कोई वैष्णव और कोई वैश्य थे। कम्बोज देग्यो । । बाद आराकानराज्यमें उल्लेखयोग्य कोई घटना न घटी। ____स्वी शताब्दीके प्रारम्भमें मुसलमान-वणिक आरा- १६वीं शताब्दीके आरम्भमें पूर्वकी ओरसे ब्रह्मवासी और कान उपकूलमें आये । इसी वर्ण आराकानराज वङ्गविजय समुद्रपथसे पुत्तंगीज जलदस्युने आराकान पर आक्रमण करने गये और चट्टप्राममें उन्होंने एक कीर्तिस्तम्भ स्थापित किया । पुर्तगोजोंके उपद्रवसे मोहौङ्ग (प्राचीन आराकान) किया। १०वीं शताब्दी में प्रोमराजने आराकान पर नगर की रक्षा करनेके लिए १५३१ ई० में १८ फोट ऊंचो चढ़ाई की ; उस समय वहांकी राजधानी म्रोहौङ्ग नगर पत्थरकी दीवार बनाई गई थी । १५७१ ई०में उसके चारों में स्थापित हुई थी। उसके बाद पांच सौ वष तक यहां | ओर खाई खोदी गई। उसी समयसे आराकानी विशेष पर ब्रह्म, शान, तैलङ्ग और प्यस आदि विभिन्न जातिने उद्योगी हो रहते थे। १५६०से १५७० ई०के बीच उन्होंने चढ़ाई की। चट्टाग्राम जीत कर वहीं पर शासन करना शुरू कर दिया . बोधगया में प्राप्त १२वीं शताब्दीको शिलालिपिसे और आराकान-राजपुत्र उस समय वहांके राजा हुए। जाना जाता है, कि पगानराजने बङ्गाल पर आक्रमण धीरे धार मुगलसाम्राज्यके प्रतिद्वन्द्वी होनेकी इच्छासे किया। दिनाजपुरके राजमहल में जो प्राचीन शिला उन्होंने पुर्तगोज दस्युदलको अपने राज्यमें बुलाया और लिपि है, उसमें यहांके कम्बोजराज द्वारा शिवमन्दिर समुद्रोपकूलमें उनका बासस्थान नियुक्त कर दिया । प्रतिष्ठाको कथा लिखी है। सम्भवतः वे ही पगानराज चट्टग्राम ही उनकी दस्युताका प्रधान केन्द्रस्थल था। होंगे। ११३३ से ११५३ ई. तक वङ्ग, पेगु, पगान और यहां उन्होंने मुगलरणतरीकी दोनों ओर खड़े रह कर श्याम आदि प्रदेशके राजाओंने आराकानराज गव लयकी रणनिपुणताका परिचय दिया था और वारंवार जयलाभसे अधीनता स्वीकार की थी। गवलयके कीर्तिस्तम्भ महती उत्फुल्ल हो कर आश्रयदाता आराकान-राजकी अधीनता मन्दिरको १८२५ ई०में अगरेजीसेनाने तहस नहस कर तोड़ दी। १६०५ ई०में उद्धतस्वभाव पुर्तगीजोंको दिया। इसके एक सौ वर्ण वाद शान और तैलङ्ग जातिके उपर्यु परि आक्रमणसे यह स्थान विध्वस्तप्राय हो गया।

  • उस समय आराकानवासीने दक्षिण-पूर्व बङ्गालकी ओर

अन्तमें १२६४ ई०को राजा मिन्तिने विपक्षियोंको भगा अग्रसर हो कर सोनारगांवके बक्षीय राजासे राजकर वसूल किया था। . पातालपत्रमें लिखित ब्रह्मराजेतिहासमें कन्म्यिन राजवंशका पा आराकानमें प्रचलित राजचिह्नाङ्कित १२वीं शताब्दीकी जो राजत्वकाल लिखा है वह सम्पूर्ण अविश्वासजनक है। प्राचीन मुद्रा पाई गई है।