पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६०५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


ब्रह्मदेश । चट्टप्राममें पृथकरूपसे शासनविस्तार करते हुए देख कर (मून ) * के अधिकारमें थे। ब्रह्मवासिगण तैलङ्ग आराकानपति क्रुद्ध हुए और १६०६ ईमें उनको वहांसे राज्यको रामन्न बा रमनिया कहते थे। खुष्टजन्मके भगा दिया। विशेष विवरण पुर्न गीज शब्दमें देग्वी। बहुत पहले भारतीय औपनिवेसिकोंके द्वारा थातुन मगर' . १५थों शताब्दीके प्रारम्भसे १८ौंके शेपभाग तक स्थापित हुआ। वहांका ध्वमानशेष अब भी इस देशके इतिहासमें केवल युद्धके सिवा और किसी प्राचीनत्वका परिचय देता है। यह नगर समुद्रसे पांच विशेष घटनाका उल्लेख नहीं देखा जाना । इसके अन्त: कोस दृर नदी किनारे बसा हुआ है। नदीके मुंह गत खण्डराज्य पर्वतवेष्टित होने पर भी ब्रह्म और पर पङ्क जम जानने यहांके वाणिज्यका हाम हो गया तैलङ्गके अधिवासियोंने यथाक्रम यहांका राजासन अधि और नगर श्रोहीन हो कर ध्वसमें परिणत हुआ। कार किया था। १६वीं शताब्दीके अन्त में आया और यहांका प्रकृत इतिहास नहीं मिलने पर भी बौद्र इति- पेगु राजाओंके बीन घोरतर संग्राम हुआ। इधर आग : हामने पता लगता है, कि इम्बी मन ३०० वर्ष पहले कानपतिने वङ्गाधिपतिको हीनयल देख कर मेघना नदो : महाबोधिसड़के समय थातुन नगर ( सुवर्ण भूमि ) में दो तकका स्थान अपने दम्वल में कर लिया। तोङ्ग-गुके शासन धर्म प्रचारका भेजे गये थे। ४०३ ई० में मिहलमे बुद्ध- कर्ताकी सहायतासे उनके पुत्रने भी पेगुगजके विरुद्वा : घोष यहां वौद्धग्रन्थादि लाये थे। ११वीं शताब्दी तक चारी हो कर उक्त प्रदेश अधिकारमें रग्बनेको इच्छासे यह नगर विशेष समृद्धिसम्पन्न था। इसके बाद पगान- अपने पुर्तगीज कर्मचारी निकोटी ( Ili.lip chee lhi मबाट अनव्रतने इमै ध्यंम कर दिया। राजेतिहामने Nicote ) के ऊपर भार सौंप दिया। निकोटीने इस जाना जाता है, कि यहां ५६ गजाओंमे प्रायः १६८३ वर्ष प्रकार पदोन्नतिमे उह,प्त हो गजानुग्रह उच्छेद कर लग : नक गाय किया था। भग १३ वर्ष तक अपने बाहुबट से वहां का राज्यशासन प्रवाद है, कि थातुनमे भारतवासी ५७३ ई० में पेगु किया। अन्त में आवापनिने १६१३ ई०में उनको रणक्षेत्र- नगर आकर रहने लगे। उन्होंने ही पेगुमै राजधानी में मार कर इस प्रदेश पर पुनः अधिकार जमाया ।* स्थापित को। इसके तान वर्ष बाद मातांचन नगर नोमानी जाने का आहाय वमाया गया । रामन्न देशवामी उस समय उन्नतिको चरम ( अलोम्पा ) के अभ्युदयकालमें ब्रह्मगज्य एकच्छव हुआ. . सीमा पर चढ़े हुए थे और रामन्नका आयतन वेसिन था। उसी समय आराकानराज्य अन्तर्विष्टवर्ग विद- तक फैल गया था। मा वन राजव शके १७वे राजा लित होने पर १७०४ ई में राजपुत्र बोदव पयाने उसे तिष्यने दृमग धर्म ग्रहण किया। उसी समयसे देशीय आवा-साम्राज्यमें मिला लिया। इसी युद्धसे यथार्थ में गजवशका लोप हुआ। अनव्रतविजय ( लगभग १०५० वङसीमान्तमें ब्रह्मवासियोंका पदार्पण हुआ। अजगजने ई.) के वाद पेगु समृद्धिशाली हो उठा। उनके अनधिकार प्रवेशसे उत्स्यक्त हो कर १८२४ ईमें मात्ताधानके ममाप तकम्बुनिवासी मगद नामक एक युद्धघोषणा कर दो बाद १८२६ ई०में यान्दाबुको सन्धिके । व्यक्तिने विद्रोही दलमें मिल कर पेगु और मार्क्सवान अनुसार अगरेजोंको आराकान और तेनासेरोम प्रदेश नगर जोता। उनके विरुद्ध पगानसे प्रेरित मुसलमान क्षतिपूरण-स्वरूप मिला। सेनाको हरा कर उन्होंने धोरे धीरे सारा तैलङ्गराज्य थातुन, पेगु और मार्त्तावन आदि जनपद तैलङ्ग

  • ये ब्रह्मजातिकी एक विशिष्ट शाखा है। इनकी बोली

बहुत कुछ कम्बोज और आसामी भाषासे मिलती जुलती है।

  • भ्रमणकारी वाियरने लिखा है, कि १७वीं शताब्दीमें यह दक्षिण-भारतके करमण्डन उपकूनसे भारतवासी बृहमदेश

स्थान असंयतहृदय यूरोपियनों के द्वारा पूर्ण हुआ था। निकोटीके गए । कम्बोज आदि राज्यके साथ भारतीय संस्रव पुराणादिसे बाद शिवाष्टियन गखालिसने शनद्वीपमें पुर्तगीज-प्रभाव फैलाया था। जाना जाता है।