पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६०६

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· ब्रह्मदेश अपने अधीन कर लिया। पहले श्यामराजके अधीन काम इनके राजत्वकालमें पुर्तगोज नाविकगण ब्रह्मदेश करनेके कारण इस प्रकार उन्नत अवस्थामें भी वे कभी आये। उनके लिखे हुए विवरणसे ही उस समयका प्रभुभक्ति दिखलानेमें कुण्ठित न होते और अपने पूर्व पेगुराज्यका इतिहास मिलता है। पेगुके नये राजाने स्वामीको श्रद्धाभक्ति के साथ कुछ राजकर भी देते थे। आवा और श्यामराजके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे इधर श्यामराजने भी उन्हें खिलअत दी थी । १२९६ ई में पुर्तगोजसेना संग्रह को थी। पोछे वैदेशिकोंके साथ २२ वर्ष राज्यशासन कर वे इस लोकसे चल बसे। मित्रता करनेसे उन्हें विपरीत फल मिला और उसीसे १३२१ ई०में टाभय और तेनसिरीम प्रदेश पेगुराज्यके उनकी राज्यलक्ष्मी विदा हो गई। उनकी मृत्युके बाद अन्तभुक्त हुआ , इसीलिए श्यामराजके साथ घोरतर उनके साले बुरिन नौङ्ग १५५० ई०में पेगुसिंहासन पर युद्ध छिड़ा। दोनों में बड़ी भारी द्वेषता चली। १३४८ अधिरूढ़ हुए, इस पर प्रजावर्ग के मध्य विद्रोहवहि भभक ई०में राजा विन्यऊके राजत्वकालमें राजाके मध्य विशेष उठी। बाद उन्होंने अपने बाहुबलसे उद्धत प्रजावर्गको विप्लव संघटित हुआ था। एक ओर चेङ्गमई-शान शासित कर प्रोम, आवा, शानराजा और पश्चिममें जातिका उपद्रव और दूसरी ओर गृहविवादसे पीड़ित हो आमाम सीमा तक अधिकार जमाया और १५६२ ईमें कर वे तंग तंग आ गये और मार्क्सवानसे पेगु नगर राज श्यामराजा जीत कर अपने राजामें मिला लिया। इसके पार उठा ले आये। शानजातिको परितृप्त करके भी उन्हें छः वर्ष बाद (१५६६ ईमें ) श्यामराजामें पुनः प्रजा. गृह-विवादसे परित्राण न मिला। अनन्तर वे अपने पुत्र विद्रोह उपस्थित हुआ। इस पर उन्होंने दलबलके साथ विन्यन्ध द्वारा राजसिंहासनसे च्युत हुए । राजासन पर | वहां जा कर उसका.दमन किया। १५८१ ई०में उनके बैठ विन्यन्वने राजादिरित् नाम धारण कर प्रभूत प्रति मरने पर युवराज नन्दबुरिन राजसिंहासन पर बैठे। पत्तिके साथ राजाशासन किया। शत्रुके हाथसे रोजा उन्होंने दुष्ट श्यामवासियोंका दमन करनेके लिये चार की रक्षा करना ही उनके जीवनका प्रधान उद्देश्य था। बार युद्धकी तैयारी की , किन्तु अकृतकाय होनेसे क्रमशः प्रायः ३५ वर्ष तक वे आवाराजके साथ युद्ध में लगे रहे। उनका राजकोष शून्य हो गया और साथ ही साथ महा- अन्तमें १४०४ ई०में उन्होंने दलबलके साथ आवाराज्य मारि, दुर्भिक्ष तथा गृहविवाद उपस्थित हुआ। राजाके जा कर वहांके राजाको हरा दिया। उनकी मृत्युके वाद अत्याचार और निष्ठुर व्यवहारसे उत्पीडित हो कर करद लगभग एक सौ वर्ष तक पेगुराज्यने वर्तमान राजवंशके सामन्तोंने भी उन्हें परित्याग किया। अन्तमें इनके मामा शासनप्रभावसे शान्तभाव धारण किया और प्रजावर्गने तौग-गु-राजने आराकानपतिके साथ मिल कर १५६६ धीरप्रकृतिसे कृषिकार्यमें लिप्त रह कर अपना देश शस्य ईमें उन्हें सिंहासन परसे उतार दिया और ब्रह्मराज्यको पूर्ण बना दिया। कठोर अत्याचारसे वचाया। १५२६ ई०में उक्त वंशके अन्तिम राजा तकर्बुतने पितृ- राजशक्तिकी अवनति देख कर श्यामवासिगण पुनः सिंहासन प्राप्त किया। उनके कोई सन्तान न थी। जग उठे । वे लोग दल बांध बांध कर पेगुराजाको तहस आवाराज्यमें शानसरदारवंशका विस्तार देख कर पितृ- नहस करने लगे। इस प्रकार जनशून्य और श्रीभ्रष्ट जन- शनु होने पर भी वे तौङ्ग-गुराजवंशको हो प्राचीन ब्रह्म- पदमें राजा करने में आक्रमणकारियोंने कोई आस्था न राजवंशके प्रतिनिधिस्वरूप स्वीकार करते थे, तदनुसार दिखलाई । तविनश्वोतिका वह समृद्धिशाली राजा उसी १५३० ईमें तविनश्वेतिको राज्य मिला। वे उपयु परि समयसे निकोटीके शासनाधीन हुआ। १६१३ ई०में चार वष पेगु आक्रमणमें विफल मनोरथ होते गये। अन्तमें | आवापतिने अपनेको समर्थ समझ कर पुर्तगीजोंको १५३५ ई०में उन्होंने पेगुराजधानी अपनाई और उनके साले बुरिननौङ्गने सात मास अवरोधके बाद मार्त्तावान हराया और उनके अधिकृत स्थानोंको अपने राजामें नगर जीत लिया। उस समयसे तैलङ्गोंके मध्य एक नूतन राजवंशकी प्रतिष्ठा हुई।

  • पुर्तगीज इतिहासमें इनका Braginaco नाम लिखा है।