पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६०७

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ब्रह्मदेश मिला लिया। लगभग एक सौ वर्ष के बाद प्राचीन ब्रह्मवासियों ने कभी भी शांतहदयसे तैलङ्गराजके प्रभाव रामन्नदेश, पुनः यह्मवासियोंके .शासनाधोन हुआ। का समादर नहीं किया। १७८३ ई०में पुनः विद्रोहानल १७३५ ईमें विजित तैलङ्गगण विजेता आवापतिके . धधक उठा। युवराज बोदव-पयाने बड़ी दृढ़ताके साथ विरुद्ध खड़े हुए। उन लोगोंने केवल पेगूसे ही उन्हें : इस विद्रोहका दमन किया। मार भगाया था सो नहीं। लगभग बोस वर्ष तक उन्होंने . बौद्धधमका प्रभाव फैलानेके लिए ग्रह्मगण स्वभा- सारे ब्रह्मसाम्राज्यमें अपना दखल भी जमाया था । बाद वतः पालि भाषाके अनुरागी हुए; इसीलिप. उनकी भाश अलौङ्गपयाने अपने बाहुबलसे सारी ब्रह्मभूमि जीत ली में बहुत-से पालिशब्दका अपभ्रंश देखनेमें आता है.--- और युद्धसमाप्तिके बाद शान्तिलाभ करने पर वे रंगूनमें यहां तक, कि शिलालिपि आदिमें भी इस देशके विभिन्न राजधानी बना अक्षय कीर्तिकी स्थापना कर गए *। किंतु स्थानोंके नये नाम लिखे हुए हैं। । पाश्चात्य भौगोलिक


. .--- - : टलेमोने जो प्रदेश Chryse Regio नामसे उल्लेख किया

+ रामन्न प्रदेशके मोलमेन ( रामपुर ) नगरके निकट आतरान है, ब्रह्मराज दरवारके कागजादिमें वही सोणपरांत (स्वर्णा नदी के किनारे फर्मगुहा, गायङ्ग नदीके किनारे दन्मथ गुहा, साल- परांत ) नामसे लिखा है। महाराज वेङ्ग' नामक राजे- वीन नदीके किनारे पागात गुहा, कागुन ग्वाड़ीके किनारे कोगुन-, तिहासमें यहांके राजवंश की जो तालिका दी गई है, वह गुहा और दो.यानी नदीके किनारे बिनजी गुहामंदिर आदिमें बहुत प्राचीन और भारतीय बौद्धराजसंसाव-घटित बहुत-सी बौद्धमूर्तियों और बौद्धप्रभावके निदर्शन पाये गये है। है । इसके अलावा अनेकों भग्न अट्टालिकाओं में श्याम और काम्बोजके । अधिकारचिह्न देखने में आते हैं। Indian Antiquary, १३ जयबद्ध न जयवती और केतुमती। Vol. xxii. p. 327-366. १४ तानद्वीप पगान, म्यिनजंग, पिन्या और आधा।

  • पो-ऊ-दौल पर्वतके गुहामन्दिरसे प्राप्त मम्राट अलौङ्गपया- १५ कम्बोज

मान, न्यौंगवे, थिवा और मोमेक । के द्वितीय पुत्र राजा सिनव्यूइनकी १७७४ ई में उत्कीर्गा शिना रतनपुरमें उनकी राजधानी थी। किसी किसीके मतसे लिपिसे जाना जाता है, कि उन्होंने निम्नलिग्नित १५ सामन्त रत्नपुरका वर्तमान नाम आवा है और कोई मन्दालय (रतना- राज्यों पर आधिपत्य फैलाया था। पगय ) बतलाते हैं। जो कुछ हो, आवानगरके मिया रतनपुर राज्य। अन्तभुक्त जिला। राज्यके निकटवर्ती मान्दानय, अमरापुर आदि कोई भी नगर १ सुनापरान्त कले, तेन्यिन, यो, तिलिन और। ब्रहमके इतिहासमें वैसी प्रतिष्ठा नहीं पा सका है। सप्तजिला। राजा मिनव्यूइन-स्थापित शिनाफलकके अलावा भामोनगर- २ शिरिक्षेत्तर (श्रीक्षेत्रम् ) उदेतरित् और पानदोङ्ग । . वूमपुरी, रतनसिंह-येदनार्थ गा=श्वया, शेवदगोन--दिगुम्प- ३ रामन्न कुथेन, यौन म्या, मुत्तमा और पेंगु। छेटी, रंगून-तिगुस्प ( तिकुम्भ) नगरका भी इसी प्रकार नामा- ४ अयुत्तय ( अयोध्या) द्वारावती, योदया और कमानपैक न्तर दिखलाई पड़ता है। पगोदामें बुद्धके जो सब स्मृतिचिह्न हैं, ५ हल्लिपञ्च जिम्मे, लबोन और अनान् । वंदगान (तकुन) शब्दमें हैं। वे संस्कृत धानुगर्भ और सिंहली ६ लबरट्ट चन्दपुरि, सानपापाथत् और मैङ्गलोन भाषाके दागीय शब्दके अपभ्र'शी जान पड़ते हैं। ७ क्षेमवार कैंगतोन और कैंगककौंग।

  • बृहममें जो बुद्धागमन हुआ था, वह अनुमानमात्र है।

८ ज्योतिनगर कैंगयोन मैंगसे। यथार्थमें किस समय बौद्धपरिवाजकगण यहाँ गए थे, उसकी भी ६ महींशक मोगोक और कैतप्यिन । कोई स्थिरता नहीं है। यहाँका प्राचीनतम इतिहासांश विश्वास १० सेन ( चीनरट्ट) भामो, कौंगसिन । याग्य नहीं होने पर भी भारतसीमानबती चीनाधिकृत राज्यों के ११ आड़वी मोगौंग और मोनहिन । मध्ययुगको घटनासं बहुत कुछ मिलता जुलता है। किंतु दुःखका १२ मणिपुर 'कथे और न्येयिन। विषय है, कि हिंदू इतिहासमें उसका कोई भी उलेख नहीं है। Vol. xv. 151,