पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६११

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ममदेश । वाणिज्यपरिदश नके एक एक कर्मचारीनियोगकी ! थियोके राजकीय हत्याकाण्डके कुछ बाद ही मंग- प्यवस्था भी मिलो। दूसरे वर्ष मान्दालय अधिष्ठित रेजप्रतिनिधि शाव ( R, IB, Shaw (', I, E. ) साहबकी अंगरेज-प्रतिनिधि स्लाडेन (Major Sluclen) साहबके मन्दालय नगरमें मृत्यु हुई । अनन्तर बा साहब (Mr. 'तत्त्वावधानमें कप्तान विलियम आदि कई एक अंगरेज- St, Burlve ).नियुक्त हुए, किन्तु ज्यादा दिन घे राज. पाणिज्य देखने के लिये ब्रह्मदेश गये। राजप्रदत्त 'पेनान- दरवारमें न रह सके-वे दलबलके साथ आवानगरसे शक्या' नामक जहाज पर चढ़ कर वे लोग पान्थ नगरको भाग आये। अत्याचारी राजाके प्रभावसे उत्तेजित हो भोर चले , किंतु यूनानप्रदेशों में मुसलमानों के विद्रोहो कर ब्रह्मगण अंगरेजोंके विछे पो हो उठे। १८८०ई०में होनेसे उनका रास्ता रुक गया। डा० जान एएडरशन राजपुत्र नौङ्गवक सोमान्त प्रदेशमें राजविद्रोही हुए, ने उस समय ब्रह्मके उद्भिद्तत्वका संग्रह किया था। किन्तु होनवल होनेके कारण वे ज्यादा देर तक राज. १८६६ ईमें स्ट्रोभर साहब भामोनगरके प्रतिनिधि सैन्यके सामने न ठहर सके। अन्तमें उन्होंने अंगरेजों- एक हुए। उनके समयमें इरावती हो कर फ्लोटिला को शरण ली। उनकी देखरेख में वे कुछ दिन तक कल. कम्पनीमे मनुष्योंके आने जानेकी सुविधाके लिए एक कत्ते में रहे। १८८२ ई० में ब्रह्मराजने अंगरेजोंके साथ जहाज चलाया। ब्रह्मराजने भी अपने देश में वाणिज्यकी गोलमाल मिटानेको इच्छासे सिमला पहाड़ पर भारत- उन्नति देख कर दस्युके हाथसे वणिकोंकी रक्षा करनेके ! प्रतिनिधिके पास दूत भेजा, किन्तु इसका कोई फल न लिये कख्येन पर्वतके विपदस कुल स्थानमें सैन्यावास निकला। १८८६ ई०में लाई उफरिनके आदेशानुसार स्थापित किया। अंगरेजीसेनाने ब्रह्मको जीत कर भारतके अंतर्भूत कर १८७५ ई०को चीनराज्यके सालाई प्रदेशमें जानेकी लिया और ब्रह्मराज थिवो बन्दीभावमें भारतवर्ष लापे इच्छासे डा० एण्डरशन आदि मार्गारि साहबके साथ, गये। उस समय एक स्वतन्त्र अंगरेज शासनकर्ताके ब्रह्मराज्य हो कर चले। चीनसीमान्त पर पहुंचते ही हाथ ब्रह्मराज्यका शासनभार सौंपा गया। हाथ ब्रह्मराज्यका शाम मानवैङ्गके निकट मि० मार्गारि चीनदस्युके हाथसे मारे ब्रह्मका राजतन्त यथेच्छाचारिताके दोषसे दोषी गए और साथ साथ उस यात्राका मुख्य उद्देश्य जाता था। राजा अपने इच्छानुसार व्यक्तिविशेषको कठोर रहा। यंत्रणा, कारावास अथवा मृत्यु तकका दण्डादेश करते १८७८ ई० में राजा मेनदूनको मृत्यु होने पर उनके थे। उनके मत्रियोंका कार्य स्वतत्र था। ब्रह्मकी पुत्र थिवोंने जनताको अनुमतिसे राजसिंहासन अप म त्रिसभा दो भागों में बंटी थी--एक दल राजप्रासाद. नाया। राजासन पर बैठते ही उन्होंने १८७६ ई०में अपने के परिदर्शन में लगा रहता और दूसग शासनविभागके आत्मीयवर्गको मार डाला। इस पर अंगरेज-प्रतिनिधिने कर्तव्याकर्तव्य निरूपणमें नियोजित था । हत्दव उनकी निन्दा की ; क्योंकि उनकी ऐसी निष्ठुर प्रकृति नामक महासभासे हो सारे ब्रह्मसाम्राज का शासनादेश भविष्यत्में अंगरेजोंके लिये भी विपजनक हो सकती प्रचारित होता था। इस सभाके अधीन राजनियमः थो । भूतपूर्व राजचरित एकबारगी दोषमुक्त नहीं होने पर सस्कार और संगठन, मत्रिसभा तथा महाधर्माधिकरण भी, उनके राजत्वकालमें वैसा नृशंसहत्याकाण्ड कभी अधिष्ठित था। राजा नाममात्रको इसके सभापति नहीं हुआ था। वे धर्म भीरु और दयालु थे। बौद्धधर्ममें ! होते थे; उनके अभावमें युवराज अथवा दूसरे कोई उनकी प्रगाढ़ भक्ति थी और कभी भी घे धर्मयाजककी । राजपुरुष सभापतिके आसन पर बैठते थे; किंतु यथार्थ- बातके विरुद्ध काम नहीं करते थे। उन्होंने अपने धर्म - में प्रधान मंत्रो हो सभापतिका काम करता था। मतानुयायी कई एक नये पथ चलाये। अंगरेजोंके साथ उनकी मैत्री थो। अन्यदेशीय राजाओंके साथ बन्धुस्व. हत् सभाके कर्मचारियोंको चौदह श्रेणी थी। उनका स्थापन तथा राज्यके उन्नतिकल्पमें उनका विशेष काम परस्पर विभिन्न था- ध्यान था। डि-इसमें चार प्रधान मंत्रो (Secre- Vol xv. 152