पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६१४

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६०८ ब्रह्मदेश-प्रमद्विष ब्रह्मके अधिवासी साधारणतः कठोर परिश्रमी और ब्रह्मराज्यस्थित सभी मठमें तालपत्र और बाँससे बनाएं शिल्प निपुण होते हैं। नौका और गृहादिका निर्माण हुए कागज पर लिखी हुई पोथी नजर आती है। थतुन, तथा शिल्पनैपुण्यपूर्ण धर्ममठादि उनके अल्युत्कृष्ट निदर्शन पेगु, प्रोम आदिका विवरण उन उन शब्दमें देखो। हैं। शिल्पकार्यसे ब्रह्मोंके कोमल स्वभावका परिचय पेगुका शिवमदु पागोदा ब्रह्मका एक प्रधान और मिलता है सही, किंतु अत्यन्त सामान्य कारणसे ही वे विख्यात मन्दिर है। रङ्गन नगरके समीप शिल्पद्यागोल कुद्ध हो जाते हैं। मनुष्य-जीवन के प्रति उन्हें तनिक मन्दिर भी बहुत सुन्दर है। पर्वतके शिखर पर अवस्थित भी दया नहीं है। छोटी छोटी-सी बातके लिए भी वे होनेसे यह स्थान दूर देशवासीकी भी दूष्टि आकर्षण नरहत्या कर डालते हैं---यहां तक कि किसी दिन व्यञ्ज करता है और इसकी स्वर्णचूड़ा सूर्यकी किरणों में विभा- नादि खराब होनेसे वे अपनी प्रियतमा स्त्रीका प्राणनाश षित हो कर चारों ओर प्रकाश फैलाती है। मन्दिर- करने में भी कुण्ठित नहीं होते। दस्युवृत्ति तथा अत्या पाटिका और चतुर्दिकस्थ सौधमाला देवकीर्तिकी अपूर्व चार-व्यभिचार इनके जीवनका एक पौरुष जनक कार्य शोभा बढ़ाती है। नगरसे मन्दिर में आनेका जो रास्ता है, उसके स्थान स्थान पर गौतम बुद्धको प्रतिमूर्ति परि- यहांकी स्त्रियां परदानशीन नहीं होती-वे स्वच्छन्द- शोभित है। अमरावतीका राजप्रासाद भी शिल्पनैपुण्यमें से इधर उधर घूम सकती हैं। वाजारसे द्रष्य आदि कम नहीं है। खरीदना, घरका कामकाज करना, पण्यद्रव्य बेचना और ब्रह्मवासिगण उत्सव बड़े ही पक्षपाती हैं। प्रायः रेशमी कपड़ा बुनना इनका प्रधान कम है। विवाहसे प्रति सप्ताहमें एक महोत्सव हुआ करता है । धनी मनुष्य पहले वालिकागण बाजारमें फलमूलादि बेच कर जो के दाह कार्य, युवकोंके राहान् ( अर्हत् पुरोहित) दीक्षामें लाभ उठाती हैं । उसीसे वे अपना वस्त्रालङ्कार बनवातो ये लोग बहुत खर्च करते हैं। मे १२ वर्ष तक बालक मठप्रवेशके अधिकारी हैं। ब्रह्मदेशमें जो सम्नत् प्रचलित है, वह ६३६ ई०के ब्रह्मदैत्य (सं० पु० ) ब्रह्मा ब्राह्मणरूपो दैत्यः । प्रेतयोनि अप्रिल (वैशाख )से आरम्भ हुआ है। २६ या ३० ! प्राप्त ब्रह्मण, वह ब्राह्मण जो मर कर प्रेतयोनि पाता है। दिनका चान्द्रमास रूप बारह महीनेका वर्ष होता है। प्रति ब्रह्मदोष (सं० पु०) ब्रह्म-हत्या, ब्राह्मणको मारनेका दोष। मासके शुक्ल या कृष्ण पक्षसे मासगणना होती है। दिन- ब्रह्मदोषी (सं० त्रि०) वह जिसे ब्रह्महत्या लगी है। रात आठ पहरमें अर्थात् दिन और रात प्रति तीन घण्टे- ब्रह्मद्रव (सं० पु०) गङ्गा जल । के अन्तर विभक्त है। उस समय एक एक बार घण्टेकी ब्रह्मद्र म (सं० पु०) पलास, टेसू । भावाज होती है। ब्रह्मद्रोही (सं० वि०) ब्राह्मणोंसे बैर रखनेवाला । पहले हो लिखा जा चुका है, कि ब्रह्मको भाषामें ब्रह्मद्वार (सं० क्लो० ) ब्रह्मप्राप्तिकर पन्थ, खोपड़ीके बीच भनेक पालि और अपभ्रंश संस्कृत शब्दका प्रयोग है। माना हुआ वह छेद जिससे योगियोंके प्राण निक- ब्रह्मभाषाका प्रत्येक अक्षर ही भारतीय वर्णमालासे लिया लते हैं। गया है। इनके काव्यविभागकी जब तक विशेष आलो- ब्रह्मद्विष (स० वि०) ब्रह्मणे वेदाय विप्राय च द्वष्टि द्विष चना न की जाय, तब तक उसे समझना असम्भव है।

  • संस्कृत शब्दका ब्रह्मभाषामें परिवर्तन अमृत (अम्र क ), कर पहुंचे। यहां पेगुके शासनकर्त्ताने उनकी खूब खातिर की।

अभिषेक ( भिषिक ), चक्र ( चक), द्रघ्य (द्रप), कल्प ( कप) उक्त वर्ष के अप्रिल मासमें वात्सरिक उत्सव के समय वे अभ्यर्थित भृषि (रसि ) आदि है। हो कर नृत्यगीतादि देखने लगे। उस समय रामायणके राम- १७६५६ की २१वीं फरवरीको साइम साहब ( Aficheal रावणका युद्ध करना और हनुमानका इन्द्रगिरिसे भौषध खाना Symes ) प्रभृति कलकत्ता छोड़ ब्रह्मदेशमें भगरेजों के दूत बन यही अभिनय हुआ था।