पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६१९

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ब्राह्मवक्त-ब्रह्मविपद्धन ६१३ विष्णुपुराणके मतानुसार तपोलोकसे छः गुणा ऊपर , दीर्घ-आयु, प्रक्षा, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज प्राप्त करते हैं । सत्यलोक है। इसीको ब्रह्मलोक कहते हैं। बह्मवर्च्यस्विन (स० पु०) ब्रह्मणो वर्चः समासान्तविधेर- "पड़ गुणेन तपोलोकात् सत्यलोके विराजते । नित्यत्वात् न अन्समासान्तः ततोऽस्त्यर्थे विनि । ब्रहम- अपुनर्मारका यत्र ब्रह्मलोकोहि स स्मृतः ॥" तेजोयुक्त, बह मतेजवाला। (विष्णुपु० २।३ अ.) ब्रह्मवत्तं (सं० पु०) ब्रह्मणां ब्राहमणानां वत्त वत्तनं यस्मिन् । ब्रह्मैव लोकः। २ तुरीय बह्मस्वरूप । वृह मवर्त्तदेश। घेदान्त दर्शनमें लिखा है, कि जो नाडोरश्मिसम्बन्ध ब्रह्मवद्धन (स० क्लो०) बह मणस्तपसो वर्द्धनं यस्मात् । ताम्र, ताँबा । घटित अर्चिरादि पर्वविशिष्ट देवयानपथसे ब्रह्मलोकको ब्रह्मबल (सपु०) सम्प्रदायविशेष । गमन करते हैं, वे सब उपासकगण चन्द्रलोकगत उपा- ब्रह्मवल्ली (म० स्त्री० ) लताविशेष । सकोंकी तरह भोगक्षयके बाद पुनः इस लोकमें जन्म नहीं ब्रह्मवाटीय (सपु० ) मुनिभेद । लेते। इस पृथ्वीसे तृतीय स्वर्गमें ब्रह्मलोक है । वहां ब्रह्मवाद ( स० पु० ) ब्रह्मणो वेदस्य वादो वदनं पठन- 'अर' और 'न्य' नामक समुद्रतुल्य सुधाहद, अन्नमय और मिति यावत् । १ वेदपाठ, वेदका पढ़ना पढ़ाना।२ वह मदकर सरोवर तथा अमृतवर्षी अश्वत्थ है। यह स्थान सिद्धान्त जिसमें शुद्ध चैतन्य मात्रको सत्ता स्वीकार की तत्वज्ञानी ब्रह्मोपासकको छोड़ कर दूसरेके लिये अगम्य जाय, अनात्मकी सत्ता न मानो जाय । है। यह लोक अजेय ब्रह्मपुरी है। यहां प्रभु ब्रह्माके विनि ब्रह्मवादिन (स० पु०) ब्रह्मवादः वेदपाठोऽस्यास्तीति ब्रह्म- मित हिरण्यमय गृह है। उपासना द्वारा ब्रह्मलोक प्राप्त वाद णिनि । वेदवक्ता, वेदपाठक। पर्याय--घेदाम्ती। होनेसे फिर यहांसे लौटना नहीं पड़ता। उपासक बह्मा- ब्रह्मवादिनो ( स० स्त्री०) ब्रह्मवादिन्-डीप। गायनी। लोकमें जा कर अमर होते हैं अर्थात् मुक्तिलाभ करते हैं। ब्रह्मवाद्य (सक्ली०) ब्रह्मज्ञान विषयमें प्रतियोगिता। वेदान्त और ब्रह्म शब्द देखो। ब्रह्मवलुक (संक्लो०) तीर्थभेद । ब्रह्मवक्तृ ( स० पु० ) १ परब्रह्मरूप सत्यधर्मका प्रचारक । ब्रह्मवास (सं० पु०) ब्रह्मणो वासः। ब्रह्मलोक । २ वेदधर्मके प्रवर्तक आचार्य। ब्रह्मवाहस (सं० त्रि०) ब्रह्मणा मन्त्ररूपवेदेन ऊपते बह- ब्रह्मवत् ( स० वि० ) बलवा ब्रह्मज्ञान सम्पन्न । वेदसम्ब- कर्मणि वाहु असिच् णिश्च । मन्त्र द्वारा प्राप्यमान । न्धीय। ब्रह्मवित्त्व (सं० क्ली०) ब्रह्मविदो भावः त्व। ब्रह्मविद्का ब्रह्मवद (स.पु०) सम्प्रदायविशेष । भाव या धर्म। ब्रह्मवद्य (संक्ली० ) ब्रह्म वेदस्तस्य वदनं ( वद-सुपि-क्यप् ब्रह्मविद् (स.पु.) ब्रह्मस्वरूपतया वेत्ति आत्मानं विद्. च। पा १३।१।१.६) इति भावे यत् । ब्रह्माका वाक्य। क्विप् । १ ब्रह्मात्मैक्यवेत्ता । २ विष्णु । ३ शिव । (नि.) ब्रह्मवद्या ( स० त्रि०) ब्रह्मणा वेदेन उच्यते या ब्रह्मवद्य- | ४ वेदार्थज्ञाता, वेदका अर्थ जाननेवाला। टाप् । कथा। ब्रह्मविद्या ( स० स्त्री० ) ब्रह्मणो ब्रह्मविषयिणी या विया । ब्रह्मवध (संपु०) ब्राह्मणहत्या। १ ब्रह्मज्ञान । २ दुर्गा । ३ उपनिषद्भेद, वह विद्या जिसके ब्रह्मवध्या (संपु०) ब्रह्महत्या, ब्राह्मण-बध : द्वारा कोई व्यक्ति ब्रह्मको जान सके। ब्रह्मवध्याकृत (स क्ली० ) ब्राह्मण हत्याजनित पाप । ब्रह्मविद्यातीर्थ (सपु०) एक प्रन्थकार । ब्रह्मवनि (स० वि०) ब्राह्मणानुरक्त । ब्रह्मविद्विष (स.नि.) वेद वा ब्राह्मणकी हिंसा, शेष ब्रह्मवर्चस (सली . ) ब्रह्मणो वेदस्य तपसो वा वर्च- वा घृणाकारी। स्तेजः। १ वह शक्ति जो बामण तप और स्वाध्याय द्वार, ब्रह्मविवद्धन ( स० पु० ) ब्रह्मणो विवद्धना ६-तत्। १ प्राप्त करे। २ बहुमतेज । मनुमें लिखा है, कि ऋषिगण दीर्घ तपोवद्ध का विष्णु। (क्ली०) ३ तप आदिका विशेषरूप- काल तक सन्ध्याका अनुष्ठान करते हैं। इस कारण वे से यद्धन । Tol,xv, 154