पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६२३

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ब्रमहविस-ब्रह्माण्ड मृग, पक्षी, चण्डाल और पुक्कश आदि योनियोंमें जन्म | ब्रह्माण्ड ( स० क्ली० ) ब्रह्मणो जगत्स्रष्टुरण्डम् । १ चतु- देशभुवन, चौदहों भुवनोंका समूह, गोलक। बृह्मणा - श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोऽजाविमृगपक्षिणाम । विश्वसृजा कृतमण्डम् । २ भुवनकोष, विश्वगोलक । . चवडालपुक्कशानाञ्च ब्रह्महा योनिमृच्छति।" मनुमें लिखा है, कि स्वयंभू भगवान्ने प्रजासृष्टिको इच्छासे (मनु १२१५५) पहले जलकी (सृष्टि की और उसमें वीज फेंका। बीज ब्रह्महविस् (सं० क्ली० ) ब्रह्मैव हविरयंमाणमाज्य। पड़ते ही सूर्यके समान प्रकाशवाला स्वर्णाभ अंड या अय॑माण हविः। गोल उत्पन्न हुआ । पितामह ब्रह्माका इसी अंड या "ब्रह्मार्पणं बूमहविमाग्नो बह्मणा हुतम्। ज्योतिगोलकमें जन्म हुआ। उसमें अपने एक संवत्सर "ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ॥” (गीता ४।२४) तक निवास करके उन्होंने ध्य नबलसे उसके आधे माध दो खण्ड किये। ऊदचखण्ड में स्वर्ग आदि लोकोंकी और ब्रह्महुत (सं० क्ली०) ब्रह्मणि ब्राह्मणे हुतं दत्तं ब्रह्मपदमन अधोखण्डमें पृथ्वी आदिको रचना की तथा मध्यभागमें उपलक्षणं तेन नृमात्रे वोध्यं । पञ्चमहायज्ञके अन्तर्गत आकाश अष्टदिक और समुद्र आदि स्थापित किये। अतिथिपूजनरूप यज्ञविशेष। विश्वगोलक इसीलिये ब्रह्माण्ड कहा जाता है। ब्रह्महृदय (सं० पु० ) नक्षत्रभेद, प्रथमवर्गके १६ नक्षत्रों में (मनुसंहिता १ अध्याय) से एक नक्षत्र जिसे अङ्ग्रेजीमें कैपेल्ला ( Crjiella ) कहते _ विष्णुपुराणमें लिखा है, कि भगवान् ब्रह्माने एक अण्ड या गोल उत्पादन किया। वह प्राकृत अण्ड भूतों- ब्रह्महद्र (सं० पु० ) हृदविशेष । की सहायतासे धीरे धीरे बढ़ता गया । अव्यक्तरूप ब्रह्मा (सं० पु० ) ब्रह्म देखो। जगत्पति विष्णु व्यक्तरूपी हो ब्रह्मस्वरूपमें उस अण्डमें ब्रह्माक्षर ( सं० क्ली० ) प्रणव, ओङ्कार । व्यवस्थित हुए। सुमेरु इसका उल्व अर्थात् गर्भवेष्टन ब्रह्माक्षरमय (सं० वि० ) ब्रह्माक्षर-मयट । मंत्र। चर्म, अन्यान्य महीधर जरायु और समुद्र गर्भोदक हुआ । ब्रह्माप्रभू (सं० पु०) ब्रह्मणोऽ सम्मुखे भवतीति भू- पोछे उस अण्डसे पर्वत सहित समस्त द्वीप, समुद्र और क्विप, यशार्थ ब्रह्मणो देहाजातत्वात् तथात्वं । घोटक, सदेवासुर मनुष्य आदि उत्पन्न हुए। ब्रह्मके अण्डसे घोड़ा। उत्पन्न होनेके कारण इसका ब्रह्माण्ड नाम पड़ा। ब्रह्माजलि ( स० पु०) बह्मणे वेदपाठार्थ कृतो योऽ | (विष्णुपु०१२ अ.) अलिः। १ सामवेद पाठके समय स्वरविभागार्थ जो में श्रीकृष्णजन्मखण्डके ८४वें अध्याय- अञ्जलि की जाती है, उसका नाम ब्रह्माञ्जलि है। २ वेद-1 में ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका विवरण लिपिवद्ध है। पाठार्थ गुरुके निकट कर्त्तव्य विनयाञ्जलि । विस्तार हो जानेके भयसे यहां पर कुल नहीं लिखा ब्रह्माणी (स. स्त्री०) ब्रह्माणमणति कीर्तयतीति अण : गया । सूर्यसिद्धान्त और सिद्धान्त-शिरोमणि आदि शब्दे कमण्यण डीप, वा ब्रह्माणमानयति जीवयतीति प्रन्थोंमें भी ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति-कथाका वर्णन किया भन् प्राणने ण्यन्तादस्मात् कर्मणि अणि कृते (ोरनिटि । गया है। विस्तृत विवरण खगोल, पृथिवी और भूगोल शब्दमें पा ६४५१) इति णिलोपः । ततो ङोप, पूर्व पदादिति | देखा। णत्वश्च । ब्रह्माकी पत्नी । ब्रह्माके आधे शरीरसे २ महादान विशेष। पुण्यदिनमें तुलापुरुष दानके इनकी उत्पत्ति हुई है। इनका नामान्तर सावित्री, सरस्वती विधानानुसारसे यह दान विधेय है। सुवर्ण द्वारा और गायत्री है। २ दुर्गा। ३ रेणुका मामक गन्धद्रष्य । ब्रह्माण्ड प्रस्तुत करके उसमें अष्टदिग्गज, पड़वेदाङ्ग, ४ एक छोटी नदी जो कटकके जिलेमें वैतरणी नदीसे अष्टलोकपाल, ब्रह्मादि देवगण, उमा, लक्ष्मी, वसु, निकली है। आदित्य और मरुन् आदि अङ्कित करे । वह सुवर्ण- ___Vol. xv. 155.