पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६३८

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ब्राह्मसमाज आपको नस-नसरे संन्यासधर्म की महत्ता घुस चुकी उपक्रम हो रहा था, कि इसी समय राममोहन रायने थी। गाईस्थिक उन्ततिके लिए आपने जो जो कार्य जन्मग्रहण किया। जिस समय प्रधान विचारपति सर किये थे, सब आपको हेय मालूम होने लगे । ४० वर्षकी विलियम जोन्सने एशियादेशके और प्रधानतः भारत- अवस्थामें आप चतुर्थाश्रमको लक्षा बना कर, दोवानी वर्ष के ज्ञानरत्नोंके अनुसन्धानार्थ “एशियाटिक सोसा- पद छोड़, धर्मोग्नतिके लिए कलकत्ता पधारे। उस | इटो' स्थापित की थी, उस समय राममोहन राय ज्ञानरत्न समय आपकी त्यागबुद्धि ऐसी बलवती थी, कि अंग्रेज- संग्रहके लिए अकेले भारतके नाना प्रान्तोमें भ्रमण कर सरकारके सादर आह्वानके प्रति भी आपने बड़ी निभीं- रहे थे। पीछे उन्होंने भी यूरोपोय विद्वानोंकी तरह अनेक कतासे उदासीनताका परिचय दिया । तत्कालीन भारत- भाषाओं में अभिज्ञ हो कर उक्त कार्यमें प्राधान्य प्राप्त किया राज-प्रतिनिधि ( गवर्नर जनरल वहादुर के एक गुरुतर था। १८१४ ई०में आप कलकत्ता आये । उस वर्ष काय सम्पादनके लिए आपसे प्रार्थना करने पर भी, कलकत्तामें ईसामसीके विशपका आसन प्रतिष्ठित हुआ आपने गोतोक्त दैवसम्पत्साधनामें सर्वान्तःकरण लगा | था। इससे पहले कलकत्ता 'टाउन' ( Toun) मात्र था, दिया और उस पर कुछ भो ख्याल न किया। अब 'सिटी' ( (ity ) हो गया है। ईसाई मिशनरियां __ राममोहन रायने कलकत्ता और समस्त बंगालकी सिर्फ कर्तव्य निष्ठासे इस देशमें आ कर धर्मप्रचार करते अयस्था देख कर सर्वसाधारणके हितके लिए क्या क्या थे। फिर राजशक्तिकी सहायतासे वे भारतमें ईसाई- किया था, यह बात उनकी कार्यावलीसे स्पष्ट मालूम धर्म के प्रचारमें प्रयत्नशील हुए। ऐसे कठिन समयमें हो जाती है। वेदान्त ग्रन्थ हाथमें ले कर राममोहन राय उदित हुए। इस विस्तीर्ण भारतभूमिमें अब सूर्य, चन्द्र वा अग्नि ___राममोहन रायने कलकत्ता आ कर प्रथमतः अपने प्रभासम्पन्न हिन्दू राजन्यवर्ग का आधिपत्य नहीं है । अब देशीय लोगोंके धर्ममतमें विशोधन करनेको चेष्टा की। ब्राह्म और क्षात्र-शक्तिके संयोग-वियोगका विचार उसके लिए उन्होंने सबसे पहले वेदान्तसूत्रके सुविस्तृत निष्प्रयोजन है। शास्त्रानुसार राजा ही युग-परिचायक शङ्कर भाष्यका मर्मार्थ बंगलामें लिखा और उसे छपा कर हैं, अतएव मुसलमानोंके अधिकारसे भारतमें नूतन प्रकाशित एवं प्रचारित किया। इसके साथ ही वेदान्त- युगका आविर्भाव समझना चाहिए । फिलहाल अंग्रेजों-! शास्त्रके सारममका संकलन करके एक छोटी पुस्तिका का अधिकार है। इस नवतर युगके पहलेसे ही दूर- भी प्रचारित हुई थो। पीछे और भी कई एक उप- वती देशोंके सवर्द्धित ज्ञान, विज्ञान और सभ्यताका निषदोंका इसी प्रकारसे बङ्गानुवाद करके उनका प्रचार प्रकाश धीरे धीरे भारतक्षेत्रमें होने लगा था। सम्प्रति किया गया। इसके बाद ही, उन्होंने अंग्रेजी भाषामें समग्र पृथिवीकी ज्ञानोन्नति और सभ्यताका प्रवाह उक्त प्रन्थोंका अनुवाद प्रकाशित कराया। उक्त प्रन्थोंकी विद्य त्वेगसे इस प्राचीन क्षेत्रमें आ पहुंचा है। कई एक भूमिकाओंमें महात्मा राममोहनरायने अपना सृष्टि, स्थिति और प्रलयकी अतीतदेशीया ब्रह्मवाणी अभिप्राय व्यक्त किया है। उसमें उन्होंने अपने मनके भारत की अक्षय और चिरन्तन सम्पत्ति है। राममोहन भावको स्पष्टरूपसे व्यक्त करने में वाक्य विन्यासमें किसी राय अपनी पूर्वपुरुष-परम्परासे युगयुगान्तर प्रवाहिता प्रकारको बुटि नहीं रखी है। नीचे उनके कुछ वाक्य उद्धत उसी अमूल्य सम्पत्तिको प्राप्त कर उसीको मृतसंजीवनी किये जाते हैं, जिससे उनका संक्षिप्त अभिप्राय मालूम शक्तिके प्रभावसे सर्वश्र यो विधायिनी "ॐ तत्सत्" हो सकता है। आदि ब्रह्मवाणो उच्चारण-पूर्वक, उसी जोसे मनुष्यके वेदान्तसूत्रके अर्थ-व्याख्याके प्रारम्भमें आपने नान्दी सार्वभौमिक कल्याण-साधनके लिए खड़े हुए। वाक्यमें कहा है कि-"वेदमें पुनः पुनः प्रतिज्ञा करते हैं, कलकत्तामें अंग्रेजी राज्यको राजधानी प्रतिष्ठित कि सम्पूर्ण वेदमें ब्रह्मको कहा गया है और ब्रह्म ही वेदके होनेके साथ साथ ही बङ्गालमें एक नवीनतर युगका प्रतिपाद्य है।"