पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६३९

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नामसमाज ६३ - इस प्रन्थको भूमिकामें मापने लिखा है--"इस । भाषामें उसी मर्गकी अनेक पुस्तकें लिखीं । उन अकिञ्चनने वेदान्तशास्त्रका अर्थ भाषामें एक प्रकारसे पुस्तकोंमें "सद्रप परब्रह्मका उपदेश ही हिन्दूशास्त्रोंका यथासाध्य प्रकट किया है। इसको दृष्टिसे जानियेगा, कि मुख्य तात्पर्य है" यही पुनः पुनः कहा गया है । अंग्रेजी- 'हमारे शास्त्रानुसार अति पूर्व-परम्परासे और बुद्धिकी में बड़े ओजस्वल वचन बिन्यासमें कहा है कि इसी ब्रह्म- विवेचनासे जगत्के स्रष्टा, पाता और संहर्ता इत्यादि। ज्ञानके अभावसे हमारे देशमें अनेक दुर्गतियां हो रही हैं। विशेषणों द्वारा व्यक्त केवल ईश्वर ही उपास्य हुए हैं ।। उसको उद्दीपनाके सिवा हमारे ऐहिक और पारलिक अथवा स ाधि-विषय-क्षमतापन्न होनेसे ब्रह्ममय और इस | मङ्गल साधनके लिये और कोई भी उपाय नहीं है। इससे रूपमें घे ही वह साधनीय हुए हैं।" पहले आपके द्वारा प्रकाशित वेदान्तसार प्रथके अङ्ग- इन प्रन्थोंके प्रकाशित होने पर ब्राह्मणोंने नाना प्रकार रेजी अनुवादको पढ़ कर यूरोप और अमेरिकाको विद्वन्- से भापत्ति की थी। उसके उत्तरमें राममोहन रायने मण्डली चमत्कृत हो गई थी। इन्होंने बड़ी दृढ़ताके अपना यह सिद्धान्त प्रकट किया कि "जव ज्ञानके बिना साथ कहा था कि "हिंदेन" नामसे हिन्दुओं पर कलङ्का- मोक्ष नहीं होगा, तब सबके लिए शानकी साधना आव रोप और उसके लिये उनके प्रति अवज्ञाका व्यवहार श्यक है। इसमें वर्ण, आश्रम, वेदाध्ययनादिका विधि- | करना नितान्त अविहित है। निषेध घटा कर लोगोंको परमार्थसे भ्रष्ट करना अनुचित है। यतिको जिस प्रकार ब्रह्मविद्यामें अधिकार है, उसी * राममोहन रायने उत्तरकालमें जिस ब्राझसमाजकी प्रतिष्ठा प्रकार उत्तम गृहस्थको भी अधिकार है, कि वह ब्रह्मज्ञान की थी, वह किस प्रकारसे गठित हुई थी, इस बातका स्पष्टीकरण अर्जन करे। साधारणतः ज्ञान-साधनके समय प्रणव करनेके लिये हम उन अनुष्ठानोंकी आलोचना करते हैं। इस उपनिषदादिके श्रवण-मनन द्वारा आत्मामें एकनिष्ठा | प्रसङ्गमें और भी कई एक विषय दृष्टव्य हैं,- होनेका अनुष्ठान और इन्द्रिय-निग्रहमें यत्न, इतना ही | । राममोहनने पौराणिक मतके विषयमें कहा है- आवश्यक है। वणे श्रमाचार करनेसे उत्तमता है, परन्तु “पुराण अल्पबुद्धियों के बोधाधिकारके लिये रूपक बन कर ईश्वरके उसके बिना ब्रह्मज्ञान उत्पन्न नहीं होता, ऐसा नहीं है । माहात्म्यका वर्णन करते है ; परन्तु पुराण यह भी बार बार फलतः इन्द्रिय-दमन, शमदमादिका अभ्यास, परस्परमें दर्शाते हैं कि यह सब केवल अल्पमतियों के हितके लिये कहा गया प्रीति और श्रवण मननादि द्वारा ब्रह्मका साक्षात्कार है, जिससे पुराणमें दोषमात्र स्पर्श न कर सके।" करना, ये ही आवश्यक कर्तव्य हैं। ___२। किसी ईसाई मिशनरीने कहा है कि, इस देशके मनुष्य इस प्रकार ब्रह्मशान-साधनको कर्तव्यताका प्रतिपादन सर्व प्रकारको नीति और धर्मके विनाश करनेवाली अज्ञानता और कर राममोहन रायने 'गायत्रोका अर्थ' और 'गायनमा जड़तासे जाग्रत हो रहे हैं। इस बातसे स्वदेशीय पण्डितोंकी परमोपासना-विधानं' आदि पुस्तकोंका प्रचार किया, और अवमानना समझ राममोहन रायने उसका उत्तर दिया कि :- विनयके साथ विज्ञापन किया कि “वेद मन्त्रोंके अर्थको "मुझे खेद है कि आप इतने दिन इस देशमें रह कर भी इस देश- बिना समझे उनका व्यवहार करनेसे कोई लाभ नहीं, के लोगोंका विद्यानुशीलन और गार्हस्थ धर्म भी न समझ सके । बल्कि दोष है।" आपने और भी निर्देश किया, कि इधर इन कई वर्षोंमें केवल बंगालके लोगोंने ही परमार्थ सम्बन्धी "समझनेमें अनुकूलता हो, इस आशयसे शास्त्रोंका अर्थ तथा स्मृति, तर्क, व्याकरण, ज्योतिष आदि विषयके सेकड़ों ग्रंथ भाषामें अनुवादित किया है, मेरा और कुछ वक्तव्य नहीं रच कर प्रकाशित किये हैं। परन्तु मुझे आश्चर्य नहीं होता कि है, शास्त्रार्थ समझ कर जो कर्ताब्य हो, करें।" यह आपको अभी तक ज्ञात न हुआ हो, कारण आपने तथा प्रायः खदेशीय लोगों में "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्मतत्वको अन्यान्य सभी मिशनरियोंने इस देशके उत्तमत्त्व दर्शनके लिये एक घेदका मुख्य तात्पर्ण प्रतिपादन कर आपने तबिरुद्धवादो। साथ ही चकु खोल रखे हैं।" विदेशियोंको प्रबोधित करने के लिए १८५७६० में अंग्रेजी राममोहन राय भपनेको किसी प्रकारसे धर्मसंस्कारक Vol. xv, 159,