पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६४२

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६६ प्रामसमाज, थे। तदनन्तर रामचन्द्र विद्यावागीश वेदान्तदर्शनादिको लिखा गया था। उस दलील वयोवृद्ध ५ व्यक्ति और मालोचना तथा ब्राह्मसमाजके अभिप्रायानुसार धर्मतत्त्व- युवा वयसके ३ व्यक्ति द्रष्टी नियुक्त हुए थे । की व्याख्या करते थे। फिर सङ्गात होनेके बाद सभा- ब्राह्मसमाज स्थापनके पहले राममोहन रायने 'इउ. विसर्जित होती थी। गोविन्द माला इस सभाके गायक निटेरियन क्रिश्चियनोंके बल बढ़ानेके लिए जो कर्म किये और ताराचंद चक्रवती इस सभाके सम्पादक ( मन्त्री) थे, उनका परिचय पहले दिया जा चुका है। किन्तु थे। उनके ब्राह्मणत्वकी रक्षाके लिये देशीय और विदेशीय ब्राह्मसमाजमें जो सङ्गीत हुआ करता था, वह सद्यः इउनिटेरियन लोग उनके प्रति समष्टि न रख सके थे। परमार्थ भवोद्वीपक होता था। राममोहन राय वे क्रिश्चियन धर्ममें दक्षित न हुये थे, किन्तु सभी समय और उनके मित्रगण सङ्गीतरचनामें निपुण वेदको मान्य समझ कर जातिबन्धनकी तमाम क्रियाओं- थे। आत्मीय सभाके समय तक गीत रचा का अनुष्ठान करते थे। अतएव उनकी धर्म व्यक्ति और जा कर उसी सभामें वह सुनाया जाता था। कार्य-परम्पराको देखते हुए उन्हें क्रिश्चियन कैसे कहा जा अन्यान्य विषयोंकी तरह इस विषयमें भी आपत्ति को सकता है ? इस प्रकार के अनेक प्रश्न उस विशुद्धसिद्धान्त गई थी। विचारके समय राममोहन रायको सिद्ध करना क्रिश्चियन मंडली में उपस्थित हुआ करते थे। उसमें आदम पड़ा था, कि धमचर्चामें सङ्गीत होनेसे कुछ दोष नहीं साहब और राममोहन रायको पत्र द्वारा अनेक जवाब है, शास्त्र में इसकी विधि है। फिर भी विरोधियोंने देने पड़े थे। १८२७ ई० तक आदम साहबको आशा आत्मीय सभा और ब्रह्म सभाकी नाना प्रकारसे निन्दा रही, कि वे राममोहन रायके साथ एक साथ ईश्वरो- करने में कसर न छोड़ो थी । परन्तु जीव, ईश्वर और सृष्टि पासना करते रहेंगे। दूसरे वर्ष ब्राह्मसमाजका कार्य चलते विषयक आयन्त चिन्तायुक्त भावगम्भीर ब्रह्मसङ्गीतके रहने पर बहुत उहापोहके बाद आदम साहबने स्थिर श्रवण करते रहनेसे लोगोंकी विरुद्ध मतिने पीछेसे अनु किया, कि इस धैदिक भावापन्न सभाके साथ उनकी कूलता अवलम्बन की थी। तभीसे 'ब्रह्मसभाका सङ्गीत' एकता नहीं हो सकतो। पूर्वोक्त द्रष्टडोड्की दलोलमें वा 'राममोहन रायका संङ्गोत' एक भिन्न प्रकृतिमें स्पष्ट लिखा था, कि इस उपासना मन्दिरमें सभी जाति, शामिल किया जाता है और उसका अब भी काफी वर्ण और सम्प्रदायके मनुष्य विनम्रभावसे श्रवण- आदर है। मननादि द्वारा जगत्के एकमात्र स्रष्टा पाता परमेश्वरको ___एक वर्ष पांच मास इस स्थानमें ब्राह्मसमाजकी उपासना कर सकेंगे। इस स्थानमें किसी धर्म-सम्प्रदाय उपासना निर्वाहित होनेके वाद, शक सं० १७५१में इसके के कोई विशेष चिह्न नहीं रहेगा या किसी धर्मसम्प्रदाय- बगल में हो नवीन भवनमें ब्राह्मसमाज लाया गया। जो के प्रति किसी अंशमें विरोधाचरण न होगा। इस कि अब भी वहीं मौजूद है । इसके दो सप्ताह पहले ता० प्रकार सर्वभौमिक धर्म-लक्षण होनेसे भी राममोहन राय- ८ जनवरी १८३० ई० में इस समाजगृहका एक 'द्रष्टडोड' के हृदयके मित्र आदम साहब इस सभाके सम्पर्कसे अलग रहे।

  • शक सं० १७५२ में श्रीयुत् ताराचंद चक्रवर्तीक बाद वस्तुतः ब्रह्मतत्त्ववित् बिना हुए लोग सार्वभौमिक

श्रीयुत विश्वम्भर दास सम्पादक हुए। १७५४ शकमें राममोहन धर्म-पालनमें समर्थ नहीं हो सकते । अतएव, राममोहन रायके ज्येष्ठ पुत्र श्रीयुत् राधापूसाद राय इस समाजके न्यासी ( ट्रष्टी ) और सम्पादक (मंत्री) हुए। पश्चात् १७५५ में ट्रष्ट-दाताओं के नाम-द्वारिकानाथ ठाकुर, कालीनाथराय, श्रीयुत रामचंद्र गलपाध्यायने सम्पादकका कार्य किया। प्रसन्न कुमार ठाकुर, रामचन्द्र विद्यावागीश और राममोहन राय । ___ कनकत्तामें ५५ नं० अपर चितपुर रोडवाले मकानमें ट्रष्ट-गृहीता वा दृष्टियों के नाम- कुपठनाथ राय, राधाप्रसाद राय 'आदि ब्राह्मसमाज' स्थापित है। और रमाथ ठाकुर।