पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६४४

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६ ब्राह्मसमाज • ब्राह्मसमाजकी प्रतिष्ठाके लिए महात्मा राममोहन : माघ मासमें ही इस विरोधकारी धर्मसभाकी नीवं पड़ी। राय धर्मबलसे अनुप्राणित हो कर वेद-विहित ब्रह्मो-! इसके ६ दिन बाद ही ब्रह्मसभा स्वकीय नूतन मन्दिरमें पासना-रूप धर्म-प्रचारमें प्रणोदित हुए थे। उस प्रसङ्गमें! आसन जमा कर बैठी। इसी प्रकार धर्मसभाके संस्था- उन्हें समाज-सस्काररूप और भी एक दुष्कर कार्यमें : पनार्थ एक मन्दिरके लिए भी चन्दा इकट्ठा हुआ, परन्तु हस्तक्षेप करना पड़ा था। वह था भारतभूमिको चिर- वह स्थायी न हुआ। शक सं० १७५१में पौष और माघ न्तन प्रचलित मतीदाह वा सहमरण-प्रथाका निवारण । : मासमें इस घटना पर कलकत्ताके हिन्दू समाजने भारी ब्रह्मज्ञान के प्रभावसे उत्तर महात्माने इस लोमहर्षणकर्म- आन्दोलन उठाया था, यह उस समयके सामयिक प्रवृत्तिको निवृत्ति को थी । मतीदाह वा सहमरण देखो। साहित्यके अवलोकनसे ज्ञात होता है।

इधर तो यह अमल निवारित हुआ और उधर कुछ भी हो, गोतोक्त ज्ञानाग्निका प्रभाव होते हुए

मङ्गलमूल ब्राह्मसमाजका गृह-निर्माणका कार्य समाप्त भी भारतभूमिमें कर्मबीजसे शाखा प्रशाखायुक्त एताद्दश हुआ। राममोहन रायने नारीहत्याके बदले ब्रह्मचर्यके । एक कण्टकवृक्षका उद्भव हुआ था, कि जिसका छेदन मङ्गलदोपको प्रज्वलित कर (माघ महोनेमें) ब्राह्मसमाज- और दाहकर्म माहात्मा राममोहन राय द्वारा सम्पादित के स्वकीय नवीन भवन में ब्रह्मोपासाना प्रारम्भ कर दो। हुआ। यह भारतको एक प्रकृष्ट ऐतिहासिक घटना . यह घटना ब्राह्मसमाजके लिए मूलतः अनुकूल हुई। है। इस कण्टक जालके अपगमसे हिन्दूविधवाओंका सहो, परन्तु कार्यतः प्रतिकूल ठहरी। सतीदाहके पक्ष मनूक्त ब्रह्मचर्याका तथा शास्त्रोक्त मुक्तिलाभका मार्ग समर्थनकारियोंने इस आईनके खण्डनके लिए ब्राह्म- प्रशस्त हुआ है, इसमें सन्देह नहीं। समाजके प्रतिपक्षी एक समाजको सृष्टि कर डाली। राममोहन रायके मन्त्रणारूप सूर्यरश्मिसे कठोर सतीदाह प्रथाका अपकलङ्क अपसारित होने पर, हिन्दू

  • भारतभूमिमें जितनी बार ब्रह्मज्ञानकी उद्दीपना हुई है,

जाति अन्य सभ्य जातियोंके समक्ष मस्तक ऊंचा करने में उतनी ही बार स्वर्गमुख-कामना-मूलक यागयशादि कर्मनिवारण समर्थ हुई थी। इस सतोदाहको रोकनेके लिए उन्हें उसका प्रधान लक्ष्य था। कर्मप्रसक्ति ज्ञानकी सान्तात् विरोधिनी सतोदाहप्रथाके समर्थकोंके विरुद्ध विलायत-यात्रा हैं। ज्ञानी कहते हैं, कर्म द्वारा मुक्तिलाभकी चेष्टा, रक्त द्वारा रक्त करनी पड़ी थी। इसके लिए धर्मप्राण राममोहन उस धोना, वा पङ्क द्वारा पदूषित स्थानकी मार्जना करना, अथवा समय अपने द्वारा प्रतिष्ठित ब्राह्मसमाजको भी उसी सुरा द्वारा सुरा शोधन करनेके समान है। ( मनु ३।१३२, अवस्थामें छोड़ स्वयं अकूल समुद्रमें कूद पड़े थे *। श्रीमद्भागवत १।८।५२ ) गीतामें ज्ञानाग्नि द्वारा सर्वकर्न भस्मसात् । होनेका उल्लेख है। परन्तु उसका प्रकरण अन्य प्रकार है। . * सतीदाह प्रथाका रोकना राममोहन रायके लिये जितना गीताका उपदेश है कि, फलकी कामना छोड़ कर कर्म करो, परन्तु । सौभाग्यका विषय था, उतना ही वह उनके लिये दुर्भाग्यका भी सहमरणप्रथाकी प्रवलतासे इस उपदेशका यत्परानास्ति विपर्यय कारण था। कारण, इसके लिये उनके विरुद्धमें हजारों आदमी हुआ था। जिस प्रकार स्वर्गसुखकी कामनामे समरण अनुष्ठित खड़े हो गये थे, यहां तक कि उनका जीवन सङ्कटापन्न हो गया होता था, उसी प्रकार सुखकल्पना जिस देशमें उद्भावित हुई है, था। लोगोंको ऐसा मालूम होने लगा था कि ब्रह्मसभा साक्षात् उस देशमें कभी गोताका भी प्रचार हुआ था, अथवा निष्काम धर्मनाशक है। इस नवीन कानूनके विरुद्ध सभा पर सभा करके 'धर्मकी आलोचना ही थी, यह अनुमान भी नहीं किया जा : सतीदाहके समर्थकोंने विलायतमें अपील की। राममोहनको मी सकता । अब उसी गीतामन्त्रकी शाणित धारसं ही राममाहनराय इसके लिये लड़ना पड़ा। इस कार्य के लिये उन्हें इस परिणत ने सहमरेयारूप पापवृक्षका छेदन किया। जिस वर्ष ब्राहासमाज अवस्थामें भी युवकों की तरह बल धारणपूर्वक हिन्दू जातिका स्थापित हुआ था ( १८२८), उसके दूसरे ही वर्ष १८२६ ई० सर्वथा अपरिचित अकूल समुद्र में बहना पड़ा था, जब कि ब्राझ- के ४ दिसम्बरको इस कुरालाका निवारक कानून बन गया। समाजको स्थापित हुए केवल दो ही वर्ष हुए थे।