पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५०

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ब्राह्मसमाज को वाधा न रही। केशवचन्दने इसे भी अपना आईन १५वी मईको यह समाज स्थापित हुआ था । समझ कर ग्रहण किया था। १८७२ ई०के १६ मा.को नामकी व्यवस्थासे इनकी प्रकृति भी समझी जा सकती यह कानून पास हुआ था। इस प्रकारसे सम्प्रदाय- हैं। केशवचंद्र कोचविहार-विवाह-घटनाको विधाताका बन्धनके सर्वोपकरणं संग्रहीत होने पर केशवचंद्रकी विशेष-विधान बतला कर आईन उलङ्घन-दोषको मिटाने आकांक्षा पूर्ण अभीष्ट सिद्ध और विपुल परिश्रम सार्थक लगे : उधर वे भी केशवचंद्रको भारतवर्षीय बाह्मसमाजके हुआ था। उपासना-मन्दिरके अधिकारसे च्युत करनेकी चेष्टा करने उनके द्वारा आरब्ध अपौत्तलिक अनुष्ठान तथा जाति । लगे। पीछे पुलिशको सहायतासे उन्होंने अपने अधिकार- और वर्ण निर्विशेषसे विवाह आदि कुसंस्कारवर्जित को रक्षा कर पाई थी। फिर केशवचंद्रने घोषणा की, कि क्रियाए अवाध रीतिमे चलने लगी। अब तक ब्राह्मधर्म | 'यह मन्दिर मेरे लिए विधातोंका दान है।' इस प्रकार तथा ब्राह्मसमाज स्वतंत्र और परिष्फुट लक्षणोंपे सर्वजनों भारतवर्षीय बाह्मसमाजके अधिकारोंसे सब तरह वञ्चित के हृदयङ्गम हो चुका था। एक दिन देवेंद्रनाथने 'ब्राहम' हो कर उस मन्दिरके उपासकोंने यह नवीन समाज और लक्षण प्रकट करनेके निमित्त ॐकार युक्त अंगुरीयक नवीन उपासना-मन्दिर निर्माण कराया और उसमें सर्व पहननेकी व्यवस्था की थी। इस प्रकार ब्राह्म-सम्प्रदायके प्रकारसे साधारण-तत्र राजनीतिका अनुसरण किया लोगोंका स्वतंत्र चिह्न निादए हुआ *। गया। अतएव प्रथम ही उसका नाम "साधारण-ब्राह्म ब्राह्मोंकी वयोवृद्धि के साथ साथ उनकी पुत्रकन्यादि समाज" रखा गया। सन्तानोंको संख्या भी बढ़ने लगी। जिससे जातकर्म, साधारण-ब्राह्मसमाजका परिचय देने के लिए अधिक नामकरण और विवाहादि ब्राह्म-अनुष्ठानोंका बाहुल्य होने कुछ न लिखेंगे। इस समाजके सदस्यगण जब भारतवर्षीय लगा। विवाहकानून विधिवद्ध होनेके ६ वर्ण वाद। ब्राह्मसमाजके साथ एक योगसे उपासनादि करते थे, उस केशवचंद्रको कन्याका विवाह-सम्बन्ध उपस्थित हुआ। समय वे जिस प्रकारसे उपासना और पारिवारिक तथा इस विवाहमें केशवचंद्रको बड़ी ही विपत्तिमें पड़ना सामाजिक क्रियाकलापादिका अनुष्ठान करते थे, अब भी पडा था। उन्हें वाध्य हो कर अपनी कन्याको वरपक्षीय उन्होंने उन्हीं समस्त आचारोंको विधिवत् रक्खा । लोगोंके हाथ मौंप देना पड़ा। इस विवाहमें उनकी केवल व्यक्तिविशेषके एकाधिपत्यका खण्डन और मानी हुई कोई भी आईन काम न आया। यह कोचविहार साधारणतंत्रको राजनीतिका स्थापन करनेके लिए विवाहके नामसे प्रसिद्ध । १.८७८ ई० ) है। उन्हें बहुनियमयुक्त कार्यनिर्वाहक सभा और उसकी इस घटनासे केशवचंद्रके सम्प्रदायके अधिकांश शाखा प्रशाखाएं बढ़ानी पड़ी थीं। ये लोग अंगरेजी व्यक्ति उनके प्रति खड गहस्थ हो गये। उन्होंने आकाश गिर्जाकी रीत्यानुसार वर-कन्याको उस साधारण उपा- पाताल ब्यपी आन्दोलन उठा कर जिस आईनको अवश्य सना-मंदिर में ला कर उनका विवाहकानून सम्पन्न करने हो पालनीय बतलाया था, अपने लिए उस आईन पर उन्होंने लगे। इनकी उपासनादिमें भी अनेक क्रिश्चियन भाषों- कुछ भी ध्यान न दिया, धर्मबुद्धिको उन्होने अर्थाके का आदर देखने में आता है। मन्दिर में वलि चढ़ा दिया। इस प्रकार तथा और भी कई इधर केशवचंद्र आत्मोय जनोंको विद्रोहितासे प्रकारका निन्दावाद उनके विरुद्ध फैलने लगा। आखिरकार व्यथित हो कर केवल ईश्वर-चिंतामें निमग्न हुए । वे पूर्वा- उनके विरुद्धवादो ब्राह्मणोंने मिल कर उनका संबंध त्याग पर यह देखते आ रहे थे, कि लोग युक्ति और तर्क पर दिया और एक नया समाज स्थापित किया जिसका अधिक निर्भर रहकर एक प्रकार नास्तिक और स्वेच्छा- नाम रखा गया. “साधारण ब्राह्मसमाज" । १८७८ ई०को चारी हुए जा रहे हैं। ब्राह्मसमाजमें इस प्रकारके ___ कलकत्ता कर्नवालिम स्ट्रीटके भवनमें यह समाज-मंदिर

  • परंतु खेदका विषय है, कि यह प्रथा पचलित न हो सकी। निर्मित हुआ था।