पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५२

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. ब्राह्मसमाज समात, केशवचंद्र हो गुरुस्थानीय थे। सर्वत्र केशव- ब्रालिका ( स० स्त्री० ) ब्राह्म एव संज्ञायां स्वार्थे वा कन् चंद्रके ही ईश्वरनिष्ठा, उद्यम और श्रमशीलतादि, गुण- अत इत्वञ्च । ब्राह्मणयष्टिका। समूह उन गुणोंके आदर्शभूत समझे गये हैं। ब्राह्मी (सं० स्त्री०) ब्रह्मण इय, ब्रह्मन्-अणु टिलोपः, स्त्रियां ____ आदि-ब्राह्मसमाजसे भारतवर्षीय ब्राह्मसमाजका डीप । १ दुर्गा। ( देवीपु० ४५ अ०)२ शिपकी अष्ट- उद्भव, उससे फिर साधारण समाजकी उत्पत्ति, इसी मातृकाके अन्तर्गत मातृकाविशेष। ३ सरस्वती। ४ बीचमें ब्राह्मविवाह आईनको आवश्यकताके विषयमें सूर्य मूर्ति। ५रोहिणी नक्षत्र। इस नक्षत्रके अधिष्ठात्री बादानुवाद, इन तीन घटनाओंके प्रसङ्गोंमें ब्राह्मोंमें तुमुल देवता ब्रह्मा हैं। ६ शाकभेद, औषधके काममें आने- विवाद हो गया। अब तीन आदर्शोसे तीनों ब्राह्मसमाज वाली एक बूटी। यह छत्तेकी तरह जमीनमें फैलती, अपनी प्रशाखाओंका विस्तार कर रहे हैं। ब्राहोंमें अब ऊँची नहीं होती है। इसकी पत्तियां छोटी छोटी और विबादवृद्धिकी सम्भावना नहीं है। प्रत्युत विविध शुभ गोल होती हैं और एक ओर खिलो-सी होती है। आयुर्वेद- कर्मोपलक्षमें तीनों समाजके व्यक्ति एकत्र होते हैं। यूरोप शास्त्र में इसकी जड़, पत्ते और डंठल ओदिके विशेष और अमेरिकाका विशुद्ध एकेश्वरवादी समाज, इस! विशेष गुण लिपिवद्ध हुए हैं। यह मूत्रकारक और मृदु देशका आर्यसमाज, थिओजफिट सम्प्रदाय, और परम विरेचक है। करासिन तेलके साथ ब्राह्मोशाकका रस हंस भक्तसम्प्रदाय आदि इस ६५ वर्षके पुराने ब्राह्म- गांठ पर मालिश करनेसे गेठियावात जाता रहता है। समाजके अनुकरणसे गठित है। ब्राह्मगण इस समय यह उन्माद, अपस्मार, स्वरभङ्ग आदि रोगोंमें विशेष इन समस्त उन्नत ज्ञानसम्पन्न लोगोंको प्रीतिको दृष्टिसे उपकारक है । ओध तोले पत्तोंके रसके साथ २ स्कु पल देखते हैं और जहां सम्भव होता है उनके साथ सम्मि- पाचक जड़को मधुके साथ सेवन करनेसे मस्तिष्कको लनको चेष्टा करते हैं। आदि-समाजके पुरातन अश्वत्थ उन्मादता नष्ट होतो है। अलावा इसके यह विषहर, अग्नि- वृक्ष तुल्य तस्वबोधिनी-प्रतिष्ठाता देवेन्द्रनाथ अब श्री जनक, पाण्डुरोग, खाँसी, खुजली प्लीहा आदिको दूर मन्महर्षि कहलाते हैं और इस प्रकारसे मृत्यु होने पर करनेवाली मानी जाती है। ७ फञ्जिका, बरंगी। ८ भी बे अमर हैं। पङ्कगड़क मत्स्य । ६ सोमनलरी। महाज्योतिष्मती । ११ ____ "ग्रीष्मकालके प्रखर रौद्र और झञ्झावातके वाद वाराहीकन्द । १२ हिलमोचिका । १३ भारतवर्षको वह वर्षाकाल उपस्थित होगा।" "सहिष्णु हो कर उसके लिए प्राचीन लिपि जिससे नागरी, बंगला आदि आधुनिक अपेक्षा करो।" श्रीमद् देवेन्द्रनाथके शक सं० १७८७में लिपियां निकली हैं। यह लिपि उसी प्रकार बाई ओरसे कहे हुए पे वाक्य अब स्मरण हो आते हैं। जिन वृक्षोंके दाहिनी ओर लिखी जाती थी जैसे उससे निकली हुई पुष्प शोभाहीन और सौरभशन्य हो जाते हैं, वर्षाकी जल आजकलकी लिपियाँ ललितविस्तरमें लिपियोंके जो धारासे उनमें भी पुष्पोंको नूतन श्री और सौरभ प्रकट नाम गिनाए गए हैं उनमें ब्रह्मलिपिका भी नाम मिला होता है। ब्राह्मगण अब ब्राह्मसमाज-वृक्षमें पुष्पस्तवकी हैं। इस लिपिका सबसे पुराना नमूना आज भी उसी अवस्थाको देखनेकी आशा कर रहे हैं। . अशोकके शिलालेखोंमें मिलता है। पाश्चात्यविद्वानोंका प्रामाहोरात्र ( स० पु० ) ब्रह्मणोऽहोरात्रः। ब्रह्माका कहना है, कि भारतवासियोंने अक्षर लिखना विदेशियोंसे रात और दिन। इतना समय मनुष्यकोंके दो कल्पके सीखा और ब्राह्मी लिपि भी उसी प्रकार प्राचीन फिनी- बराबर है। दैवपरिमाणकालके सहस्रयुगका ब्रह्माका | शियन लिपिसे ली गई, जिस प्रकार अरबी, यूनार्मा, एक दिन और उतने ही समयकी एक रात्रि होती है। रोमन आदि लिपियां। परन्तु बहुतसे देशीय विद्वानों ने प्रालि ( स० वि०) ब्रह्मन्-इ, टिलोपः। १ ब्रह्माका सप्रमाण यह सिद्ध किया है, कि ब्राह्मी लिपिका विकास अपत्य । २ ब्रह्माका अवयवभूत । “नमो रुचाय ब्राह्मये।" भारतमें स्वतन्त्र रीतिसे हुआ। नागरी देखो। ( शुक्लयजु० ३१।२०) (वि० ) १४ ब्रह्मप्राप्तियोग्या। १५ ब्रह्मभवा ।