पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५४

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६४९ भ-भंगेला "तडितप्रमा महादयीं नागकागाशोगिताम् । है। पत्तियां इसकी लंबोतरी, नुकीली, कटावदार और मोटे पहभुना परदा भीमा रमालोचनाम् ।। दलकी होती है। उनका ऊपरी भाग गहरे रंगका और रनवस्त्रपरीमानामा मायनामिनाम । नीचेका भाग हलके रंगका खुदुग होता है। वैद्यकमें चातुर्वर्गप्रदा या गायनांगलियाम।. इसका स्वाद कडवा, चरपरा. प्रकृति रूखी. गरम तथा ध्यात्या प्रसारमा नमत्र दसमा जान॥ । गुण कफनाशक, रक्तशोधक, नेत्ररोग और शिरको पीड़ा- इम प्रकार ध्यान करके पाछे निम्नलिणित मन्त्रसे को दूर करनेवाला लिग्ना है और इसे रसायन माना है। प्रणाम करना होता है। । इस वनस्पतिकं तीन भेद हैं,--एक पीले फूलका जिसे "विक्निहित । बजार, हरिवाम, देवप्रिय आदि कहते हैं; दूसरा भात्गादिर संयम कारममाया।" सफेद फूलका और नोसरा काले फूलका जिसे नील (अगरनय ) ! गाज, महानील, सुनीलक, महाभृङ्ग, नीलपुष्प या भकारके वाचक शब्द गे स सा , अमर, भीम, श्यामल करते हैं। सफेद भंगग सब जगह और पीला विश्वमनि, निजामन, द्विार, भृणा, मट, यशमूत्र- भंगरा कहीं कहीं होता है। काले फूलका भंगरा जल्दी वानक, नक्षत्र, अमणा, कान, या, भाम, श्यप, नभ, नहीं मिलता। यह अलभ्य और रसायन माना गया नाभि, भः, महावा, यति, विना उमा, प्राणान्मा, है। कहते हैं, कि काले फूलके भंगरेके प्रयोगसे सफेद तापिनी, बत्रा, विनमा समन, सुधारन, पके बाल मदाके लिये काले हो जाते हैं। सफेद फूल- सुम्ब, मायापुर और हर।।नगमकामना) वाले भंगरे के दो भेद हैं एक हरे इंठलवाला और दूसरा मानकान्याममें इसका नाभिम न्यास करना काले डंठलवाला। होता है। काम्यक आदि इस वर्णका प्रयोग करने में भंगराज ( हिं० पु. ) कोयलके रंग ढंग और आकारकी भय, मरण श और माना। (तरला. टीका) एक चिड़िया। विशेष विवरण भृगराज शब्दमें देखो। भ (सको भान भाभी बालकान्ड । २ वनरूपातावरुप । भगराग दग्या । १ नक्षत्र । २ ग्रह । गण! ४ शुक्राचार , अमर, भंगरैया ( हि स्त्री० ) भंगरा देखा। भौरा। ६ भृवर, पाद। ७ भान्ति । ८ छन्द शास्त्रा- भगार ( हिं० पु०) १ वह गड्ढ़ा जो कृप खनते समय नमार गया गणमा नाम । इगो आदिका वर्णगर और पहले खोदा जाता है। २ जमीनमेंका वह गड्ढा जो शेप दा लघु टोने हैं । काव्यकं आदि इस वर्णका MEER आदि इस वर्णका वरभातके दिनों में आपे आप हो जाता है। ३ कूड़ा प्रयोग करनेसे यशालाभ हाता है। करकट, घासफूस। "भान्धी यस उपनाम(रत्ना टीका) भंगिरा ( हिं० पु० ) भंगरा देग्यो । भंकारी हि ग्रो० ) १ भुनगा । २पक प्रकारका छोटा भंगी ( हिंदु० ) १ भङ्गशोल, नष्ट होनेवाला । २ भंग करनेवाला, भंगकारी। ३ रेखाओंके मुकावसे खींचा मच्छर। भंगड़ ( हिं० वि० ) जो नित्य और बहुत अधिक भांग हुआ चित्र वा बेलबूटा आदि। ४ एक अस्पृश्य जाति पीता हो, वहुत अंग पीनेवाला। जिसका काम मल मूत्र आदि उठाना है। विशेष विवरण गली शब्दमें देखा । (वि०)५ भांग पीनेवाला, भगेड़ी। भंगना ( हि० कि० ) १ तोड़ना। २ दवाना। भोड़ी ( हि० पु०) जिसे भांग पोनेकी लत हो, बहुत भंगरा (हिं० पु.) एक प्रकारका मोटा कपड़ा जो मांग अधिक भांग पीनेवाला। के रेशेसे वुना जाता है। यह कपड़ा बिछाने या बोरा भंगेरा ( हिं० पु.) १ भांगको छालका बना हुआ कपड़ा। वनानेके काममें आता है। २ वर्षाकाल में होनेवाली एक २ भंगरा, भंगरैया । प्रकारको वनस्पति । यह विशेषकर ऐगी जगह, जहां भंगेला (हिं० पु०) एक प्रकारका कपड़ा जो भांगकी छाल पानीका सोत वहता है या कूप आदिके किनारे उगती | का बना होता है।