पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


६५. मैं पूरी-भकुड़ा भेंबूरो (हिं० स्त्री० ) एक पेड़ जो बबूलको जातिका होता जन्तुओं के शरीरके ऊपर वह स्थान जहांके रोए और है। इसे फुलाई भी कहते हैं। फुलाई देखो। बाल एक केन्द्र पर घूमे हुए हों। बालोंका इस प्रकारका भंभरना (हि० कि०.) भयभीत होना, डरना। घमाव स्थानपेदसे शभ अथवा अशभ लक्षण माना जाता भंभा (हिं० पु.) बिल, छेद। है। ३ बनियोंका सौदा ले कर घूम घूम कर बेचन्ना, भंभाका (हिं० स्त्री०) अधिक अवस्थाकी स्त्रीकी योनि । फेरी। ४ रक्षक, कोतवाल या अन्य कर्मचारियोंका प्रजा- भंभाना (हिं० क्रि० ) गौ आदि पशुओंका चिल्लाना, को रक्षाके लिये चक्कर लगाना, गश्त । ५ परिक्रमा । ६ रंभाना। भवर देखो। भंभीरी (हि० स्त्री० ) एक पतिगा। इसकी पूंछ लम्वी भवारा ( हिं० वि०) भ्रमणशील, घूमनेवाला। और पतलो, रंग लाल और बिलकुल झिल्लीके समान भंसना (हिं क्रि० ) १ पानीके ऊपर तैरना। २ पानीमें पारदर्शक चार पर होते हैं। इसकी आंखें रिडीकी डाला या फेका जाना । आंखोंकी तरह बड़ी और ऊपर निकली रहती हैं। यह भसरा ( हिं० पु. ) भैंजनी देखो। वर्षाके अंतमें दिखाई पड़ता है और प्रायः पानीके किनारे भंसस ( स० पु०) पायु, गुदा । घासोंके ऊपर उड़ता है। पकड़ने पर यह अपने पैरोंको भाया (हिं० पु० ) १ भाई । २ एक आदरसूचक शब्द । हिला कर भन भन शब्द करता है। इसका दूसरा नाम इसका व्यवहार प्रायः बराबरवालों के लिये होता है। जुलाहा भी है। भक (हिं० स्रो०) सहसा अथवा रह रह कर भागके जल भंमर ( हिं० पु० ) १ बड़ी मधुमक्खी, सारंग। २ बरै, . उठने अथवा वेगसे धूए के निकलनेके कारण उत्पन्न भिड़। होनेवाला शब्द। इसका प्रयोग प्रायः 'से' विभक्तिके भंवना (हिं० क्रि०) १ घूमना, फिरना । २ चक्कर लगाना। साथ होता है । जैसे लंप भकसे जल उठा। भंवर ( हिं० पु०) १ भौंरा । भ्रमर देखो। २ गत, गड्ढा। भकक्षा (सं० स्त्री० ) भस्य कक्षा । नक्षत्रकक्षा । ३ पानीके बहावमें वह स्थान जहां पानोकी लहर एक । भकरांध ( हिं० स्त्री० ) अनाजके सड़नेकी गंध, सड़े हुए केन्द्र पर चक्राकार घूमती है। ऐसे स्थान पर यदि, अनाजकी गंध । मनुष्य या नाव आदि पहुंच जाय, तो उसके डूबनेकी | भकरांधा (हिं० वि० ) सड़ा हुआ। संभावना रहती है। भकसा (हिं० वि०) जो अधिक समय तक पड़ा रहनेके भंवरकली ( हिं० स्त्री०) लोहे या पीतलकी कड़ी। यह ! कारण कसैला हो गया हो और जिसमेंसे एक विशेष कोलमें इस प्रकार जड़ी रहती है कि उसे जिधर चाहे प्रकारको दुगंधि आती हो। उधर सहजमें घुमा सकते हैं। यह प्रायः पशुओंके गले- भकसाना (हिं० कि०) किसी खाद्य पदार्थका अधिक समय की सिकड़ी या पट्टे आदिमें लगी रहती है। पशु चाहे तक पड़े रहने अथवा और किसी कारणसे बदबूदार और जितने चक्कर लगाये, पर इसको सहायतासे उसकी कसैला हो जाना। सिकड़ीमें बल नहीं पड़ने पाता। | भकाऊ ( हिं० पु० ) बच्चोंको डरानेके लिये एक कल्पित भवरगीत (हिं० पु० ) भ्रमरगीत देखो। व्यक्ति, हौवा । भवरजाल (हि. पु० ) भ्रमजाल, संसार और सांसारिक भकार (सं० पु०) भ-स्वरूपेकार । म स्वरूपवर्ण। झगड़े बखेड़े। भकुआ (हिं० वि० ) मूर्ख, मूढ़। भघरभीख (हि.सी.) वह भीख जो भौरके समान घम भकुआना (हिं० कि०)१चकपका जाना, घबरा जाना। फिर कर मांगी जाय, तोन प्रकारको भिक्षा मेंसे दूसरी। २ चकपका देना, घबरा देना। ३ मूर्ख बनना। भवरा (हिं. पु०) भौंरा देखो। भकुड़ा (हिं० पु० ) मोटा गज जिससे तोपमै बत्ती मावि भवरी (हिं० स्त्री.) १ पानीका चक्कर, भवर। २ सी जाती है।