पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५८

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दुष्कृत हि मनुष्यस्य सर्वमन्ने वनुचितम् । को प्राणसे भी अधिक प्रिय हैं। कलियुगौ दश हजार यो यस्यान्नेन जीवेत स तस्याश्नाति किल्विषम् । वर्ष तक ये विष्णुभक्त रहेंगे। अनन्तर विष्णु भक्तोंके . (कूर्मपु ० उपविभाग १६ अ०) चले जाने पर सब कोई एक वर्ण होंगे तथा पृथ्वी कलिसे २ धन । 'भक्तं धनं (मेधातिथि) ( त्रि० ) भजते प्रस्त होगी। स्मेति भज-सेवायां क्त । ३ तत्पर, भक्तियुक्त, पूज्यविष- विष्णुभक्तका कर्तव्य-विष्णुभक्त सर्पदा सब यक अनुराग भक्तिसे युक्त । भज-भावे क्त। ४ भजन। मनुष्योंके सामने विष्णुका कीर्तन करेंगे और अपने पास भक्तिके लक्षण :--. जो कुछ हो उन्हें विष्णुको चढ़ा देंगे। जिसको कृष्णको कथामें विशेष अनुराग है तथा अश्रु | भक्त विष्णुमन्त्रसे दीक्षित हो कर पवित्र होते हैं और पुलकोद्गम होता है, मन सदा श्रीकृष्णमें निमग्न तथा उनके पूर्वज भी पवित्र हो जाते हैं। भक्त ब्रह्मणत्व, रहता है, वही भक्त हैं। जो पुत्र और स्त्री आदिको मन अमरत्व, इन्द्रत्व, मनुत्व, निर्वाणमुक्ति, अथवा अणिमादि पचन और शरीरसे कृष्णके तुल्य मानते हैं वे ही भक्त ऐश्वर्या आदिकी कुछ भी याचना नहीं करते। केवल हैं। सब जीवों पर जिसकी माया है तथा जो सारे मात्र विष्णुके प्रति एकान्त अनुराग वा परा अनुरक्ति रहे, संसारको श्रीकृष्णका स्वरूप जानते हैं वे ही महाज्ञानी यहो उनको अभिलाषा है। शरीर मन वचनसे एकमात्र और भक्त हैं। भगवानमें अनुरक्त रहना हो उनकी आकांक्षा है। ब्रह्म- जिनके भक्तिके उपदेशसे शरीर पुलकायमान होता ! हत्या, गुरुहत्या, गोषध, स्त्रीबध, आदिसे जिस प्रकार है, जो कभी हंसते हैं, कभी नाचते हैं, जो सदा ही लोग पातको बनता है, एकमात्र भक्तको त्यागनेसे हो उसी परमानन्दित हैं अथवा जो कभी आनन्दमें निमग्न, कभी प्रकार पातकी हो कर रहता है। उसका इस समय और गानमें अथवा जो भगवान के भावमें डूबकर रोदन करते हैं, भविष्यमें मंगल नहीं होता । ( मार्कण्डेयपुराण हरि- जो भगवत् प्रेममें निमग्न रहते हैं और जो सर्वज्ञ ईश्वर- श्चन्द्रोपा० ) हरिभक्तिविलासमें भक्तका विशेष विवरण देखो। को जान कर सनातन विष्णुका भजन करते हैं, तथा भक्ति-परायण ही भक्त है । उत्तम, अधम और प्राकृत जिनका सभी प्राणियों पर समान अनुराग है वे हो आदि भक्तके अनेक भेद हैं। अत्यन्त संक्षेप रूपमें उस भक्त कहलाते हैं। विषयको पालोचना की जाती है। जो भजन करता ब्राह्मण यदि हरिभक्त हों, तो उनका प्रभाव अतुल है, वह भी भक्त है। गोतामें कहा गया है- नीय है। हरिभक्त ब्राह्मणके चरणकमलको धूलसे चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिमोऽर्जुन। पृथ्यो पवित्र हो जाती है। उनके पदचिह्नकी गणना आत्तों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ (गीता ) तीर्थों में होती है और उसको स्पर्श करनेसे तीर्थकृत श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा है-आर्त (पीड़ित ), पाप भी विनष्ट होता है। उनके आलिङ्गन, उनके जिज्ञासु, अर्थ चाहनेवाला तथा ज्ञानी ये चार प्रकारके साथ वार्तालाप, उनके जूठे भोजन, दर्शन और स्पर्श मनुष्य मेरा भजन करते हैं। गजेन्द्र मातंभक्त, समक- करनेसे सब पाप नाश होते हैं। सब तीर्थों में घूम कर सनातनादि जिज्ञासु भक्त, ध्रुव आदि अर्थाथों भक्त और स्नानादिसे जैसा पुण्य होता है, एक भगवान्भक्त शुकदेवादि शानिभक्त हैं। ब्राह्मणके दर्शनसे भी उसी तरहका पुण्य लाभ होता है। भक्ति-याजनमें अधिकारीको भक्त कहा जाता है। विष्णु-भक्तके शरीर में सारे तीर्थ अवस्थान करते हैं। उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ इसके तीन भेद हैं। विष्णुभक्तकी पदरजसे पृथ्वी, तीर्थ, तथा साग संसार श्रीमद्भागवतके ११वें स्कन्ध में उक्त तीनों अधिकारियोंका पवित्र हो जाता है। जो विष्णुमन्त्रको उपासना करते, उल्लेख है। विष्णुका उच्छिष्ट भोजन करते और विष्णु का ही उत्तम-"सर्वभूतेषू यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः । ओ एकमात्र ध्यान करते हैं, वे सब विष्णुभक्त विष्णु- भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥