पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६५९

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भक्त ६५३ मध्यम-ईश्वरे सदधीनेषू वालिशेषु द्विषत्सु च ।। करना वैष्णवों के लिये अवश्य कर्तव्य है, नहीं करनेसे प्रेममैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ घोरतर अपराध होता है। पूर्वोक्त मार्कण्डेयादि मनीषि- कनिष्ठ-अायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। गण भक्त तथा प्रह्लाद भक्तराजके नामसे पुकारे जाते हैं। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥” प्रह्लाद आदि भक्तोंमें पाण्डुनन्दन श्रेष्ठ भक्त हैं। फिर ___ श्रीमद्भागवतके सप्तमस्कन्धमें श्रवणादि जो नौ पाण्डवसे भी यादवगण श्रेष्ठ भक्त है। प्रकारको भक्तिके लक्षण कहे गये हैं उनके एक एक "सदातिसन्निकृष्टत्वात् ममताधिक्यतो हरेः। भक्ति-अङ्गका यज्ञ करनेवाला भक्त कहलाता है । नवधा पापडवेभ्योऽपि यदवः केचित् श्रेष्ठतमा मताः ॥" भक्ति यथा- (मधुभाग) "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनं । सर्वदा श्रीकृष्णके निकट रहनेसे ममतातिशय अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनं ॥ निवन्धन कतिपय यादव पाण्डवसे श्रेष्ठ तथा इन इति पुसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा । यादवोंके मध्य उद्धव भक्त श्रेष्ठ थे। इस उद्धवसे भी फिर क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥" व्रजदेवीगण श्रेष्ट भक्त थी। उन लोगोंके मध्य श्रीकृष्ण (भागवत ७५॥२३-२४) । प्रिया श्री र धिका ही मबको अपेक्षा श्रेष्ठ भक्त थीं। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अच्चन, बन्दन, । "तत्रापि मर्वगोपीनां राधिकाति वरीयसी । दास्प, सख्य और आत्म, निवेदन यहो नी भक्ति हैं। सर्वाधिकेन कथिता प्रत्युराणागमादिषु ॥" इन नौ प्रकारको भक्तियोंके अधिकारी भक्त यथा - इन मर गोपियों में श्रीराधिका ही अधिक श्रेष्ठ थीं। "श्रीविष्णोः श्रवणे परीतिदभव यासकिः कीर्त्तने, क्योंकि, पुराण तथा वेदादि शास्त्रों में उन्हीं को सबोंसे प्रह्लादः स्मरणे तदधि भजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने। श्रेष्ठ बतलाया है। अक्र रस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सम्व्येऽर्जुनः। भक्तिरसामृतसिन्धु नामक वैष्णवग्रन्थमें भक्तोंके अनेक सर्वस्वात्मनिवेदने वलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परं ॥" भेद कहे गये हैं। उनमेंसे शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य (भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व० २११२६) और मधुररसके भक्त लोग श्रेष्ठ हैं। सनकसनन्दादि श्रवणभक्तिसिद्ध भक्त परीक्षित, कीर्तनभक्तिसिद्ध शान्तरसके भक्त थे। दामभक्त चार प्रकारके हैं -अधि- भक्त वेदध्यासनन्दन शुकदेव, स्मरणभक्तिसिद्ध भक्त कृत, आश्रित, पारिषद् और अनुग। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र प्रहाद, पादसेवनभक्तिसिद्ध भक्त लक्ष्मी, पूजनभक्तिसिद्ध इत्यादिको अधिकृत दास भक्त कहा जाता है भक्त महाराज पृथु, बन्दनभक्तिसिद्ध भक्त अक्रूर, दास्य आश्रित दासभक्त शरणागत, ज्ञाननिष्ठ और सेवा. भक्तिसिद्ध भक्त हनुमान, सख्यभक्तिसिद्ध भक्त अजुन निष्टके भेदसे तीन प्रकारका है। और आत्मनिवेदनभक्तिसिद्ध भक्त बलिराज । कालिय-नाग तथा जरासन्धकारागारमें बद्ध नृपति- इसके आलावा पद्मपुराणमें भी भगवत्पूजाके प्रसंग गण शरणागत दासभक्त थे। में कतिपय भक्तोंके नाम उद्धृत देखे जाते हैं। जिन्होंने मुक्तिको इच्छा छोड़ कर केवल भगवान्का .. "मार्कपडेयोऽभ्वरीषश्च वसुर्व्यासो विभीषणः। ही आश्रय लिया है वे ज्ञाननिष्ठ भक्त हैं। शौनकादि पुण्डरीको वलिः शम्भुः प्रह्लादो विदुरो ध्र वः॥ ऋषि लोग ज्ञाननिष्ठ दासभक्त थे। दाल्भ्यः पराशरो तीक्ष्णो नारदाद्याश्च वैष्यावैः। ___ जो पहिले होसे भजन विषयमें आसक्त हैं, वे सेव्या हरिं निषेव्यामी नो चेदागः परं भवेत् ॥" हो सेवानिष्ट दासभक्त हैं । चन्द्रध्वज, हरिहर, हरि-सेवनानन्तर, मार्कण्डेय, अम्बरीष, वसु, व्यास, बहुलाश्व, इक्ष्वाकु, श्रुतदेव, पुण्डरीक आदि ही सेवा- विभीषण, पुंडरीक, बलि, शम्भु, प्रहाद, विदुर, ध्रुव, निष्ठ भक्तके निदर्शन हैं। पारिषद दासभक्त- दालय, पराशर, भीष्म तथा नारदादि-भकोंकी सेवा । द्वारकानगरोमें उद्धव, दारुक, सात्यकि, श्रुतदेव, Vol. xv, 164