पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भक्त ६५५ पूर्वक मानन्द कौतुक अथवा प्रेम पूर्वक सदा राधाकृष्ण नहीं करते, केवल प्रेमानन्दसे कृष्णसेवानन्दकी प्रार्थना का नाम हृदयमें धारण करते हैं वे ही श्रेष्ठ है; नहीं तो करते हैं। स्वार्थमानसे ही पूजन भजनादि वणिकवृत्तिमात्र है। जो "सालोक्यसाटि सामीप्य सारूप्यकत्वमप्युत । . हरिगुणगान और हरिरसास्वादनको हो सब बिचारों दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥" और सर्वमङ्गलोका सार जान कर प्रेममें निमग्न रहते (भाग० ३।२६।१३) हैं वे हो भक्त हैं अर्थात् देवतत्त्वमें प्रकृत विश्वासीको कृष्ण-भक्तके निकट त्रिजगत् तुच्छ है, उनका चिस हो भक्त कहा जाता है। सदा आनन्दमय रहता है। भक्त ऊँच नीच जातिका पनपुराणमें विष्णुभक्तको दैवोसृष्टि बतलाया है। भेदविचार नहीं करते। वैष्णव भक्तका स्पृष्ट अन्न- हरिपदके शरणार्थी भक्तको चाहिये, कि वे श्रीष्णकी : जल अथवा उनका उच्छिष्ट भोजन वा चरणोदक पान भक्तिमें लीन हो कर उनका भजन करे। जो विष्णु- करनेमें कभी पराङ्गमुख नहीं होना चाहिये। स्वयं भग- भक्ति नहीं करते उनके पूर्वपुरुष तक भी नरकगामी होते वान् श्रीकृष्णने अजुनसे कहा था--- है। भक्तकी कामना हो वा न हो, वे तीव्र भक्तियोगसे | "ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः । उपाधिरहित पूर्ण पुरुष श्रीभगवान की ही पूजा करे। एक मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते मे भक्ततमाः मताः॥" मात्र अमला अथवा निष्कामा भक्ति ही श्रीभगवानको ( आदिपुराण ) प्रोतिसाधनमें समर्थ हैं। जो हमारे भक्तके भक्त हैं वे ही श्रेष्ठ भक्त कहे जाते भक्तोंको चाहिये, कि वे भक्ति सहित वैष्णवके हैं, स्वयं ब्रह्मा भी कृष्णभक्तकी समता नहीं कर सकते। निकट कृष्णमंत्र प्रहण करे, अवैष्णवके निकट मंत्रदीक्षासे इसीलिये उन्होंने अर्जुनको श्रीमुखसे ही कहा है, कि हरिभक्ति नहीं बढ़ती। विष्णु-भक्ति-विहीन मनुष्यके वैष्णवकी सेवा करो, उसके परे कृष्णभक्त होनेका उपाय निकट मंत्र लेनेसे हरिभक्तका हृदय भक्तिपूर्ण नहीं हो नहीं है। उन्होंने और भी कहा है- सकता। ब्राह्मण-वैष्णवसे मन्त्र लेना उचित है । शाक्त "साधवो हृदयं मह्य साधूनां हृदयन्त्वम् । अथवा शैवसे मन्त्र लेनेसे हरिभक्तिमें विघ्न उत्पन्न हो मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्या मनागपि ॥" सकता है। देवीपुराणमें लिखा है, कि विभिन्न सम्प्र- भक्त और भगवानका शरीर दो होने पर भी उनके दायके भक्तोंको नास्तिकका वर्जन करना चाहिए। गुरु हृदय एक हैं। भक्त भगवानसे भिन्न और किसीका और शिष्यके विपरीत मार्ग में चलनेसे कभी भी भक्तके ध्यान नहीं करते और भगवान भी उसे वैसा ही समझते हृदयमें भक्तिका आविर्भाव नहीं हो सकता तथा उसका हैं। भक्तका हृदयकोरक भक्तिकुसुम पूर्ण है। भक्त- इष्ट वस्तुका साधन निष्फल होता है। प्रकृत भक्तको अपने गण विभिन्न उपायसे भगवानको पाते हैं। गोपियोंने उपास्य देवताके प्रति अचला भक्ति रखनी चाहिये, कामसे, नन्द यशोदाने स्नेहसे, कंसने भयसे, वृन्दावन- किन्तु ऐसा कहनेका यह तात्पर्य नहीं वे भक्त देवताओं- वासीने पुण्यफलसे, रावणशिशुपालादिने द्वेषसे, प्रहला. में भेदक्षान रखें। हरिभक्तोंमें स्वयं महादेव श्रेष्ठतम कहे दादिने भक्तिसे और शुकदेवादिने ज्ञानसे नारायणको गपे हैं। शास्त्र में शुकदेवगोस्वामी तथा महर्षि नारद | प्राप्त किया था। भादिको कथा सुनी जाती है। कृष्णके भक्त लोग चतु ___सभी शास्त्रोंमें हरिभक्त वैष्णवोंकी महिमा और वर्ग फलकी इच्छा नहीं करते, वे निष्काम तथा माधुय्य- आराधनाविधि वतलाई गई है। हरिभक्तको नीचजाति मथी भक्ति द्वारा श्रीकृष्णका भजन कर प्रेमरसको सिद्ध समझनेसे उसे नरक होता है। पवित्रचेता गुहकको भी करते हैं। अन्यान्य योगधर्मसे धर्मार्थकाम सिद्ध तो रामचन्द्रने आलिङ्गन किया था। वामन अवतारमें होता है, पर श्रीकृष्णके भजनसे एकमात्र व्रज मधाम- उन्होंने असुरश्रेष्ठ वलिराजका दासत्व स्वीकार किया था को प्राप्ति होती है। प्रकृत भक्त सिद्धिको मोर दृष्टिपात स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सखारूपमें अर्जुनके सारथि