पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६३

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भनि। शरीर अतिशय पुलकित होता है, उन धन्य पुरुषोंको भक्तक स (संपु० क्लि.) भक्तार्थ कसः । भक्ताहरणाथ प्रणाम करता हूं। मार्कण्डे यादि साधन द्वारा प्राप्त- पात्र, कांसेका वह बरतन जिसमें भात खाया जाता है । सिद्ध हुए थे। भक्तकर (संपु०) भक्त भजन करोतीति कृ-ट। एक "मार्कण्डेयादयः प्रोक्ताः साधन प्राप्तसिद्धयः ॥" प्रकारका सुगंधित द्रष्य जो अनेक दूसरे द्रव्योंके योगसे श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें कपासिद्धका विषय बनाया जाता है । (त्रि०)२ भक्तिकारक । इस प्रकार लिखा है :- भक्तकार (संपु०) भक्तमन्न करोतीनि क ( कर्मण्यण । "नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासी गुरावपि । पा ३।२।१ ) इत्यण । १ पाचक, रसोइया। पर्याय-सूद, न तपो नात्ममीमांसा न शौचन क्रियाः शुभाः ।। औदनिक, गुण, भक्षङ्कार, सूपकार, आरालिक, वल्लव । तथापि ह्युत्तमश्लोके कृष्णे योगेश्वरेश्वरे । २ भक्तकर नामक सुगधित द्रव्य । भक्तिदृदा न चास्माकं संस्कारादिभतामपि ॥" भक्तकृत्य ( स० क्ली) भोज्यादिका आयोजन । इनका द्विजोचित संस्कार नहीं होता, ये गुरुगृहमें | भक्तच्छन्द ( सं० पु० ) १क्षधा। २ आकांक्षा बास नहीं करते, तपस्या और आत्मविचार नहीं करते भक्तजा ( सं स्त्री०) अमृत । और न शौच तथा शुभ कम हो करते हैं, तथापि उत्तम भक्तता (संस्त्रो०) भक्तस्य भावः तल-टाप । भक्तत्व, श्लोक योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्णमें इनकी प्रगाढ । भक्ति रहती है। हम लोग संस्कारादि रहते हुए भी भक्ततृय ( म० को ) भक्तस्य तद्भोजनकालस्य आवेदक वैसी भक्तिसे वञ्चित हैं। यक्षपत्नी, बलिदैत्य और वा भक्ते तद्भाजनकाले वादनीय तृय । भोजनकालमें शुकदेवादि कृपासिद्ध हैं। “कृपासिद्धा यशपनी वैरोचनि- वादनीय तृ", प्राचीनकालका एक प्रकारका वाजा जी शुकादयः" यादव और गोपगण श्रीकृष्णक नित्यप्रिय हैं। भोजन करते समय बजाया जाता था। इसका पर्याय ये ही नित्यसिद्ध भक्त कहलाते हैं। नृपमान है। सुधीभक्तके दोनों अपराधसे सावधान रह कर श्रीकृष्णको अर्चना करनेसे शीघ्र ही प्रेम उत्पन्न होता । भक्तत्व ( म० पु० ) किसीके अङ्ग वा भाग होनेका भाव, है। नामग्रहणसे सेवापराध दर होता है, किन्तु नामा- अव्ययीभूत होना। पराधसे मानवको नरकभोग भिन्न अन्य गति नहीं है। भनादाम ( म० पु० ) भन न अन्नमात्रेण दासः। पन्द्रह नामापराध और सेवापराध देखो। प्रकार के दामोंमसे एक दास, वह दास जो केवल भोजन पहले ही कहा जा चुका है, कि श्रीविष्णुके नाम- ले कर ही काम करता हो। गुणादि श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनको पादाग्निर्श मनुमें ७ प्रकारके दामोंका उल्लेख है जिनमेंसे भक्त- और पूजा, उनको वन्दना, उनका दास्य वा सेवकत्व. दास दूसरा है। (मनु ८।४१५ ) सख्य वा बन्धुज्ञान तथा आत्मनिवेदन अर्थात् देहसे २एक राजा । ये श्रीराम चन्द्रजीके परम भक्त थे और शुद्धात्मापर्यन्त सभी आत्माको उन्हें निवेदन, यही नौ सर्वदा रामायण सुना करते थे। एक दिन सीताहरण- भक्तके प्रधान भक्तिलक्षण हैं। एतद्भिन्न गुरुपादाश्रय, का वृत्तान्त जब इन्होंने सुना, तब आवेगमें आ सीताके दीक्षा, गुरुसेवा, सद्धर्मजिज्ञासा और शिक्षा, सन्मार्गाव- उद्धारके लिये हाथ में तलबार लिये समुद्र में कूद पड़े। लम्बन, कृष्णप्रिय वस्तुमें भोगलालसा वर्जन, एकादशी, कहते हैं, कि इसी समय स्वयं रामचन्द्रजी सीताके साथ कार्तिकेय प्रभृति व्रतानुष्ठान, गो विप्र-वैष्णव सेवा, अप- वहां उपस्थित हुए और उन्हें समुद्रसे बाहर निकाल कर राध वर्जन, अश्वत्थसेवन, अन्य देवता वा शास्त्रमें अभेद- बाल बोले, 'मैंने रावणका वध कर सीताको उद्धार किया। अब शान, मथुरामण्डलमें वास, श्रीमद्भागवत पाठश्रवण | चिन्तारहित हो अपने राज्यको लौट जा।' राजा सीता आदि और भी चौसठ प्रकारके भक्तिलक्षण कहे गये हैं। सहित श्रीरामचन्द्रके दर्शन पर फूले न समाये और अपने विस्तृत विवरगा भक्ति शब्दमें देखो।। घरको वापिस आये। Vol, xy 165