पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६५

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भक्तराज-भक्ति तात्त्विक विभागमें विभक्त किया गया है। चरित्र के पतोंके रस, ज्योतिष्मतीके पत्तोंके रस और चिता- विभाग प्रधानतः नाभाजीकृत हिन्दीभक्तमाल और प्रिय- रसमें तीन दिन भावना दे कर गोलो बनाव, अनुपान दासकृत तत्टीकासे तथा तात्त्विक विभाग उक्त दोनों लवणचूर्ण ४ माशा। इस औषधका सेवन करनेसे प्रत्य और श्रीहरिभक्तिविलास, श्रीलघुभागवतामृत, अग्निमांद्यादि अति शीघ्र प्रशमित होता है । ( रसको०) भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्वल-नीलमणि, षट्सन्दर्भ श्री. ___रसेन्द्रसारसंग्रहमें भक्तपाकवटीका उल्लेख देखने में चैतन्यचरितामृत, ब्रह्मसंहिता, श्रीमद्भागवतगीता, ब्रह्म, आता है। इसकी प्रस्तुत प्रणाली -अभ्र, पारा, गधक, गरुड़, ब्रह्माण्ड, पद्म, स्कन्दादिपुराण और अपरापर हिंगुल, ताम्र, हरिताल, मनःशिला, वङ्ग, हरीतकी, अनेक भक्तिशास्त्रोंसे सङ्कलित है । इसमें २७ मालो या वहेड़ा, विष, नेपाली, दन्ती, कर्कटङ्गी, सोंठ, पोपल, परिच्छेद हैं। उन २७ मालाके शेषमें प्रथकारने स्वकृत मिचं, यमानी, चिता, मोथा, जीरा, कृष्णजीरा, सोहागा, प्रथका फलश्रुतिवर्णन और निज दैन्यादि ज्ञापन करके इलायची, तेजपत्र, लवङ्ग, हींग, कायफल, सैन्धव प्रत्येक अन्तमें राधाकृष्ण विषयक एक गीतमें प्रथका उपसंहार तीन भाग । इन सब द्रष्यों के चूर्ण को अदरक, चिता, किया है। इस प्रथमें कितने अमाज नीय दोष रहने पर दण्डी, तुलसी, अडूस और बेलपत्र प्रत्येकके रसमें सात भी वे इसकी गुणराशिके मध्य छिप गये हैं। बार भावना दे कर तीन रत्तोकी गोली बनावे। इसका इस वङ्गला भक्तमाल प्रथसे ही बङ्गालीके ह्रदयमें सेवन करनेसे कोष्ठबद्ध, कफ और त्रिदोषजनित मलबद्ध, बिल्वमंगल, जयदेव, तुलसीदास, रघुनाथदास, प्रबोधा मंदाग्नि, विषमज्वर और त्रिदोष जनित विषम ज्वर जाता नन्द सरस्वतीरूप, सनातन और जीव गोस्वामी, रहता है। (रसेन्द्रसारसंग्रह अजीर्ण चि०) श्रीधरस्वामी बोपदेव, शंकर, रामानुज, मीराबाई, कर- भक्तशरण ( हि० पु०) वह स्थान जहां भात पका कर रखा मेतीबाई और कवीर आदि तत्त्वरसनिमग्न महानुभवोंका जाता है, रसोईघर । ज्ञान, भक्ति और वैराग्यकी वैचित्रमयी जीवलीला जग- | भक्तशाला ( स० स्त्री० ) १ रन्धन या भोजनगृह । २ मगा रही है। आवेदनकारियोंका सम्बद्ध नागृह । ३ वह स्थान जहां भक्त __ प्रमाण प्रयोगादि द्वारा प्रतिपाद्य विषयकी दृढ़ता लोग बैठ कर धर्मोपदेश सुनते हों। संस्थापन करनेके लिये इस प्रथमें २५७ शास्त्रीय श्लोक | भक्तसिक्थ (स० पु०) भक्तस्य सिक्थः ६ तत् । उद्धत हुए हैं। श्लोकावली छोड़ कर इसमें नाभाजीकृत भातका मोड़ । हिंदी मूल और उसकी टीकासन्निविष्ट है। भक्तान (सपु०) भोजनशाला। भक्तराज (सं० पु० ) भक्तश्रेष्ठ । भक्तादाय ( स० पु०) धान्यादि द्वारा संगृहीत कर। भक्तरुचि ( सं० स्त्री० ) १ क्षुधा। २ भोजन करनेक भक्ताभिलाष (संपु०) भक्ते अभिलाषा ७-तत् । १ अन्नके प्रबल इच्छा । प्रति अभिलाष। भक्तस्य अभिलाषः । २ भगवद्भक्ति- भक्तरोचन (सत्रि०) क्षुधाका उद्रेक। को इच्छा। भक्तवत्सल (सं० वि०) भक्तेषु वत्सलः ७-तत् । १ भक्त भक्ति (सं० स्त्री० ) भज्यते इति भज क्तिन् । १ विभाग, के प्रति वत्सल, भक्तों पर स्नेह करनेवाला । २ विष्णु। भाग। २ सेवा शुश्रषा।३ अनेक भागों में विभक्त करना, भक्तविपाकवटो (संस्त्री०) बटिकौषधविशेष । प्रस्तुत | बांटना। ४ अंग, अवयव । ५ खंड । ६ वह विभाग जो प्रणाली-कजली २ भाग, स्वर्णमाक्षिक, हरिताल, मैन- रेखा द्वारा किया गया हो। विभाग करनेवाली रेखा। की छाल, इमलोकी जड़, दन्तीमूल, मोथा, चितामूल, ८ पूजा, अर्चन । । श्रद्धा । १० रचना । ११ विश्वास । सोंठ, पीपल, मिर्च, हरितकी, यमानी, कृष्णजीरा, हिंगु, १२ अनुराग, स्नेह । १३ जैन मतानुसार यह शान जिसमें गुड़, सैंधव, बनयमानी, जायफल, यवक्षार प्रत्येकका निरतिशय आनन्द हो और जो सर्वप्रिय, अनन्य, प्रयोजन पूर्ण १ भाग, इन सब द्रव्योंको भदरकके रस, सम्हालू- विशिष्ट तथा वितृष्णाका उदय-कारक हो । १४ भंगी।