पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६६

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६६० भक्ति १५ गौणवृत्ति । १६ उपचार । १७ एक वृत्तका नाम। गया है . -'सुखानुशयी रागः' ( पात-२०३९ ) यह स्मरण इसके प्रत्येक चरणमें तगण, यगण और अन्तमें गुरु तथा कोत्तनादि द्वारा हुआ करतो है । भक्तगण भगवान्- होता है। १८ पूजाविषयमें अनुराग भक्ति। शण्डिल्य के नामकीत्तन या उनके नाम स्मरणसे सुख अनुभव सूत्रमें भक्तिका लक्षण इस प्रकार लिखा है। करते हैं। इसीलिए वे वारम्बार ऐसा किया करते हैं। "अथातो भक्निजिज्ञासा सा परानुरक्तिरीश्वरे ॥” (गा० स०) भक्तिका वेग जितना ही बढ़ता है, भक्तोंको कोतनादिमें ईश्वरमें परानुरक्तिका नाम भक्ति है। आराध्यविषय-: उतनी ही आसक्ति होती है। उस समय भक्त अनन्य- में जो अनुराग है, वही भक्ति है। 'आगव्यविषयकरागत्व-: कर्मा हो भगवचरणमें मनःप्राण समर्पण कर उनके मेव भक्तित्व" भक्तिमूत्रसे ईश्वरमें पगनुरक्ति हो भक्ति है। नामादि कीर्तनमें लगे रहते और तद्गतचित्त हो कर परा शब्द द्वारा परा और गौणी यही दो प्रकारको भक्ति केवल उन्हीं का भजन करते हैं। समझनी चाहिए । परमेश्वर विषयमें अन्तःकरणकी ___जो मश्चित तथा मद्गतप्राण हो कर आपसमें मेरे वृति ही परानुगग कहलाती है और यही भक्ति है। तत्वका वार्तालाप करते हुए एक दूसरेको समझा देते उपासना, परमेश्वरमें परमप्रम 'नहोष्टदेवात् एरमस्ति; और इसी में अधिकतर आनन्द लाभ करते हैं, जो मेरे किञ्चित्' इष्टदेवसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, ऐसी चित्त-: प्रति अनुरक्त तथा योगयुक्त हो कर भक्ति पूर्वक मेरी वृत्तिका नाम भक्ति है। यह प्रीतिके अधीन है। ( ईश्वरको ) उपासना करते हैं, मैं उन्हें बुद्धियोग अर्थात् "नाथ ! योनिमहागु येषु येषु ब्रजाभ्यहम् । तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। इस तत्त्वज्ञान द्वारा वे मुझे नेपु तेम्बच्युता भक्तिरच्युतास्तु सदा त्वयि । पाते हैं। मैं उन भजनकारी व्यक्तियोंके प्रति अनुकम्पार्थ या प्रीतिरविवेकानां विषयवनपायिनी । उनके अन्तःकरणमें रह कर तत्त्वज्ञानरूपी उज्ज्वल प्रदीप त्वामनुस्मरतः सा में हृदयान्मामपसर्पतु ॥" द्वारा अज्ञानान्धकारको दर करता है। अतएव भक्तिका ( विष्णु श२०१९-२०) फल मुक्ति है, यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। "धर्मार्थकामैः किं तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता । 'तत्संस्थस्यामृतत्वोपदेशात्' तत्संस्था 'तस्मिन् ईश्वरे ममम्नजगतां मृले यस्य भक्तिः स्थिग त्वयि ॥" संस्था भक्तिर्यस्य' जिनकी ईश्वरमें अविचलित भक्ति (विष्णु २२०४२७ ) है, उन्हें अमृतत्त्व अर्थात् मोक्ष लाभ होता है। (गीता १०१६-१०) हे भगवन् ! मैं जिस किमी योनिमें जन्मग्रहण क्यों न "तेपामहं समुद्धर्ना मृत्युसंसारसागरात् । करू किंतु आपमें मेरी अटल भक्ति बनी रहे। अविवे- भवामि न चिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥” (गीता १२७) कियोंको विषयवासनोंमें जैसो प्रीति रहती है, आपमें मेरी जिनका चित्त मुझमें ही निविष्ट रहता है, मैं उन्हें वैसी ही अविचलित प्रीति हो । समस्त ब्रह्माण्डके मूली- मृत्युरूप संसार सागरसे उद्धार करता हूँ। तैत्तिरीय भत कष्णमें जिनको प्रगाढ भक्ति है, उनकी मुक्ति कर-1 मन्त्र भागमें भी लिखा है, ... स्थित है उन्हें धर्म अर्थकामसे और कोई प्रयोजन "त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । नहीं। __उर्वरारुकमिव बन्धनामृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॥" यहां पर जिस प्रीतिपदका उल्लेख किया गया है, उसे 'अत्र यजनं भक्तिः ' इससे भी मालम होता है, कि सुखनिरत राग समझना चाहिए । कारण, यदि वह सुखनिरतः भक्तिका फल मुक्ति है। शाण्डिल्यसूत्रमें ज्ञान भी भक्ति- न हो, तो उसमें आसक्ति हो ही नहीं सकती अर्थात् जो : का अङ्ग बतलाया गया है। भक्तिका फल मुफ्ति है, यह कुछ भी क्यों न किया जाय, उसका मूल सुग्व हो है, ऐसा पहले ही कहा जा चुका है ; किन्तु तत्वज्ञान द्वारा अज्ञान- समझना आवश्यक है अन्यथा कोई किसी काममें प्रवृत्त को निवृत्ति नहीं होनेसे मुक्ति नहीं हो सकती, ऐसा नहीं हो सकता। अतएव यह प्रीति सुलनिरत राग सभी स्वीकार करते हैं। अनुरागविशेष ही अज्ञानका कार्य कहलाती है। पातालमें उसका लक्षण इस प्रकार कहा है : अन्तःकरणवृत्तिरूपा भक्तिसे किस प्रकार मुक्ति