पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६७

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भक्ति . मिल सकती है ? इसकी मीमांसा इस प्रकार है :-चूकि भक्ति के लक्षण हैं। कर्मक्षयके लिए या विष्णुकी प्रीति- इस भक्ति रूप-अन्तःकरणवृत्तिमें अज्ञानका कार्य है इसलिये के उद्देशसे अथवा शास्त्र में भगवानकी आराधना कही यह अज्ञानजड़ित है । अज्ञान रहनेसे मुक्ति असम्भव है। गई है, इत्यादि कारणसे जो ईश्वरकी आराधना करते हैं, .इससे यह सावित होता है, कि मुक्तिका प्रधान कारण ये हो साविक भधत हैं। कर्मज्ञानमिश्रा भक्ति तीन भक्ति नहीं; वरन् ज्ञान है। अतएव भक्तिका गौण फल । प्रकार की है, उत्तमा, मध्यमा और अधमा । मुक्ति है, यह निश्चय है। भक्ति अविचलित होनेसे उत्तमा भक्ति जो मब भूनोंमें अपना भगवन्नाय ज्ञान होता है। जब ज्ञान उत्पन्न होता है, तब अज्ञानका देखते हैं तथा जो अपने में और भगवानमें सब प्राणियोंका कार्य जो अनुरागविशेष है, वह भी नहीं रहता ; सुतगं अवम्यान है, ऐसा समझो, वे उत्तम भक्त है । मध्यम मुक्तिमें और कोई बाधा नहीं होती। अतएव भक्तिका और अधम भरतका विषय भवन शव्दमें लिखा गया है। अज्ञान ऐसा न कह कर भक्तिको ही ज्ञानका अङ मानमिधा भक्ति मेरा गुण सुननेमे ही मुझमें कहना युक्तिसंगत है । शास्त्रमें भी लिखा है, कि 'भकिन- जिनकी अविच्छिा मनि हो जाती और पुरुषोनम विषणु- आनाय कल्पते' ईश्वरमें प्रणिधान, तपस्या सौर म्याध्या जी किटोती है, जो मेरी सेवाके सिवा यादि कार्ययोग द्वारा भक्ति उत्पन्न होती है ; अनन्तर मालोषमानि मनः पाकर भी उमका मिन्टाप नहीं' भक्ति अचल होनेसे ज्ञान उत्पन्न होता है और इसीसे : करने, वो ज्ञानमिथ भक्त कहलाते हैं। मुक्ति मिलती है। विहिता भक्तिके चार भेद हैं, कामजा, द्वेषजा, वैष्णवगण भक्तिका फल मुक्ति है, ऐसा स्वीकार भयजा और स्नेहजा। नहीं करते। उनका कहना है, भक्तिका फल प्रेम है। गोपियां कामसे, कम भयसे, चैद्यादि राजा हे पसे वे मुक्तिकी प्रार्थना नहीं करते। उनके जलसे प्रेम हो और वृष्णि नरपतिगण सम्बन्ध तथा म्हसे भक्तिग. परमपुरुषार्थ है। 'उपायपूर्वा भगवति मनः स्थिरीकरगां यण हा थे। कम मिश्रा भक्ति नौ प्रकारको है। गृहस्थ- भक्तिः' उपायपूर्वक भगवानमें मनःस्थिरीकरणका नाम गण इन्हीं नौ प्रकारको भकिके अधिकारी हैं। कम- भक्ति है। विहिता और अविहिताके भेदसे यह दो प्रकार- शानमिश्रा भक्तिके तीन भेद हैं और इनके अधिकारी की है। बनवासी हैं। ज्ञानमिधा भक्ति एक प्रकारकी है। केवल बिना किसी कारणके ही दैव और वैदिक कर्ममें मन भिक्षुगण ही इसनिक अधिकारी हुआ करते हैं। की जो स्वाभाविक सात्त्विक वृत्ति उत्पन्न होती है, वही ___ शाण्डिल्यसूत्र भाग्यमें लिया है, कि कायमनावाक्यसे विहिता भक्ति है। मिश्रा और शुद्धाके भेदसे यह भी दो जो कुछ भी क्यों न किया जाय, भक्त उन सबोंको भग- प्रकारकी है :- मिश्रा भक्ति तीन प्रकारकी है,...-कर्म मिश्रा, कमज्ञान- । वान्नारायणमें ममर्षण करते है । यह भकि उन्नोम प्रकारकी मिश्रा, और ज्ञानमिश्रा;। इनमेंसे कर्म मिश्रा-भक्तिके है, यथा १ पनिशद् वर्ग, २ त्रिंशद्वर्ग, ३ पविशनि- तामसी, राजसी और सात्तिको ये तीन भेद हैं। फिर वर्ग, ४ पञ्चविंशतिवर्ग, ५ चतुविनिवर्ग, ६ विशतिवर्ग, तामसी भक्तिके हिंसा, दम्भार्था और मात्सर्यादि ७ एकोनविंशतिवर्ग, ८ अष्टादशवर्ग, ६ पञ्चदशवर्ग, १० भेद हैं। हिंसा, दम्भ और मात्सर्यपूर्वक जो काम करते त्रयोदशवर्ग, ११ द्वादशवर्ग, १२ एकादशवर्ग, १३ दशवर्ग, हैं वे ही तामस भक्त हैं। विषयार्था, यशोऽर्था और १४ नववर्ग, १५ सप्तवर्ग, १६ षड्वर्ग, १७ पञ्चवर्ग, १८ चतु- गं, और १६ त्रिवर्ग। ऐश्वर्यार्थाके भेदसे राजसीभक्ति तीन प्रकारकी है। जो विषय, यश और ऐश्वर्यके लिए भगवान में भक्तिपरायण ___उक्त उन्नीसवर्ग भक्तिका विषय भागवतमें विशेष- होते हैं, वे राजसिक भक्त कहलाते हैं। कमक्षयार्था, : रूपसे लिखा है, विस्तार हो जानेके भयसे वह यहां नहीं विष्णुप्रीत्यर्था और विधिसिद्ध्यर्था प्रभृति सात्त्विको दिया गया। भागवतके दूसरे, सातवें, दशवें और Vol. xv, 166