पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६८

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भक्ति ग्यारहवें स्कन्धमें इसके भनेक उदाहरण तथा दृष्टान्त दिखलाई है। वस्तुतः प्रेममें विभोर हो कर मद्य- दिये गए हैं। पायो मनुष्यकी तरह जो गृह, संसार, ऐश्वर्य, मान, ___ नारदकृत भक्ति सूत्र में भक्तिका विषय जो आलो सम्भ्रम, लोकलज्जा प्रभृति छोड़ देते हैं; वे ही परम चित हुआ है, वह भी अति संक्षिप्तभावमें नीचे दियो भक्त हैं। स्वयं भगवानने उद्धवसे कहा है, 'हे उद्धव !. जाता है । “ओं पूज्यादिष्वनुराग इति पाराशर्यः", "ओं कथा गोपियोंने मुझमें ही अपना मन समर्पण किया है-मैं दिग्विति गार्गः", "ओं आत्मरत्याविरीधेनेति शाण्डिल्यः", उनका प्राण हूँ, मेरे लिए उन्होंने सर्वस्व त्याग किया "ओं नारदस्तदर्पिताखिलानारतातद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ।" है। जिन्होंने मेरे ही लिए सब कुछ त्यागा है, मैं (नारभक्तिसूत्र १६-१६) उनको रक्षा करूगा। गोपियां मुझे प्रियसे भी प्रियतम भगवत् पूजादिमें अनुरागका नाम ही भक्ति है, ऐसा मानती है। जब मैं उन सबोंसे अलग रहता हूं, तब मुझे महर्षि वेदव्यासका मत है। इन्द्रियोंको कर्म द्वारा निवृत्त | स्मरण कर वे निदारुण विरहव्यथासे व्याकुल हो अपने- करने के लिए विधिपूर्वक पूजादिका प्रयोजन है और इस को भल जाती हैं। मुझे न पा कर वे बड़े कष्टसे प्राण प्रकार पूजा करते करते प्रमोदय होता है । सम्पूर्ण प्रेमा- धारण करती हैं। वृन्दावनमें मेरे पुनरागमनका शुभ- वेश होनेसे वाह्य और मानस-पूजाको निवृत्ति होती है संवाद सुनते ही वे जीवित हो जाती हैं। मैं भी उन्हीं और धीरे धीरे विशुद्ध भक्ति दिखाई पड़ने लगती है। गोपियोंकी आत्मा हैं और वे मेरी प्रेमभक्तिको बढ़ाने ___ गर्गाचार्यक मतानुसार भगवत्कथादिमें जो अनुराग बाली हैं।" है उसीका नाम भक्ति है। भगवतगुणानुवादके श्रवण "ओं सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा।" और कीर्तनसे ही समस्त साधनाका सार जान कर उसमें (नारदसू० २५) गाढ़ाभिनिवेश और श्रद्धा करने हीको भक्ति कहते है। यह भक्ति कमै, शान और योगसे भी श्रेष्ठ है। शाण्डिल्यके मतसे आत्मरतिके अविरोधविषयमें भगवद्गोतामें भी कहा गया है, . अनुरागका माम भक्ति है। जगद्वोधका परित्याग करके "तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोधिकः । एकमात्र आत्मचैतन्यमें अन्यान्य सभी अस्तित्वकी कभिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुनः॥ आहुति प्रदान कर पूर्णानन्दमें विभोर रहना ही आत्म- योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । रति कहलाता है। चाहे द्वैत भावसे हो अथवा अद्वैत- श्रद्धावान भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥” (गीता) से आत्मरतिका अनुकूल, अनुराग वृत्तिका प्रभाव ही भक्ति नामसे अभिहित है। लौकिक और पारमार्थिक उक्त वाक्यसे भगवान्ने ज्ञान और कर्मको अपेक्षा भेदसे कर्म दो प्रकारका है। मनुष्य यागयज्ञादि जिस योगकी प्रधानता दिखा कर भक्तको योगियोंके मध्य किसी कर्मका अनुष्ठान क्यों न करें सभी ईश्वरार्थ या प्रधान बतलाया है। कर्मयोग और ज्ञानसाधनके उनकी पूजा विवेचना करनेसे ही भक्ति साधित होती समय वर्ण, आश्रम, अधिकार तथा अनधिकार आदि- का बिचार देखा जाता है किन्तु भक्तिसाधनमें इनकी "प्रातरुत्थाय साया सायाह्नात् प्रातरन्ततः। कुछ भी आवश्यकता नहीं। यत्न तथा चेष्टा द्वारा यत् करोमि जगन्मातः ! तदेव तब पूजनम् ॥" मुक्ति लाभ की जा सकती है, किन्तु भक्ति मुक्तिसे भी प्रातःकालसे सन्ध्याकाल तक और सन्ध्याकालसे! दुर्लभ है, 'ओं फलरूपत्वात् ।' ( नारदसू० २६) क्योंकि वह पुनः प्रातःकाल तक जितने लौकिक तथा पारमार्थिक फलस्वरूप है । ज्ञानाभिमानियोंका कहना है, कि भक्ति कार्य करता हूं, हे जगन्मातः ! वे सभी आपका पूजा साधन द्वारा ज्ञानस्वरूप फल प्राप्त हो जाता है। किंतु मात्र है। “ओं यथा व्रजगोपिकानां" ( नारद भक्तिसूत्र २१) नारदके मतसे शानसाधन द्वारा भक्तिरूप फल लाम वृन्दावनविहारिणी गोपरणियोंने ही प्रेमभक्तिकी पराकाष्ठा होता है। गीतामें कहा है,---