पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६७१

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गुणभेद या आदिभेदसे गौणी भक्ति तीन प्रकार- अधिकार भी नहीं है। केवल दोनवेशमें भक्तिपूर्वक की है। इम भक्तिमें तमोगुणकी अपेक्षा राजसिको : पुकारनेसे ही भगवान् हृदयमें उपस्थित हो जाते हैं। और रजोगुणसे सात्त्विकी भक्ति श्रेष्ठ है। अर्थाथोंकी' योगसाधनासे जो युगयुगान्त में भी नहीं होता, वह अपेक्षा जिज्ञासु और जिशासुको अपेक्षा आतंभक्त श्रेष्ट : भक्तिसाधनासे क्षण भरमें हो सकता है। योगराज्यमें जो है । कारण, जिज्ञासु या आनथ्यक्तिको उपासनासे वाङ्मनके अतीत हैं, भक्तिराज्यमें वे ही हृदयकी पति विशुद्ध-भक्तिके उदय होनेकी सम्भावना रहती हैं। तह प्रथित और विजडित हैं। इसीलिए नारदने दूसरे साधनकी अपेक्षा भक्तिसाधन सुलभ है, - संमारमें यह नोषणा की है कि, 'भक्तिक अपेक्षा श्रेष्ठ क्योंकि इसमें आचार, विचार, वर्ग आदि कुछ भी नहीं

साधना और दुमरा नहीं है।'

देखना पड़ता। भक्तिके गुणसे ही गणिकाने विद्यावती यह भक्ति ग्यारह प्रकारकी है । यथा, --गुणमाहात्मा- न हो कर भी उद्धार पाया था। गोपियोंने वेदाध्ययन न | सक्ति, रूपासक्ति, पूजासक्ति स्मरणासक्ति, दास्या- कर, गृध्र और गजने मनुष्य न हो कर तथा गुहकने उच्च सक्ति, सख्यासक्ति, कान्तासक्ति, वात्सल्यासक्ति, वर्ण न हो कर भी केवल भक्तिगुणसे ही भगवानको आत्मनिवेदनासक्ति, तन्मयतासक्ति और परमविरहा. प्राप्त किया था। भक्तिसाधनमें कायक श और कात । सक्ति। रता नहीं है-भक्तिके जैसा सुलभ साधन और देखनेमें जो जिसको प्यार करता है, वह उसका सभी काम नहीं आता। भक्तिराज्यमें बादसम्बाद कुछ भी नहीं . और मव अङ्ग अच्छा ही देखता है। किन्तु कोई कोई होता। “ओं अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तो। ओं प्रमागान्तरस्पान । मान किसी अङ्गकी सुन्दरता या किसी भावमें विशेष आकृष्ट पेक्षत्वात् स्वयं प्रमाणत्वात्। ओं शांनिरूपात परमानंदम्याच्च । । (नारदभक्तिस. ५८-६.) हो जाते हैं। इसी प्रकार भक्तगण भगवान्मं सर्वतो इसमें दूसरे प्रमाणका प्रयोजन नहीं, क्योंकि यह भावसे आमक्त होने पर भी कोई कोई भक्त किमो किसी स्वयं हा प्रमाणस्वरूप है। भगवान की भक्ति करनेमें भावमें विशेषरूपसे आसक्त हो रहते हैं। इसे केवल जो कुछ परिश्रम और क्लेश होता है, वह किसीसे रुचिचित्राका फल समझना चाहिए । राजा परीक्षित, भी छिपा नहीं है ; जो भक्तिके उपासक हैं वे नारद, हनुमान, पृथुराज प्रभृति गुणमाहात्म्यासक्त भक्त स्वयं ही इसका अनुभव कर सकते हैं। भक्ति थे। कृष्णको बाल्यावस्था में नन्द, उपनन्द और यशोदादि हुई या नहीं, वादबिवाद द्वारा इसका सङ्कासमाधान तथा युवावस्थामें वजनारी प्रति उनमें लवलीन थीं. नहीं किया जाता है। भक्तिसाधनमें कृशका होना माता होना अतण्व वे सब रूपामक्त भक्त कहलाये। पृथुराजा पूजा- तो दूर रहे, वरन् सभी क्लेशोंकी निवृत्ति होती है। भक्ति सक्त. प्रह्लाद स्मरणासक्त, हनूमान्, अक्र र और विदुरादि शान्ति तथा परमानन्दस्वरूप है। जहां वाद, विवाद, दास्यासक्त, अजुन, सुग्रीव, उद्धव, कावेर, सुवल, श्रीदा. द्वन्द्व, उद्वेग, संशय, संकल्प, विकल्प और सुग्वदुःखादिकी: मादि सख्यासकः प्रजगोपिकागण कान्तासक्त, नन्द, तरङका लेशमात्र नहीं रहता, वहीं शान्तिनिकेतन है। यशोदा, कौशल्या, दशरथ, कश्यप, अदिति प्रभृति वात्स. शांतिभवनमें ही परमानन्दका प्रकाश होता है। ल्यामक्त, बलिराजा आत्मनिवेदनसक्त और कौण्डिन्य, “ओं त्रिमतस्य भक्तिरेव गरीयसी" (नारदसू. ८१) । शुकदेवादि तन्मयतासक्त भक्त थे । शुकदेव भक्तिशिक्षा- भूत, भविष्यत् और वर्तमान सभी समयमें सत्यः । के एक प्रधानतम आचार्य थे, इसीलिए भक्तिरसप्रधान स्वरूप भगवान्में भक्ति ही मर्यापेक्षा श्रेष्ठ है । भगवान् 'शुकमुम्वादमृनद्रवसंयुतं' श्रीमद्भागवत ग्रन्थ कहा को प्राप्त करनेके लिए शास्त्र में जितनी प्रकारको साध गया है: नाए कही गई हैं, उनमेंसे केवल भक्तिसाधना ही सबों "भक्तमा भजनोममहाराद्गीण्या परायै तदनुस्वात" की अपेक्षा सुगम और श्रेष्ठ है। अन्यान्य साधना कृच्छ- ( शाण्डिल्य सू०५६) साध्य तथा बहुयत्नसुलभ और सबोंमें सभी मनुष्योंका भजन या सेवा ही गौणी भक्ति है । यही गौणी Vol. xv. 167