पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६७६

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भक्ति उपाङ्ग निर्णय हुआ। उपयुक्त आनुषङ्गिक लक्षणोंके तदनुरूप अनुष्ठोन, ३ प्रमाणपूर्व भक्ति के साथ भगवत- परस्पर सन्निविष्ट नहीं हाने ने मनुःपके हृदयमें कदापि कथित शास्त्रका कोर्तन, ४ भगवान के भक्तवात्सल्य भक्तिका सञ्चार नहीं हो सकता। भक्तके उत्पन्न गुणकी पूजा कर उसका अनुमोदन, ५ भगवत्कथा सुनने- होनेसे आसङ्गादिकी परिलिप्सा जाती रहती है और में प्रोति, ६ विष्णुमें भावनिवेश, ७ स्वयं विष्णुको अज्ञानानर्थ निवृत्त होनेसे निष्ठा हेतु श्रवणादिको रुचि . अर्चना और ८ विष्णु ही मेरे उगजोध्य हैं, ऐसा ज्ञान । होतो है। क्रमशः रुचिके विकाशसे हृदयमें आसक्ति ! "भक्ति रष्टविधा ह्यं पा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते । बलवती हो जाती और रतिका अंकुर निकल आता है। स विप्रेन्द्रो मुनिः श्रीमान् स यतिः स च पण्डितः ॥ बाद यह रति प्रेममें परिणत हो जाती है। यह चैतन्या- तस्मै देयं ततो ग्राह्य स च पूज्यो यथा हरिः।" त्मक प्रेमालोक हो अज्ञानान्धकार दूर करने समर्थ ( गरुड़ पुराण पूर्व ख० २१६।१०-११) है। अज्ञानमूलक अनुरक्त सोपानश्रेणीको पार कर म्लेच्छमें भो यदि उक्त आठ प्रकारकी भक्ति वर्त- प्रेममार्ग में पहुंचनेसे तत्त्वज्ञान लाभ होता है। भक्ति मान रहे, तो उसकी गिनती विप्रेन्द्र, मुनि, श्रीमान्, संमिश्रणके सिवा केवल कम या ज्ञान द्वारा मायुज्य- यति और पण्डितोंमें होती है-वहो व्यक्ति श्रीहरिके लाभ नहीं हो सकता । जिसका ज्ञान भक्तियुक्त है, जैसा पूजनीय है। जिसके हृदयमें हरिभक्ति विद्यमान उसकी मुक्ति करतलगत है। है, वह मुनिसे भी श्रेष्ठ है। अभीष्ट और आराध्य देवताके प्रति ऐकान्तिक ऊपरमें भनि प्रकरणके सम्बन्धमें जो कुछ लिखा गया अनुरक्ति केवल साधुसङ्गसे प्रवल होतो है। निरन्तर है, वह सब धर्मशास्त्रसम्मत है। सम्प्रदायभुक्त नहीं साधुसेवारूप जलसेचनसे नवलक्षणाक्रान्त भक्तिवृक्षको होनेसे मनुष्यके हृदयमें कदापि भक्तिका उद्रेक नहीं शाखा प्रशाखा हृदयाकाशमें परिव्याप्त हो कर स्निग्ध- होता । साधकको गुरुपाद और सम्प्रदायको आश्रय च्छाया वितरण करती है। बाद हृदयमें एक सार्वजनीन कर दोक्षा लेनी चाहिए ; अन्यथा उनकी दीक्षा निष्फल कोमलता आ उपस्थित होती है, यह ईश्वरप्रेमके सिवो हो जाती है। पद्मपुराणमें लिखा है, कि कलिकाल में और दूसरा कुछ नहीं है। यही एकमात्र भगवत्प्रेम श्रो, माध्यो, रुद्र और सनक नामक चार सम्प्रदायो वैष्णवों- जीवोंके पाप, ताप माया और दुःखको दूर करनेमें का आविर्भाव होगा और यहो चार वैष्णवसम्प्रदाय समर्थ है। पृथ्विीके पवित्रताविधायक होंगे। सैष्णवसम्प्रदायी कृष्ण- उपादानभूत अङ्गप्रत्यङ्गादिके अलावा भक्तिमें शान्ति, निष्ठ भक्तिवह पुण्यात्मा ही भक्तिके अधिकारी हैं। दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार ये पञ्चरसात्मक भाव असाम्प्रदायिक तथा अवैष्णवके निकट मन्त्रगृहीताके विद्यमान हैं। इनके सिवा शास्त्रमें भक्तिका प्रभेद हृदयमें भक्ति नहीं आ सकतो, वरन् उससे उसका कल्पित हुआ है :- दीक्षाविपर्यय ही घट जाता है। कृष्ण निष्ठ कदापि भक्ति आठ प्रकारकी है-यथा १ विष्णुके नाम और व्यभिचारी नहीं होते हैं। भक्तिमार्गारोही भागवत- कर्मादि कीर्तन करते करते अविसर्जन, २ श्रीहरिके ! गण अपने अपने सिद्धिपथका आश्रय कर साम्पदायिक चरणयुगल ही मेरे नित्यकर्म हैं ऐसा निश्चय और धर्म मतका प्रवर्तन कर गए हैं। श्रीधरस्वामीने अपनी मनन सुनार अहवाय अंगुछाय दया भागवतटीकामें इस साम्प्रदायिक वैशिष्ट्यका उल्लेख नवनि वसन प्रनसों धाले लगाइये। किया है। सम्प्रदाय देखो। आभरण नाम हरि साधुसेवा कर्णफूल पहले ही कहा जा चुका है, कि भक्तिका फल शान है मानसी सुनथ संग अंजन बनाइये । और इससे मनुष्यको मुक्ति मिलती है । वैष्णव साधकों- भक्ति महरानीको शृगार चारु बीरी ने एकमात्र प्रेमको ही भक्तिका मुख्य सोपान बत- चाह रंग यो निहारि लहे लाल प्यारो पाइये: लाया है। साधना और भजना द्वारा जो नहीं प्राप्त होता,