पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६७७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भक्तियुक्त। भक्तिकर-भक्तिरस भक्ति रहनेसे वह इष्टवस्तु अनायास मिल जाती है। जो सर्वदा सन्तुष्ट, समाहित चित्त, संयतात्मा और तब साधनापरम्परा भक्ति सोपानारोहणकी अवलम्बिका दृढनिश्चय हैं तथा जिन्होंने अपनी मनोबुद्धि कृष्णमें अर्पण मात्र है। कर दी है, वे ही श्रेष्ठ हैं अर्थात् जो प्राप्ति वा अप्राप्तिमें, भक्तिकर (सं० त्रि०) १ भक्तियोग्य । २ भक्तित्युत्पादक, सम्पद् वा विपमें सन्तुए रहते हैं, जो सर्वदा भगवानमें जिसे देख कर भक्ति उत्पन्न हो। निविष्टचित्त हैं, शरीर और इन्द्रियादि जिन्होंने अपने वशमै भक्तिच्छेद (सं० पु०) १ विष्णुभक्तके विशेष चिह्न । जैसे,- कर ली हैं, जिनका भगवानमें ढ़विश्वास है अर्थात् तिलक, मुद्रा आदि । २ रचना या रेखाभङ्गाविशेष, वह विडम्बनासे जिस चित्त भगवद्भावसे विचलित नहीं चित्रकारी जो रेखाओं द्वारा की जाय। होता और जिन्होंने संकल्प-विकल्पका परित्याग कर अपने भक्तिपूर्वम् (सं० अव्य०) भक्ति वा सम्मानके साथ। मन और बुद्धिको भगवानमें अर्पण कर दिया है, वे ही भक्त भक्तिभाज (सं०नि०) भक्ति भजते भज -ण्वि । भक्तिके भगवान के प्रिय हैं। जिसके द्वारा कोई मनुष्य सन्तप्त नहीं पात्र। होता अथवा जो दूसरेसे खुद भी सन्तप्त नहीं होता तथा भक्तिमत् (सं० त्रि०) भक्तिरस्यास्तीति भक्ति-मतुप । जिसने हर्ष, विषाद, भय और उद्व गका परित्याग कर दिया है, वे ही भगवान्के प्रिय हैं। जो निरपेक्ष, भक्तिमहत् ( सं० वि० ) १ अशेष भक्ति-सम्पन्न । शुचि, दक्ष, उदासीन, व्यथावर्जित और सर्वारम्भ- २ निष्ठावान् भक्त । परित्यागी हैं तथा जो इष्ट लाभ करके सन्तोष वा भक्तियोग (सं० पु०) भक्तेर्योगः भक्त्या यो योगः । . दुःखके कारण द्वषको प्रकाश नहीं करते, जो शोक वा १ भक्तिका साधन । २ सदा भगवानमें श्रद्धापूर्वक मन अकांक्षा परिशन्य और शुभाशुभ परित्यागी हैं वे ही भक्त लगा कर उनकी उपासना करना । भगवानके प्रिय हैं। जिनके लिये शत्रु और मित्र, शीत, गोताके १२वें अध्यायमें भक्तियोगका विषय इस उष्ण, मान और अपमान, सुख और दुःख सभी समान हैं प्रकार लिखा है। । ये ही भक्त भगवानके प्रिय है। "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पय्युपासते। भक्तिरस (सं० पु. ) भक्तिः ईश्वरविषया रतिरेव रसः । ये चाप्यक्षरमव्यक्त तेषां के योग वित्तमाः ॥" (गीता १२।१) तत्स्थायिभावक रसभेद, वह रस जिसका स्थायिभाव अर्जुनने भगवानसे पूछा था, "भगवन् ! निर्गुण | भक्ति है। और सगुण ब्रह्मकी जो उपासना करते हैं उनमें । "विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। कौन श्रेष्ठ है ?" उत्तरमें भगवान ने कहा, 'जो व्यक्ति एकाग्र त्याद्यत्व हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः॥ चित्त और सात्त्विक-श्रद्धायुक्त हो मेरे मगुण-स्वरूप- .. एघा कृष्णरतिः स्थायिभावो भक्तिरसो भवेत् ॥" की आराधना करते हैं, वे हो श्रेष्ठ हैं।' इसका तात्पर्य : (भक्तिरसामृतसिन्धु) यह, कि सगुण वा साकाररूपमें जिसके चित्तका एकाग्र ईश्वरमें रति स्थायिभाव प्राप्त होनेसे भक्तिरसका आवेश होता है अर्थात् जो एकमात्र गतिस्त्वं' ऐसा कह . उदय होता है। यह स्थायिभाष विभाव, अनुभाव, कर अनन्यभावमें प्रोति पूर्णविससे भगवान के शरणागत ! सात्त्विक और सञ्चारिभावके सहयोगसे भक्तिरसरूपमें होते हैं, वे ही भगवम्का स्वरूप लाभ करते हैं। मैं भगवान् परिणत होता है। उस समय भक्त एक अपूर्ण भक्ति- को उपासना करता हूं, निश्चय है, ये मेरा उद्धार करेंगे रसका स्वाद पाता है । ईश्वर और उनका भक्त आलम्बन इस प्रकार आस्तिका बुद्धिसे जिनकी सात्त्विक श्रद्धाका विभावः ईश्वरके गुणादि और भक्तको ईश्वर हेतु चेष्टादि उदय होता है और जो निज माराध्यरूपको सर्वस्व और उद्दीपन विभाव, स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, कम्प, सर्वकल्याणविधाता जान कर उन्हींकी भक्तिपूर्णचित्तसे : वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय ( सुख दुःखादि बोधान्यता ) ये भजना करते हैं, वे ही श्रेष्ठ अर्थात् भक्तयोगी हैं। सब साविक-भाव; निद, विषाद, दैन्य, ग्लानि मादि