पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६७८

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६७२ भक्तिरस-भक्तिरसामृतसिन्धु . ने तीस मञ्चारी-भाव हैं। ईश्वरमें रति पात्रके भेदमे प्राणवायुमें अर्पण कर देता है, तब प्राण दूसरी अवस्था- भिन्न होती है । शान्त, दास्य, सस्य, वात्सल्य, प्रियता में जा कर देहको अत्यन्त क्षोभित कर डालता है। उस इन पांच प्रकारों में वह प्रकाश पाता है। किसो माधक- समय भक्त के शरीर में स्तम्भादि सभी भाव उत्पन्न होते में इसका एक एक मात्र प्रकाश पानेसे उसे केवलारति हैं। और उसके विमिश्रभावमें उपस्थित होनेको कुलारति स्तम्भादि भाव --स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, कहते हैं। किन्तु इनमेंसे जो प्रधानतः प्रकाश पाता ह' वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय ये आठ सात्विक भावके उसीके अनुसार साधकका भाव निरूपित होता है। लक्षण हैं। ( भक्तिचैतन्यचन्द्रिका ) निर्वद, विषाद, दैन्य, ग्लानि, श्रम, मद, गर्व, शङ्का, भक्तिरसामृतसिन्धुमें यो लिखा है.--- . वास, आवेग, उन्माद, अपस्मृति, व्याधि, मोह, मृति, विभाव, अनुभाव, सात्त्विकभाव और सञ्चारिभाव आलस्य, जाड्य, ब्रीडा, अवहित्था, स्मृति, वितर्क, चिन्ता, द्वारा अभिव्यक्त श्रीकृष्णविषय-स्थायिभाव, श्रवणादि : मति, धृति, हर्ष, औत्सुक्य, औन, अमर्प, असूया, चापल्य, द्वारा भक्तोंके हृदय में आस्वादङ्क रता प्राप्त हो कर भक्ति-: निद्रा, सुप्ति और बोध ये तीस व्यभिचारी भाव हैं। रसरूपमें परिणत होता है। _ श्रीकृष्णविषयिणी रतिको स्थायीभाव कहते हैं । इसका भक्तिरसके अधिकारी विशेष विवरण भक्ति-रसामृतसिन्धु और हरिभक्ति जिसके हायमें प्राक्तनो और आधुनिकी सद्भक्ति- विलाम आदि ग्रन्थों में लिखा है। वासना विराज करती है, उसीके हृदयमें इस भक्तिरस- भक्तिरमामृसिन्धु--श्रीरूप गोस्वामिकृत ग्रन्थविशेष । का आस्वादन उत्पन्न होता है । यह ग्रन्थ चार भागोंमें विभक्त है। प्रथम भागका नाम भक्तिरसका विभाव-आस्वादनके कारणोंको विभाव पूर्व विभाग है । इस पूर्वविभागमें चार लहरी हैं । यथा- कहते हैं। यह विभाव आलम्बन और उद्दोगनके भेदसे । सामान्यभक्तिलहरी, साधनभक्तिलहरो, भावभक्तिलहरी दो प्रकारका है । इनमेंसे कृष्ण और कृष्णभक्तगण और प्रेमभक्तिलहरी । आलम्बन-विभाव है। ___द्वितीयका नाम दक्षिणविभाग है। इसमें पांच- जो भावको प्रकाश करता है, उसे उीपनविभाव लहरी है--विभावलहरी, अनुभावलहरी, सात्त्विक- कहते हैं। श्रीकृष्णका गुण, चेष्टा प्रसाधन, स्मित, अङ्ग लहरी, व्यभिचारिलहरी और स्थायिभावलहरी। सौरभ, वंश, शृङ्ग, नूपुर, शङ्क, पदाङ्क, क्षेत्र, तुलसी, भक्त तृतीय भागका नाम पश्चिमविभाग है। इसमें और तद्वासरादि उद्दीपन विभाव हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर यह पञ्च मुख्य भक्तिरसका अनुभाव चित्तगत भावके नोधकको भक्तिरस पांच लहरीमें वर्णित है। . अनुभाव कहते हैं। वह अनुभाव कैसा है, उसका विवः चतुर्थ भागका नाम उत्तरविभाग है । इसमें नौ लहरी रण निम्नश्लोकमें किया गया है । हैं। एकसे ले कर सात लहरीमें हास्यादि सप्त गौणरसका "नृत्य विलुठितं गीतं कोशन तनुमोटनम् । - वर्णन है। अष्टम लहरोमे रसकी मैनवैरस्थिति और हुकारो जुम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता। नवम लहरीमें रसाभास वर्णित है। लालास्त्र मेंऽट्टहासश्च घूर्णा हिक्वादयोऽपि च ।" इस ग्रन्थकी श्लोकसंख्या मूल ३३२५, टोका ३६४४ सात्विकभाव-साक्षात् वा परम्परामें कृष्णसम्बधिभाव है। इसके टोकाकार श्रीजीव गोस्वामी हैं। प्रन्थरचना- द्वारा आक्रान्त चित्तको सच कहते हैं। इस सत्त्वसे का काल ... उत्पन्न भावका नाम सात्त्विकभाव है । यह सात्विकभाव "रामांगशकगणिते शाके गोकुलमधिष्ठितेनायं । स्निग्ध, दिग्ध और रुक्षके भेदसे तीन प्रकारका है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धुर्बिटङ्कितः क्षुद्ररूपेण ॥" जब भगवद्भावसे आक्रांत चिस अधीर हो कर अपनेको मैंने भद्र हो कर भी राम (३) अङ्ग (६) शक (१४)