पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६८०

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६७४ भक्ष्य-भल्याभक्ष्य गुड़जात लक्ष्यद्रष्य-पुष्टिकर, गुरुपाक, वायुनाशक, तरल और पिण्डाकृति होनेसे गुरुपाक तथा कठिन होने- अदाही, पित्तनाशक, शुक्र और कफवर्द्धक है। घृतादि से लघुपाक होता है। ससका अवलेह मृदुता प्रयुक्त द्वारा पक्क गोधूमचूर्णजात पिष्टक और मधुमिश्रित बहुत जल्द पचता है। लाज (खील )--सदी और पिष्टक विशेषरूपसे गुरुपाक और बलवृद्धिकारक है। अतिसारनाशक, अग्निकर, कफनाशक, वलकर, कषाय मोदक द्रव्य अति दुर्जर अर्थात् सहजमें जीर्ण नहीं! और मधुररसविशिष्ट, लघुपाक, तृष्णा और मलनाशक । होता। सट्टक या जीरा मिला हुआ मट्ठा-रुचि, अग्नि : लाज या खीलका सत्तू-तृष्णा, सदी, दाह, धर्म, रक्त- और स्वरका हितकर, पित्त और वायुनाशक, गुरुपक पित्त और ज्वरनाशक । पृथुक---गुरुपाक, स्निग्ध, वृहण और तथा बलवृद्धिकारक। विष्यन्दन अर्थात् कचा गोधूम, कफवद्ध नकर । दुग्धमिश्रित पृथुक-बलकर, वायु. चूर्ण घृत और दुग्धके साथ प्रस्तुत ग्वाद्य मुखप्रिय, . नाशक और मलभेदक । नूतन बण्डु ल-अतिशय दुर्जर, सुगन्धी, मधुर, स्निग्ध, कफकर, गुरुपाक, वायुनाशक, : मधुररसविशिष्ट और वृहण, पुरातन तण्डुल-भग्न- तृप्ति और बलकर। गोधूम चूर्ण द्वारा प्रस्तुत भक्षा : सन्धानकर और मेहनाशक माना जाता है। चिकित्सक- द्रव्य-वृहण, वायु और पित्तनाशक तथा बलकर ; इन ! को चाहिये, कि वे भक्ष्यद्रष्यका इस प्रकार गुणागुण मेसे फेनक अर्थात् गुड़मिश्रित खाद्य द्रव्य अतिशय मुख- स्थिर करके भोक्ताके इच्छानुसार भक्षाद्रव्य निर्देश कर प्रिय, हितकारक और लघुपाक है। मुद् प्रभृनि वेस- दें। (मुश्रुत सूत्रस्था० ४६ अ०) वार -विष्टम्भी और वेसवार मांसके साथ होनेसे गुरु- भक्ष्यकार (सत्रि०) भक्षा भक्षाद्रव्यं करोतीति क पाक और वहण । पालल अर्थात् तिल गुड़ादि द्वारा . ( कर्मण्यन् । पा ३।२।१) इति अन् । पिटकविक्रय- प्रस्तुत पिटक श्लेग्मजनक, शकुलि, कफ और पित्तका जीवी, हलवाई। पर्याय---आपूपिक, कान्दविक, पूपिक, प्रकोपकर, विदाही और अतिशय गुरुपाक । वैदल (पिष्टक- पूपविक्रयी, मोदकादिविक्रयी। ( शब्दरत्ना० ) भेद). लघुपाक, पायरसविशिष्ट एवं वायुसञ्चारक; उरद भक्ष्याभक्ष्य ( स० क्लो०) भक्ष्यमभक्ष्यश्च । स्वाद्याखाद्य- संकान्त पिष्टक विष्टम्भी, पित्तगुणविशिष्ट, श्लेषमनाशक, द्रव्य, खाद्य और अखाद्य । मल-वृद्धिकर, बल और शुक्रवर्द्धक तथा गुरुपाक। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें भक्षोभक्षाका इस प्रकार विवरण कुर्चिका अर्थात् दुग्ध विकारजात खाद्यद्रष्य-गुरुपाक लिखा है,- और नातिपित्तकर। घृतपक्क खाद्यद्रष्य--हृद्य, सुगन्धी, लौहपात्रमें पयः, गव्य, सिद्धान्न, मधु, गुड़, नारियल- शुक्रवर्द्धक, लघुपाक, पित्त और वायुनाशक, बलकर, का जल, फल और मूल अभक्षा है। दग्धान्न, तप्तसौवीर, वर्ण और दूष्टिका प्रसन्नताकारक। तैलपक्क खाद्यद्रष्य - कांस्यपात्रमें नारिकेलोदक, ताम्रपात्रमें मधु और गव्य विदाही, गुरुपाक, परिपाकमें कटुरसविशिष्ट, वायु और अभक्षा है; किन्तु घृत भक्षा है। ताम्रपानमें पयःपान, उच्छिष्ट दृष्टिनाशक, पित्तकर और त्वक्का दोषनाशक । फल, घृत भोजन, सलवण दुग्ध, मधुमिश्रित घृत वा तैल और मांस, चीनी, तिल और उरद द्वारा प्रस्तुत तैल संस्कृत गुणयुक्त आद्रक, पोतशेष जल, माघमासमें मूलक भक्ष्य द्रव्य--वलकर, गुरुपाक, वृहण, हृद्य और प्रिय। अभक्षा है। श्वेतवर्णताल, प्रतिपदमें कुष्माण्ड, द्वितीया- सूप भक्ष्यद्रष्य--अतिशय लघुपाक, किलाट (छेना) में वृहती, तृतीया और चतुर्थी में मूलक, पञ्चमीमें विल्व, आदि दुग्धपा. और कफवद्ध नकर । कुल्माष अर्थात् षष्ठीमें निम्ब, सप्तमीमें ताल, अष्टमीमें नारिकेल, मल्पसिद्ध यव गोधूमादि वातकर, रूक्ष, गुरुपाक और नवमीमें तुम्बी, दशमीमें कलम्बी, एकादशीमें शिम्बी, मलका हितकर ; भृष्टयव और गोधूमादिका मण्ड उदा- द्वादशीमें पूतिका, त्रयोदशीमें वार्ताकु, चतुर्दशीमें माष, वर्तरोगनाशक और कास, पीनस तथा मेहप्रतिषेधक।। पूर्णिमा और अमावस्यामें मांस तथा रविवारमें आद्रक सब प्रकारका सत्त-गृहण, वृष्य, तुष्णा, पित्त और कफ- अभक्षा है । ब्राह्मणों के लिये हविष्यान्न भक्षा है । भक्षया. नाशक, बलकर, भेदक और वायुनाशक। यह सत्त. भक्षाका विषय ब्रह्मवैवर्तपुराण-ब्रह्मस्व एडके २७ मध्यायमें