पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६८२

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६७६ भगन-मगण भगन ( स० पु. ) भगं तन्नेलं हन्ति रक् । महादेव ।। समयमें विषुवध व होगा, उस समय सूर्य मेषमें जायंगे। दक्षयक्षमें रुद्रने भगको माखें फोड़ दी थी; इसीसे इस प्रकार सूर्य बारह महीनेमें एक एक करके मेषादि इनका नाम भनघ्न पड़ा है। बारह राशियोंका भोग करते हैं। इन बारह राशियोंका "नमस्ते त्रिपुरनाय भगघ्नाय नमोनमः ।" भोग करनेसे एक भगण होता है। (भारत ७।२०२ अ०) चतुयुगमें सूर्य, बुध और शुक्रका मध्य (ग्रहोंकी भगण (स.. पु०) भानां नक्षत्राणां गणः समूहः।१ . पथार्थ गतिका नाम मध्य है) तथा मङ्गल, शनि और नक्षत्रसमूह। किसी ग्रहके एक बार बारह राशि भ्रमण' वहस्पतिका शोघ ४४२०००० भगण, चन्द्रका ५७७५३३६ करनेका नाम एक भगण है अर्थात् किसी ग्रहके मेषादि : भगण, चन्द्र केन्द्रका मध्य ५७२६५१३७ भगण है । मङ्गल- बारह राशियोंका अतिक्रम करने में जो समय लगता है, का मध्य २२९६८३२ भगण है। बुधका शीघ १७६३७०७६, उसोको भगण कहते हैं। सूर्यसिद्धान्तमें लिखा है, कि । वृहस्पतिका मध्य ३६४२१२ भगण, शुक्रका शीघ्र साठ विकलाकी एक कला, साठ कलाका एक अंश, । ७०२२३६४ भगण, शनिका मध्य १४६५८० भगण भौर तीस अशकी एक राशि और बारह राशिका एक भगण, राहुका मध्य २३२२४२ भगण है।। होता है। ग्रहोंके मध्य भगण और शीघ्र-भगण जो ऊपर बत- "विकलानां कलाषट्या तत्वष्ट्या भाग उच्यते । लाये गये हैं, उन्हें कल्यब्दसे गुणा करके तेंतालीस लाख तत्रिंशता भवेद्राशिभंगणा द्वादशैव ते॥" (सूर्यसि.) बोस हजारसे भाग दो, भागफल भगण होगा। भागशेष- इस प्रकार एक एक ग्रह सभी नक्षत्रोंमें रह कर को १२ से गुणा करके उक्त भाजक द्वारा भाग देनेसे जो बारह राशिका भोग करता है। नक्षत्र में भोग होनेके लम्धि होगी वह राशि और भागशेषको ३० से गुणा कर- कारण उसका नाम भगण पड़ा है। के भाजक द्वारा भाग देनेसे अंश; फिर शेषको ६०से "शीधगस्तान्यथाल्पेन कालेन महताल्पगः । गुणा करके भाजक अङ्क द्वारा भाग देनेसे लब्धि कला तेपान्तु परिवर्तन पोष्णान्ते भगणाः स्मृतः॥" (मर्यसि.) होगी। पीछे इसी प्रकार प्रक्रिया द्वारा विकलादि भी प्रहार्णवमें इस प्रकार लिखा है, पहले देशान्तर स्थिर निकाली जायगी। इस लब्धिमें भगणका त्याग करना करके पीछे भगणका निरूपण करना आवश्यक है। होगा। अनन्तर राश्यादिमें अपना अपना मध्य, शोध, सुमेरु पर्वत और लङ्काको मध्यगत भूमिके ऊपर हो कर क्षेपाङ जोड़नेसे जिस समय सूर्य मेषराशिम जायेंगे, उस उत्तरदक्षिण विस्तीर्ण जो एक रेखा कल्पित हुई है, समयका मध्य शीघ्र होगा। उसका नाम मध्यरेखा है। उस मध्यरेखासे अपना स्वीय शीघ्र क्षेपाङको स्वीय शीघ्रमें जोड़नेसे स्वीय देश जितना योजन दूर होगा उतने योजनको दशसे शीघ्र होगा। क्षेपाङ्क राश्यादि-रविका मध्य ११।२७। गुणा करके तेरहसे भाग दो। भागफल जो निकलेगा . ५१४०. चन्द्रका मध्य १११।२४।३३।२२, चन्द्र केन्द्रका वही पल होगा । वह पल यदि ६०से अधिक हो, तो उसे मध्य ८।१।३।३।२५, मङ्गलका मध्य ११२२८५१२४६३८, दण्डमें ला कर मध्य रेखाके पूर्व देशमें जोड़ो भौर बुधका शीघ्र ११।२१।७।१२।५८, गृहस्पतिका मध्य ११॥२६॥ मध्यरेखाके पश्विमवेशमें घटाभो। ४६।१०१५६, शुक्रका शीघ्र ११।२६।३१।२४।५४, शनिका विषुव दिनका अद्धि १५ दण्डसे जितना अधिक मध्य १३२६५५।३८।४६, राहुको मध्य ५।२६।५३।६।३७ होगा उसे युक्त-चराद्ध और जितना न्यून होगा, उसे इस क्षेपाङ्गका योग करनेसे सूर्य जिस समय मेषराशिमें हीन-चराद्ध कहते हैं। युक्त चरार्द्ध जितना होगा, जायेंगे उस समयका मध्य होगा। उसे विषुवसंक्रान्तिके वारादिमें योग और होनचराद्धको . जिस वर्षके जिस दिनके जिस समयका मध्य लामा वियोग करना होगा। ऐसा करनेसे चरार्द्ध संस्कृत : होगा, पहले उस वर्षके विषुवदिनका मध्य स्थिर कर विषुवघ्ष निकल भायेगा। जिस बारमें जितने दण्ड : विषुवदिनसे वह अभीष्ट विनसंख्या जितनी होगी उसे