पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६८६

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६८० मगन्दर हरिदा, बेड़ेला, लोध्र तथा गृहधूम इनका प्रयोग भी कार्य जम्बोष्ठ वा तप्त लोहशलाका द्वारा दग्ध करना उचित कारी है। सीज या अकथनके गोंदके साथ दारुहरिद्राके है। गन्दर रोगी आरोग्य होने पर भी एक वर्ष तक चूर्णका पाक करके उससे वर्ति बना कर शोषमें प्रविष्ट : उसे व्यायाम, स्त्री-संसर्ग, युद्ध, अश्वादि पर आरोहण करानेसे भगन्दर वा सर्वशरीरगत शोष निवारित होता और गुरुद्रष्य भोजन त्याग देना चाहिए। . . है, तथा त्रिफलामें क्वाथके साथ विडालास्थिको पोस : (भावप्र. भगन्दर रोगाधि० ) कर प्रलेप देनेसे भी भगन्दर आरोग्यं हो जाता है। सुश्रूतमें भी भगन्दररोगकी चिकित्सा प्रणाली लिखी विडङ्गसार, त्रिफला, छोटी इलायची और पिप्पलीचूर्ण है। इन पांच प्रकारके भगन्दरोंमें शम्बूकावत और इनको मधु और तेल के साथ चाटनेसे भगदर शीघ्र शन्यज भगन्दर ही असाध्य है। अवशिष्ट तोन कष्ट- हो प्रशमित होता है। इसके सिवा विष्यन्दन तैल, साध्य हैं। भगन्दर होने पर अपक्य अवस्थामें रोगीको निशाध तैल, करवीरादि तैल और नववार्षिक गुग्गुल ' अतितपणसे ले कर विरेचन पर्यन्त एकादश प्रकार आदि औषध भो विशेष उपकारक हैं। प्रतिकार करना विधेय है। पीड़का पक जाने पर स्नेह- शतपोनक भगन्दरमें नाड़ीके बगल में क्षत करके दूपित मर्दन और अवगाहन करना उचित है । स्नेह वा रक्तको निकाल देना चाहिए । पीछे उस क्षतके भर क्वाथ आदि किसी प्रकार तरल पदार्थ में शरीरको डुबो जाने पर नाडीव्रणकी भांति चिकित्सा करना उचित है। देना अवगाहन कहलाता है। पश्चात् रोगोको शय्या बहु छिद्रविशिष्ट शतपोनकरोगमें चिकित्साकी विवेचना । पर लिटा कर अर्श रोगीकी भांति सूत्र वा शाटकयन्त्र- पूर्वक अर्द्ध लागलक, लाङ्गलक, मर्वतोभद्रक वा गोतीर्थक से बांध कर भगन्दर अधोमुख है या अर्द्ध मुख है, भलो छेदन करना चाहिए। मलद्वारके दोनों ओर समान भांति परीक्षापूर्वक एषणोसे क्षतस्थानको ऊचा करके छेदन करनेको लाङ्गलक छेदन और एक तरफ हुस्वछेदन , पूयाशय सहित छेदन कर उठा लेना चाहिए । अन्तमुख करनेको अर्द्ध लाङ्गलक छेदन कहते हैं। मेवनीस्थान भगन्दर होने पर रोगोको भलीभांति शंध कर प्रवाहण परित्याग-पूर्वक गुह्यद्वारको चार खण्डोंमें छेदन करना सो अर्थात् मलद्वारमें वेग देना पड़ता है। इस प्रकारको सर्वतोभद्रक छेद है । मल-निगममार्ग की तरफ न । प्रक्रियासे भगन्दरका मुंह दीखने पर, एषर्णा प्रदान- करके बगलसे छेदन करना गोतीर्थक छेद है। शत- पूर्वक शस्त्रपात करना उचित है। अग्नि वा क्षारका पोनकरोगमें पूयादि स्रावके सभी मुखोंको अग्निकर्म प्रयोग सभी भगन्दर रोगोंमें होगा। द्वारा दग्ध करना चाहिए । ____ शतपोनक भगन्दरमे मलद्वारके बीच पहले क्षद्र ___ उष्ट्रप्रोव भगन्दररोगमें शोषके बीच में एषणी प्रविष्ट व्रणोंको छेदना चाहिए। उन घावोंके भर जाने पर करके छेदन किया जाता है। पोछे उसमें क्षार प्रयोग फिर मलद्वारकी मूलनाडीकी चिकित्सा की जाती है। जो तथा पूतिमार्ग निवारणार्थ अग्निकर्म भी हितकर है। शिराए परस्पर सम्बद्ध हैं उनमेंसे प्रत्येकको ब्राह्मदेशमें नावमार्ग को शास्त्रसे छेद कर क्षार वा अग्निकर्म द्वारा छेदन करना उचित है। जो नाडियां परस्पर संबंध दग्ध करना चाहिए। शोषका अन्वेषण करके शास्त्र नहीं है, उन्हें भी एक साथ छेद देनेसे अणका मुख अत्यंत द्वारा छेदन करना उचित है। छेदनकेलिए खजूर- वृहत् हो जाता है । इसलिए उस प्रशस्त मुखसे मलमूत्र पत्रिक, अर्द्ध चन्द्र, चन्द्रवग , सूचीमुख और अवाङ मुख! निकला करता है, तथा वायु द्वारा आटोप और मल- शास्त्रोंका प्रयोग हितकर है। छेदन के बाद अग्नि वा द्वारमें पीड़ा होने लगता है। इस प्रकारके भगन्दर में क्षार द्वारा दग्ध करना चाहिए। मुख प्रशस्त करके छेदन नहीं करना चाहिए । शस्त्रप्रयोग द्वारा यदि अत्यन्त वेदना उपस्थित हो इस बहुछिद्र-युक्त भगन्दर रोगमें साईलाङ्गलक, तो उष्ण तैलका परिषेचन करना चाहिए । शल्यज लाङ्गलक, सर्वतोभद्र अथवा गोतीर्थक छेदन किया जा भगन्दरमें यत्नके साथ शोषको छेदन कर अग्नि वा सकता है । रक्तादिस्रावके मार्गाको अग्नि द्वारा जला देना