पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६९०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


६८४ भगवन्तनगर-भगवानलाल इन्द्रजी वंशको तालिका प्रदान की है । राजा कर्ण के पुत्र विशोक, । भगवानलाल इन्द्रजी-स्वनामख्यात एक प्रनतस्ववित् । विशोकके अष्टशक, शकु के राय, रायके वैराटराज, वैराटके | इन्होंने अपनी विद्यापराकाष्ठाके लिए पण्डित तथा उाकर वोढ़राज, वीढ़के नरब्रह्मदेव, नरब्रह्मके मनुष्यदेव, मनुष्यके | की उपाधि प्राप्त की थी। इनके पूर्वपुरुषगण सौराठ- चन्द्रपाल, चन्द्रपालके शिवगण, शिवके रोलिचन्द्र, रोलि- (सौराष्ट्र )-के नवाब सरकारके अधीन काम कर अथवा के कर्मसेन, कम के रामचंद्र, रामके यशोदेव, ताराचन्द्र, देशीय राजन्यवर्गको सहायता पा कर विशेष प्रतिष्ठाशाली यशोदेवके ताराचन्द्र के पुत्र चक्रसेन, पौत्र राजसिह | हुए थे । उक्त ब्राह्मण-वंशके प्राचीन प्रथानुसार शैशवा- और प्रपौत्र साहिदेव थे। इन्हीं साहिदेवके पुत्र भग वस्थामें ही बालक भगवान्को संस्कृतभाषा सीखनी वतदेव विशेष विद्योत्साही और सजनप्रतिपालक थे। । पड़ी। इसके अलावा उन्हें विद्यालयके निर्दिष्ट पाख्य भगवन्तनगर---अयोध्या प्रदेशके हर्दोई. जिलान्तर्गत एक अध्ययन करने पड़ते थे। अपनी धीशक्तिके प्रभावसे नगर। प्रायः दो सौ वर्ष हुए, सम्राट् औरङ्गजेबके और असाधारण अध्यवसायसे वे शीघ्र ही साहित्य, हिंद-दीवान राजा भगवन्तरार अपने नाम पर यह नगर काव्य, दर्शन तथा शास्त्रमूलक संस्कृत प्रन्यादिमें पार- स्थापित कर गए हैं। दशों हुए। शानवृद्धिके साथ साथ उनकी ऐतिहासि- भगवन्तराय... भाषाके एक कवि । इन्होंने तुलसीदासकृत अनुशीलनी शक्ति भी दिनों दिन बढ़ती गई । स्वदेशस्थ मानस रामायण के सातों काण्डोंका कवित्तों में अनुवाद गिर्नर पर्वत पर छिपी हुई प्राचीनतम गौरवकीर्तियोंकी किया है। इनकी रचना 3 ऐतिहासिक श्रुतिका अवलम्बन कर वे प्रनतस्वविषयक भगवन्तसिंह खीचर-गाजोपुरके एक हिंदू नरपति । यथेष्ट अनुसन्धानका परिचय दे गये हैं। इन्होंने राजद्रोहो हो कर कोरा पर अधिकार जमाया और वाल्यकालसे ही उनके हृदयमें यह अनुसन्धित्सा- वहांके शासनकर्ता जान्नोसर खाँको भगा दिया। अन्तमें प्रवृत्ति प्रवल हो उठी। उस समयकी आन्तरिक श्रद्धा वे युद्ध में मारे गए । यह खबर दिल्ली पहुंचते ही राजमंत्री तथा भक्तिके कारण वे गिनर-पर्वत पर चढ़ कर प्रायः कमरुद्दीन खाँने अपने बहनोई के हत्यापराधकका बदलो इधर उधर घूमनेमें ही समय बिताते थे। पर्वतके ऊपर चुकाने के लिए उनके विरुद्ध युद्ध-यात्रा की; किंतु युद्धमें सम्राट अशोककी प्रशस्ति और रुद्रदाम तथा स्कन्दगुप्त- हार खा कर वे लौट गए । मन्त्रिवरके आदेशसे फर्रुखा- । आदत की सामयिक शिलालिपि खोदित देख कर उनके हृदय- वादके नवाब महम्मद खाँने कोरा पर चढ़ाई की; किंतु 1 में वड़ा ही कौतुहल उत्पन्न हुआ। प्रस्तरगात्रमें खोदी वे भी विफल मनोरथ हो अपने राज्यमें लौट आये। हुई उस विचित्र लेखमालाका समावेश देख कर पहले वे अन्तमें दिल्लीश्वर द्वारा यह राज्य बुर्हान-उल मुल्कके हाथ चमत्कृत हो गए। उसे पढ़ने पर सम्भवतः उससे कोई सौंपा गया। नवाव और राज्यसन्यमें घोरतर लड़ाई अलौकिक तत्व आविष्कृत हो सकता है, यही चिन्ता छिड़ी। युद्धक्षेत्रमें विशेष वोरत्व दिखा कर भगवत कोराके चौकादार दुर्जन सिंहके हाथसे मारे गए। उनके सुकुमार हृदयमें निरन्तर जागरुक रही। धीरे भगन्मय ( सं० त्रि०) कृष्णार्पितचित्त, जो निश्चितरूपसे धीरे वे प्रिन्सेप साहवकृत 'भारतीय अक्षर तालिका' भगवान्के ध्यानमें लगा हो, ईश्वरमें लवलीन रहने- संग्रह कर उसीको सहायतासे उसे पढ़ जनसाधारणको समझा देनेमें समर्थ हुए । बालककी इस अद्भुत याला। भगवान् (हिं० वि० ) भगवत् देखी । प्रतिभाको देख कर फार्विस साहब (Mr. Kinloch For- भगवानगञ्ज · अयोध्या जिलान्तर्गत एक प्राचीन ग्राम bes) ने भगवान्को पण्डितकार्यमें नियुक्त करनेके लिए यहां एक अति प्राचीन भग्न एकस्तूप और ध्वंसावशिष्ट : डा० भाऊदाजीसे विशेष अनुरोध किया। तदनुसार मन्दिरका निदर्शन पाया जाता है । प्रत्नतत्वविदगण वे १८६१ ई में भाऊदाजी पण्डितके अधीन रह कर इस स्तूपको ईस्वी सन् छठी शताब्दीके पहलेका बना हुआ प्रत्लतत्त्वानुसन्धित्साके प्रशस्तक्षेत्रमें अप्रसर हुए। द्रोणस्तूपके जैसा अनुमान करते हैं। डा० भाऊदाजी और पण्डित गोपालपाण्डुरङ्ग एक साथ