पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६९५

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कहते हैं। इनमेंसे चर्णित, छिन्न, अतिपातित और मजानु-1 प्रकार रहना चाहिये कि किसी प्रकारकी तकलीफ न गत कृच्छ साध्य हैं। कृश, गृद्ध, क्षीण और क्षयरोगी मालूम पड़े। न्यग्रोधादिका शीतल क्याथ उस बंधन- कुष्ठ और श्वास रोगियोंके सन्धिभङ्ग होनेसे वह कष्टसाध्य | स्थान पर सींच दे। भङ्गस्थानमें वेदना मोलूम होनेसे समझा जाता है। पञ्चमूलीके साथ दुग्धको पाक कर उस दुग्ध अर्थवा जिसका कपाल बिलकुल फट गया हो तथा कटि | चक्रतैलका उस पर सेक दें। काल और दोषको विचार देशको सन्धि मुक्त वा भ्रष्ट हो और जघनदेश प्रतिपिष्ट हो कर दोषघ्न औषधके साथ सेक और प्रलेपका शीतल गया है, उसके जीवनकी कोई आशा न रखें। चिकि, अवस्थामें भङ्गाके ऊपर प्रयोग करना उचित है। बराह त्सव ऐसे रोगियोंका परित्याग कर दें। जिसके कपाल वा शूकरके दुग्धको घृत और मधुर भीषधके की अस्थि विश्लिष्ट और ललाट चूर-चूर हो गया है, साथ पका कर जब वह ठडा हो जाय, तो उसे स्तन, शङ्ख, पृष्ठ और मस्तक टूट गया है तथा जिसकी लाक्षारसके साथ भग्नरोगोको भयेरे पीनेको है। भङ्ग- अस्थि और सन्धि स्थान पहलेसे ही विकृत हो गया है, स्थानमें फोड़ा होनेसे उसमें प्रतिसारणीय द्रष्यका प्रचुर वैसे रोगीके भी जीवनकी आशा न रखें, चिकित्सकके परिमाणमें घृत और मधुके साथ सेक दे तथा यथाविधि लाख प्रयत्न करने पर भी वह आरोग्य नहीं हो सकता। भङ्गकी चिकित्सा करे। बालकको अस्थि वा सन्धि- (मुश्रुत नि० १५ अ०) । भङ्ग सहजमें आरोग्य होता है। किसी रोगीके यह इस रोगको चिकित्साके सम्बन्धमें निम्नलिखित भङ्गरोग यदि अल्पदोषविशिष्ट तथा शिशर कालमें हो, प्रकरणोंके प्रति विशेष लक्ष्य रखना कर्त्तव्य है। तो नचपनमें एक मासमें और बुढ़ापेमें तीन मासमें अल्पाहारी, अमिताचारी, अथवा वायुप्रकृति व्यक्तिके सन्धि दृढ़ हो जाती है। भङ्गस्थानकी अस्थि टेढ़ी हो भग्नरोग होनेसे अथवा भग्नरोगमें किसी प्रकारका उपद्रव जानेसे उसे उन्नमित और उन्नमित होनेसे उसे अवनमित होनेसे वह बड़ी मुशिकलसे आरोग्य होता है। मैथुन, करके बंधन करे। अस्थि यदि सन्धिस्थानसे हट जाय, सूर्यताप, व्यायाम, अथवा रुक्ष अन्नका भग्नरोगीको कदापि तो उस स्थानको अच्छी तरह खींच कर भग्न अस्थिके सेवन नहीं करना चाहिये। अभिश चिकित्सकको चाहिये साथ मिला देना उचित है। सन्धिस्थानसे अस्थिके कि वे भग्नरोगीको पालि धान्यका तण्डुल, मांस रस, दुग्ध, अधोगत होनेसे उसे ऊपर उन्नत करके पोछे बन्धन और घृत, छोटे मटरका जूस तथा अन्यान्य पुष्टिकर आहार लेपनादिका प्रयोग करे। खानेको दे। मधुक, उडम्बर, अश्वत्थ, पलास, अर्जुन, प्रत्यङ्ग भङ्गकी चिकित्सादि नोने लिखी जाती है। घंशसाल अथवा वटके त्वक्का भग्नस्थानमें प्रलेप देकर उप्ले नखसन्धि उत्पिष्ट हो कर रक्तके सञ्चित होनेसे आरा बांध दे। मंजिष्ठा, यष्टिमधु, अथवा रक्तचन्दन वा घृतको | मामक शस्त्रद्वारा उस स्थानको मथित कर सञ्चित रक्त सौ बार धो कर पिष्ट शालितण्डुलके साथ पिला कर बाहर निकाल दे। पीछे उसमें पीसे हुए शालितण्डुलका प्रलेप देनेसे भग्न आरोग्य होता है। हेमन्त और शिशिर लेप दे। उंगली टूटने वा संधिविश्लिष्ट होनेसे संधि कालमें प्रति दिनके अन्तर पर, शरत् और वसन्त स्थानको समभावमें स्थापित करके उसे बारीक कपड़े- कालमें ५ दिनके अन्तर पर तथा आग्नेय ऋतुमें प्रति तीन से लपेट दे और ऊपरसे घीका सेक दे। जांघ वा उसके दिनके अन्तर पर प्रलेप बदल कर फिरसे बांध देना! भंग होनेसे उसे दीर्घ भावमें खोंच कर संधिस्थान पर उचित है। भग्न स्थानमें कोई दोष होनेसे घन्धनको पूर्वोक्त प्रकारसे वृक्षको छाल रख दे और ऊपरसे बारीक खोल कर फिरसे बांध देना आवश्यक है। उस बन्धनके कपड़े द्वारा बंधन कर दे। कटीके भङ्ग होनेसे कटीके शिथिल होनेसे सन्धिस्थान स्थिर नहीं रहता। बंधन ऊद्धं और अधोभागको खींच कर संधिमागको अपने दूढ़ होनेसे वह जगह सूज जाती और वेदना होती है। स्थानमें संयोजित करे। सन्धिको अपने स्थानमै पीछे वह स्थान पक जा सकता है। अतः बंधन इस संयोजित करने में वस्तिक्रिया करनी होती है। Vol, XY 173