पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७०४

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मड़ा उपयुक्त अर्थदण्ड या भोजन दे कर समाज में प्रवेश करना शेख-भगियोंका विवाह अनेकांशमें मुसलमानोंकी चाहता है, तो यह सभा उसे जातिमें शामिल कर शादी वा निकाहके सदृश है। हिंदूशाखामें पहले घटक सकती है। (बिचधरिया ) द्वारा सम्बध और कन्या-पण स्थिर होने ये अपनी अपनी श्रेणीमें विवाह करलेके लिए वाध्य पर शुभ लग्न ठहराई जाती है। उस दिन भोज होता हैं, परन्तु स्वगोत्र ( तर ) में नहीं। किन्तु यदि है। दूसरे दिन वरके यहां और उसके एक दिन कन्या अन्य श्रेणीकी स्त्री पहले लालबेगी-समाजमें शामिल हो के यहां भी एक विवाह मञ्च बनाया जाता है। ब्राह्मणों जाय, तो फिर उसके ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं। द्वारा 'साइत' ( शुभदिन ) सोधी जानेके बाद, वरपक्षके इस प्रकारसे ये डोम, चमार आदिकी कन्या भी ग्रहण लोग वरको ले कर लड़कीवालेके यहां जाते हैं । उस करते हैं। पहली स्त्रीको अनुमति के बिना, अथवा उसके समय लड़कोवाला उनके बैठनेके लिए स्थान दे कर एक बांझपनेको साबित किये बिना ये लोग दूसग विवाह हंडी अन्न वरके सामने रखता है। वरके मित्रों द्वारा नहीं कर सकते। फुफेरो या मौसेरी बहन और बड़ो। उसका आस्वाद लिये जानेके बाद लड़कावाला उस. सालीके साथ विवाह करना निषिद्ध है । अन्यान्य के बाद दुआरवार-प्रथा अर्थात् दरवाजेके एफ तरफ खडे. थोकोंमें भी ऐसे ही कुछ नियम बने हुए हैं। परन्तु हो कर वर और कन्या परस्परको अवलोकन करते हैं। अन्य साधारण लोग स्वश्रेणीके अतिरिक्त दोनों में चादर मात्रका व्यवधान रहता है। पश्चात् अन्य श्रेणी में विवाह नहीं कर सकते। सवर्णविवाहको यथारोति वरण प्रारम्भ होता है और तिलकदानके बाद ये लोग 'शादी' कहते हैं। डोम, धोबी आदि निम्न श्रेणी- गठजोड़ हो कर विधाहकार्य समाप्त होता है। बाबा- की कन्या यदि यथाविधि भगी-दीक्षा ले कर विवाह करे जो कहलानेवाला साधुचेता कोई एक भगी अथवा वर- तो उस असवर्ण-विवाहका नाम 'सगाई' होगा। वह स्त्रो ! का बहनोई को हो गठजोड़ा करनेका अधिकार है । इसके धर्मान्तर ग्रहण करने पर भी 'परजात' समझी जायगी, दूसरे ही दिन सुवह वरकन्याको विदा होती है। उस परन्तु उसकी सन्तान भंगी होगी। शेख लोग इस्लाम- समय वरके कन्यापक्षीय गुरुजनोंको नमस्कार करने पर धर्ममें दीक्षिता भद्रवंशोया स्त्रियोंका पाणिग्रहण कर उसे अवस्थानुसार 'बिदाई' मिला करती है। उस सकते हैं। परन्तु वह स्त्री कुनबी, अहीर, कोइरी आदि के बाद वहांके नाई, धोविन और दाइयोंको कुछ कुछ जातिकी होने पर विवाह नहीं हो सकता। इनाम दिया जाता है। घर आनेके बाद ४ दिन वर और ___लालबेगी-दलमें शामिल करनेकी दीक्षा-प्रणाली इस कन्याकी परस्पर भेंट नहीं होती । चौथे दिन बरपक्षीय प्रकार है:-जो व्यक्ति इस धर्मान्तर ग्रहणको इच्छुक है, सारो स्त्रियां इकट्ठो हो कर एक कम्बल पर दूल्हा और उसे सामर्थ्यानुसार 5 सवा मनसे ले कर ऽ५ सेर तक दुलहिनको आमने सामने बिठा कर शर्म छुडा देती हैं। मिठाई बनवा कर जातीय सभाके समक्ष एक चौको इनमें भी विवाह-बधन-छेदनकी व्यवस्था है। स्वामि- पर रखनी होगा। फिर यथापूर्व कुसीनामा वंशावली . के ध्वजमग, कुष्ठ वा उन्मादरोगग्रस्त होने पर स्त्रीसंबंध और नानकवाणी कीर्तनके बाद दलपति उस व्यक्तिको विच्छेदकी अजी पेश कर सकती है। परन्तु इस चरणामृत और प्रसाद खाने देते हैं। पाबके भगियों- विच्छेदके लिए उसे ५ या १० रुपये नगद और सामा- में धर्मदीक्षाके समय यह मन्त्र पढ़ा जाता है:- जिकसभाको भोज देना पड़ता है। इनकी सभा ही __“यही सत्ययुगको कुसी है। त्रेता, द्वापर और कल-! विवाह बंधक चुक्ता कराने में एकमात्र अधिकारिणी है, परंतु युगमें सोनेके स्थानमें क्रमसे चांदी, तांबा और मिट्टीका सब जगहके भंगियोंमें ऐसीप्रथा नहीं है। शरोरगत रोगके उल्लेख है। इसके बाद चिउड़ा, घी, पान, लौंग, और कारण पतिका त्यागना घिहित नहीं है। स्त्रीका चरित्र दालचीनी आदि सुगध द्रव्योंमेंसे लालबेगको पूजा को दुष्ट होनेसे उसका त्याग किया जा सकता है। कभी । कभी उस स्त्रीको जातिसे पृथक् कर दिया जाता है।