पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७०५

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भनी ६५ विधवा स्त्रीको उसका. देवर व्याह सकता है। यदि होने पर भी इनको उतरभारतीय भगियों की श्रेणीमें कोई विधवा स्त्री अन्य किसीके साथ विवाह करे, तो शामिल किया जा सकता है। बेलगामके हलालखोर वह अपने पूर्व पतिकी सम्पत्तिको भी अधिकारिणी होती भंगी मां और मांससेवी हैं। अम्बा-भवानी जेलम्मा हैं, परन्तु शेख और गाजीपुरी-रावतों में ऐसा नियम और ब्रह्मदेव इनके उपास्य देवता हैं। ये हिन्दुओं के नहीं है अर्थात् ऐसी विधवा स्त्री अपने पूर्व पतिकी त्योहारों में उपवासादि नहीं करते हैं, फिर भी त्योहार जायदादकी हकदार नहीं होती। मनानेमें कोई कसर नहीं रखते। इनमें विधवा-विवाह गर्भावस्थामे स्त्रियां गलेमें एक रुपया वांधे रहती हैं। प्रचलित है। सद्यजात बालकके ५३ दिन पांच-भाई उनका विश्वास है, कि इससे उपदेवताओंका उस गर्भिणी | पूजा और १२वें दिन नामकरण होता है। तीसरे दिन पर फिर किसी प्रकार अत्याचारका भय नहीं रहता। ये लोग मृतके कलेवरके ऊपर पिण्ड देते हैं। १० दिन पांचवें या सातवें महीनेमें वे सतीपूजा करती हैं। प्रसव में अशौच दूर होता है और उसके बाद ११वे दिन ज्ञाति के समय चमारिन ही इनके यहां दाईका काम करती है। कुटुम्बका भोज भी होता है। सभी तरहके ब्राह्मण इनका बच्चा पैदा होनेके बाद उसकी नाल काट कर उसी! पौरोहित्य कर सकते हैं। सोवर-वाले घरमें गाढ़ दी जाती है और उस पर आग __सतारा जिलेके भगियों के दशहरा और दिवाली ये जलती रखते हैं। छठे दिन प्रसूति स्नानके वाद पवित्र दो त्योहार ही प्रधान हैं। ये स्थानीय हिंदूदेव देषियों- हो जाती है। हेलाओंमें बारहवें दिन पवित्र होनेका की पूजा किया करते हैं। वहिरोवा, देवकाई, जनाई, नियम है। उसके बाद ब्राह्मणको बुला कर बच्चेका ज्योतिबा और नरशोभा आदि इनके कुलदेवता हैं। नाम रखते हैं और उसी समय सिर भी मुढ़ा देते हैं। इन देवमूर्तियों को ये अपने घरमें रख कर उनकी पूजा बालक ५ या ६ वर्ष होने पर उसे कालिकामाई वा किया करते हैं। बाल्यविवाह, बहुविवाह और विधवा- विन्ध्यवासिनी देवीके पास ले जाते हैं और कर्णवेद एवं विवाह इनमें प्रचलित है । नगरका मैला साफ करना ही चूडाकरणादि करनेके बाद पूजा चढ़ाते हैं। मिरजापुर- इनका प्रधान कार्य है। जब सरकारी कार्यमें नियुक्त के हेला लोग सूतिकागृह त्यागने के बाद काले डोम और रहते हैं तब इनको पोशाक बहुत ही मैली रहती है, परन्तु गङ्गामाईकी पूजा करते हैं। दिनका काम खतम कर शामको ये स्त्री-पुरुष मिल कर ____ इनमें शवदहके दाह करने वा गाड़नेके कोई विशेष अच्छी पोशाकमे घूमा करते हैं। मांस और मादक द्रष्य नियम नहीं है। कोई कोई तो मुर्दको गाड़ देते हैं मात्र ही इनकी खास प्रीतिकी वस्तु है। और कोई मुखाम्नि वा हाथ पर जला कर उसे कब देते अहमदनगरके भगी आपाढ़ और कार्तिककीशुक्ला हैं। इसके बाद उस शवदेहको तृप्ति के लिए उसकी एकादशो, दशहरा, दिवाली, गोकुलाष्टमी और शिव- का पर खाद्यादि पदार्थ चढ़ाते हैं। अपेक्षाकृत उन्नत | रात्रि आदि पर्वो में विशेष श्रद्धा रखते हैं। हुसेनी-ब्राह्मण- हिन्दू झाड़ दार लोग निम्न श्रेणीके ब्राह्मण द्वारा मुखाग्नि | गण हिन्दूभगियों के और काजीलोग शेख भगियों के मन्त्र पढ़वा कर अपने अपने शवका दाह करते हैं और विवाह कार्यमें याजकता करते हैं। शवदेह गाडनेके बाद अवस्थानुसार श्राद्ध भी किया करते हैं। शेख-भगियोंके | २० या ४० दिनमें ये शाति कुटुम्ब वालों को भोज दिया बालकगण प्रेतात्माकी तृप्तिके लिए कलमा पढ़ते और तीज करते हैं। यहांके भगो हिन्दू और मुसलमानों के सभी तथा बरसी उत्सव मनाते हैं। लालबेगी और गाजीपुरी | पर्वोका लक्ष्य रख कर चलते हैं। रावत लोग पितर पखमें श्राद्ध और पिण्ड देते हैं। धारवाडके भगी प्रायः सभी विषयों में दाक्षिणात्यके . दाक्षिणात्यके अहमदनगर, सतारा, बेलगाम और अन्य भागियोंका अनुकरण करते हैं। दक्षिण-भारतके धारवाड आदि जिलों में भी यह भगी जाति बसती है। भगियोंका कहना है, कि वे गुजरात और उत्तर भारतसे इनके आचार व्यवहार और कुलप्रथा परस्परमें विभिन्न आकर बसे हैं। स्थानीय कुछ आचार-व्यवहारोंका